आर्ष आचरण

अर्थों का अर्थ समझ लो जब,तब शब्द प्रयोग अवश्य करो। जब परम्परा अधुनातन हो,तब आर्ष आचरण करो करो। आर्ष आचरण मतलब कि ऋषि प्रोक्त मार्ग पर चलना। इस मार्ग पर चलने के लिए, जिज्ञासा, साधु और सन्यास शब्दों पर विचार कर लेना होगा। जिज्ञासा का तात्पर्य है,जानने की इच्छा।ज्ञातुम् इच्छा। ज्ञा धातु से ‘ सन् ‘ प्रत्यय करके जिज्ञासा शब्द निष्पन्न है।इसी तरह अनेक शब्द हैं- हर्तुम् इच्छा जिहीर्षा, मर्तुम् इच्छा मुमूर्षा, गन्तुम् इच्छा जिगमिषा। ऐसे ही तितिक्षा शब्द है। त्यज् धातु में सन् प्रत्यय लगकर तितिक्षा बना। त्यक्तुम् इच्छा तितिक्षा।त्याग की इच्छा, को तितिक्षा समझें।किसका त्याग? हानि-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, अनुकूल-प्रतिकूल आदि संसार-द्वन्द्वों का का त्याग। अब यह भी समझो कि यह सारे द्वन्द्व प्रारब्धवश होते हैं।हाँ यह अवश्य है कि, किसी भी आने वाले, बुरे प्रारब्ध को हरिहरगुरुकृपया नष्ट भी,किया जा सकता है। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी। लेकिन उक्त भगवद् वचनों के अनुसार सर्वारम्भपरित्यागी, द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः गुणातीतः हुए बिना,एक बार फिर मानव जन्म निरर्थक हो जायेगा।इसलिये द्वन्द्वों से दूर, जब हमारे “अंशी ” हैं, तब हम “अंशभूत” भी द्वन्द्वों से दूर अविकल स्व-स्वभावगत आत्मगत होने पर ही संसृति-चक्र से छूट पाते हैं।सारी की सारी वेदसन्त-मर्यादा, तो इसी मानव देह के लिए है।अतः “तितिक्षा ” का तात्पर्य, निर्द्वन्द्व हो जाना है।अब साधु-“साधु” स्वरूप भी इसी तितिक्षा और कहिये अपने आत्म स्वरूप में स्थित होने पर स्वतः प्राप्त है। ” साध् संसिद्धौ” धातु में “उ”(उणादि प्रत्यय) लगकर, साधु शब्द निष्पन्न है। साध्नोति परकार्यम् इति।जो अपना नहीं, दूसरे शरीरों का कार्य सिद्ध करे,वह साधु है।परमारथ के कारने साधुन्ह धरा शरीर।।परमार्थ का तात्पर्य,पर अर्थ( प्रयोजन) की सिद्धि और परम अर्थ(प्रयोजन) माने कि, अपने सहित सबके परम हित “मोक्ष” के लिए सतत-रत होना है। इस परार्थ या परमार्थ की उपलब्धि में सत् अर्थात् सत्य के पग पर चलकर उस सत्यात्म परमात्मा की अनुभूति प्राप्ति होगी। इसीलिए ” सन्यास” होता है।यह सन्यास चतुर्थ आश्रम है।सत्+न्यास मिलकर सन्यास बना है।न्यास शब्द के नकार के बाद में होने से सत् का त् दकार होकर पर यानि कि न् हो जाता है। इसी को संस्कृत में परसवर्ण सन्धि कहा है। सत् में सत् हेतु सत् द्वारा अवस्थित होना ही,वस्तुतः सन्यास है। एतावता, आत्म अंशी के अंशाश होने से हमें तितिक्षा, साधुता और सन्यास भाव स्वतः प्राप्त है, किन्तु अभावों के कोश इस संसार की ही निरन्तर स्मृति होने से उक्त स्वभावगत भाव को विस्मृत किये बैठे एक और जन्म की तैयारी है।अतः हरिगुरुकृपा,श्रीरामनामामृत आदि का पान ही लोक परलोक की सिद्धि करेगा। इसलिये आर्ष आचरण करो करो।

गुरुहरी शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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