सौवर्णाम्बुजमध्यगां त्रिनयनां सौदामनीसन्निभाम्।
ग्रैवेयाङ्गगदहारकुण्डलधराम्
आखण्डलाद्यैः स्तुताम्।
ध्यायेद् विन्ध्यनिवासिनीं
शशिमुखीं पार्वस्थपञ्चाननाम् ।।
स्वर्ण कमल राजित कमला
त्रिनयन विद्युतनिभ विमला।
शंखचक्रवर अभय धारिता
चन्द्रकला दीपित अमला।।
गले सुशोभित उज्वल माल
कर्ण विराजत कुण्डल जाल।
इन्द्र देव अस्तुति करते हैं
बगल खड़े केसरि रहते हैं।।
चन्द्रमुखी विन्ध्याचल रानी
ध्यानी ध्यावत मुनि विज्ञानी।।
ऊपर उक्त संस्कृत वाणीमयध्यान श्रीवनदुर्गा विन्ध्यनिवासिनी का है।
नीचे अनुवाद किया गया है।
श्रीधाम विन्ध्याचल में वर्तमान मन्दिर पर
तीनों देवियों महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती की मूर्ति प्रतिष्ठित है।
यह त्रिदेवियों का “लघुत्रिकोण” है।
एक “वृहत् त्रिकोण” भी है। विन्ध्याचल
नगर से दक्षिण पूर्व दिशा में दो देवियों का विग्रह क्रमशः “महाकाली” और पर्वत की गुफा में ” महासरस्वती” रूप में राजित है।
दुर्गासप्तशतीवर्णित प्राधानिक रहस्य में इन तीन स्वरूपों में ” महालक्ष्मी ” को सब देवियों की ” आदि ” कहा गया है।
वस्तुतः इन “देवीत्रितयी” में प्रति एक का नाम “विन्ध्यनिवासिनी” ही है।
अब ध्यान योग्य बात ये है कि, विन्ध्याचल
में प्रतिष्ठित “लघुत्रिकोण” में महालक्ष्मी ही
“विन्ध्यनिवासिनी” रूप में पूजायमाना हैं।
हालाँकि अन्य दोनों स्वरूप भी इन्ही का विस्तृत रूप होने से “विन्ध्यनिवासिनी” मान्य हैं। यद्यपि”वृहत् त्रिकोण” में विराजमान महाकाली और महासरस्वती भी विन्ध्यवासिनी हैं,तथापि –
प्राधानिक रहस्य में-
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीः त्रिगुणा परमेश्वरी।
कहकर ऋषि ने महालक्ष्मी रूप को विशेषतया “विन्ध्यवासिनी” रूप कहा है । अतः महालक्ष्मी रूप ही प्रधान है।
वर्तमान में यह “महालक्ष्मी रूपा” जो “विन्ध्यवासिनी” मन्दिर पर हैं, उनकी मूर्ति ” श्रीयन्त्र” पर अधिष्ठित है ।
ऐसी ऐतिहासिक मान्यता है कि, काशी
के महाराजा ने वर्तमान “महालक्ष्मी” विन्ध्यनिवासिनी की मूर्ति आज से लगभग दो से तीन हजार वर्ष पूर्व स्थापित की थी।
ध्यातव्य है कि,यह स्वरूप “यन्त्रस्थ” है।
“श्रीयन्त्रोपरिस्थिता विन्ध्याचलनिवासिनी”
वचन प्रामाण्य “औशनस”उपपुराण में उल्लिखित है।
अतः ऊपर ” सौवर्णाम्बुजमध्यगाम्..”
इत्यादि वनदुर्गा ध्यान से भिन्न ध्यान
भगवती कृपा से “दास” द्वारा भगवती ने ही लिखवाया है,जो इस प्रकार है-
कुङ्कुम-चर्चित-रक्त-भाल-विलसद् –
दिव्याम्बरालङ्कृताम्, शङ्खं चक्रवराभ- यानिदधतीं प्रख्यैः चतुर्भिः भुजैः।
श्रीयन्त्रे विलसन् -मृगेन्द्र-सुमहत् -पीठस्थितां मातरं,दक्षिण-वाम-गणेश-
योगिनि-गतां विन्ध्ये वसन्तीं नुमः।।
भाषानुवाद-
रोली रचित रजत मस्तक है दिव्यवस्त्र आभूषण साजत, चारि भुजा राजित मुद्रा वर अभय शंख अरु चक्र विराजत।यन्त्रश्री शोभित मृगेन्द्र-पीठस्थ-विन्ध्य-
नगराज राजिनी, दक्षिण वाम गणेश योगिनी-युक्त-मूर्ति भव अभय दायिनी।
यह विन्ध्यनिवासिनी ध्यान हरिः ओ३म् तत् सत् कृपया लिखित होने से तद् युगल चरणारविन्दों में सतत सादर समर्पित।
गुरुहरी शरणम्।
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