अधिमास या पुरुषोत्तम मास का प्रति तीन वर्षानन्तर आना अवश्यंभावी है।
नारायण! हमें जिस प्रदेश में अपने प्रारब्ध वशात् निवास करने का अनुग्रह वात्सल्यगुणसागर! करुणानिधि! भगवान् ने प्रदान किया है,उसमें चान्द्र पंचांग का व्यवहार होता है। पंचांग द्विविध- चान्द्र और सौर भेद से होता है।
चन्द्रमा की घटती कला से कृष्ण पक्षादि मास द्वारा हमारे पंचांग का प्रारंभ है।
पुनः द्वितीया चन्द्रोदय से चन्द्रमा की पूर्णिमा पर मासान्त द्रष्टव्य है। लेकिन
सौर पंचांगों का प्रारंभ मेषादि बारह राशियों पर सूर्यनारायण के आगमन से होता है।इस सौर पंचांग में तीस दिनों का ही प्रायः मास सुनिश्चित है।
अब हमारे यहाँ प्रचलित चान्द्र पंचांग का आधार चूँकि, कलाक्षयत्वेन घटने बढ़ने
क्षय लोप होने में है, अतः सम्पूर्ण वर्ष में
तीन सौ चौवन दिन होते हैं।
सौर पंचांग मेष आदि राशि पर सूर्य के आने पर होने से कुल निर्धारित काल तीन सौ पैसठ दिन और छः घण्टे होते हैं।
इस तरह उक्त चान्द्रऔर सौर पंचागों में ऐकरूप्य लाने के लिए, तीन वर्षानन्तर चान्द्र पंचांग में एक मास बढ़ा दिया गया है। यह तो ज्योतिः शास्त्र आधारित अधिमास का परिगणन हुआ।
नारायण! इसके अतिरिक्त भविष्य पद्म और हरिवंश आदि पुराणों में इस मास के आगमन और माहात्म्य का सविस्तर वर्णन है।
हिरण्यकशिपु को प्राप्त वरदान में किसी मास में भी मृत्यु न होने का वरप्राप्त होने से, भगवान् ने एक मास अधिक करके,पुरुषोत्तम नृसिंह रूप धर कर उसका वध कर दिया।
इस मास में किसी भी मेषादि राशि पर सूर्यसंक्रमण नहीं होता।अतः कोई संक्रांति नहीं होती।
ग्रेगेरियन कैलेण्डर भी घटते बढ़ते तीस इकतीस दिनों और चौथे वर्ष उनतीस दिनों के फरवरी मास में पूर्ण होता है।
हमारे इस अधिमास में कोई संक्रांति नहीं होने से मांगलिक संस्कार वर्जित हैं।
किन्तु दीपदान का अनन्त फल,पुराणों में वर्णित है,जिससे दारिद्र्य क्षय हो जाता है,खूब लक्ष्मी की वृद्धि भी होती है।
” दीपदाने$धिमासेस्मिन् ,रमावृद्धिकरं नृणाम्।”-भविष्य पुराण।
नारायण! समस्त वेदवर्णित तीर्थ स्नान
योगयज्ञतन्त्रमन्त्र और कृच्छ्र चान्द्रायण व्रतादि, गयाश्राद्ध,सूर्यचन्द्रग्रहण व्यतीपात आदि का फल इसी मास में दीपदानेन प्राप्यते।
विद्याप्राप्ति, विवाहेच्छु को वरस्त्री प्राप्ति और मुक्तिकामी को मुक्ति लाभ भी इसी मास में सश्रद्ध दिये गए धूपदीपादि से होना सुनिश्चित है।
कृष्णार्थी प्राप्नुयात् कृष्णं,
मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्
गुरुः शरणम्। शरणम्।