नाम ही विराजा

अक्षय विधाता, अपने करम।
आरोग्य धन ऊर्जा हैं भरम।
सीताराधा रामकृष्ण उमा।
शिव आदि नामों में चित घुमा।

मिटेगा फेरा फेर-फेर आने का।
अस्थिर धन यौवन अस्थिर है मन।
मैं हरिहर का निश्चित हूँ जन।
हर छन-छन जिह्वा रट नाम।
कीर्तन कर-कर करो काम।


संसार के अनित्य सभी सुख।
कहाँ कौन नहीं भोग रहा दुख।
नम मन मिला मानव तन।
आनत आरत नाम जप मन।

सभी दिव्य चिन्मय जनों का उपदेश।
रटो राम कोई हो भेष देश।
भागी से भाग कहाँ जाना है।
अंशी में अंश मिल जाना है।

तुलसीकबीररैदासमीरा वचन।
पिओ विश्वास श्रद्धा भाव प्रवचन।
रहो अलमस्त नाम की मस्ती।
अस्थिर शरीर संसार की बस्ती।


ध्रुव प्रह्लाद अम्बरीष राजा।
सकल कल-कल नाम ही विराजा।

गुरुहरी शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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