श्रीराम नाम वरानने

नारायण यदि दानवव्यवहार,किसी का भी हो,तो इतिहास साक्षी है, कोई भी शक्ति, किसी भी निष्कामी भक्त को परास्त नहीं कर सकता। प्रह्लाद ध्रुव मार्कण्डेय प्रबल उदाहरण हैं।
अतः गणेश दुर्गा शिव विष्णु सूर्य आदि पंचदेवों के उपासक साधक की प्रथम शर्त ही शरणागति और निष्काम भक्ति की है।
संसार सुख तो भक्त को स्वतः सुलभ होगा। और यदि नित्य भगवान् से अनित्य संसार और संसारी भोग राग माँगा जायेगा, तो बार-बार संसार में आना जाना लगा रहेगा।जबकि यह मानव शरीर बड़े भाग मानुष तन पावा और सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा,है। इसलिये केवल इसी एकमात्र विवेकसम्पन्न मानव शरीर का चरम लक्ष्य,इसी शरीर से अभी पा लो।और वह चरम लक्ष्य है, पुनः किसी मानव दानव पशु की माता के गर्भ में न जाना। किसी अच्छे बुरे भोग के लिये, दूसरा कोई भी शरीर नहीं धारण करना।
केवल भगवतीभगवान् की अनुपम श्रीनखमणिचन्द्रिका की सायुज्य प्राप्ति कर लेना।

केवल और केवल भगवान् की आज्ञा से भगवदीय कार्य के लिये, धर्मस्थापन के लिये, शरीर प्राप्ति हो, जैसे तुलसीसूरकबीररैदासमीरा आदि निष्कामी भक्तों को धरती पर भगवदाज्ञा से आना पड़ा।
” चारि जुगन के भगत जे, तिनके पग की धूरि।सरबस, आइ बिराजिहौं, मेरौ जीवन मूरि।
भक्ति भक्त भगवन्त गुरु चारि नाम वपु एक।तिनके पद बंदन किये,नासैं बिघ्न अनेक।
सहस नाम सम सुनि शिव बानी।जपि जेई पिय संग भवानी। तुम पुनि राम राम दिन राती सादर जपहु अनंग अराती।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।सहस्र नाम तत् तुल्यं श्रीराम नाम वरानने।।

गुरुःशरणम्।हरिः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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