बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।भागः जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्प्यते।इत्यादि श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय5मन्त्र 9) वाक्य,और (कठोपनिषद् अ.1.20तथा श्वेताश्वतर 3.20) अणोरणीयान् महतो महीयान् इत्यादि ,वाक्य यह बात प्रमाणित करते हैं,कि हमारा शरीरपिण्डस्थ जीव, बाल के अग्रभाग के सैकड़ों टुकड़े और उन टुकडों के भी सैकड़ों खण्ड करने पर जो भी अवशिष्टरूप बचता है, वही चर्म चक्षुओं से अदृश्यमान “जीवात्मा” है।वह तो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम है।और वही चेतन जीवात्म तत्व,परमात्मा का अंश होने से विशाल से विशालतम भी है।
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।यत् कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्। वह परात्पर माधव तो कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् है। हम उन्ही के अंश मात्र हैं। इसीलिये आत्म अनुभूति होने पर हम” अहं ब्रह्मास्मि” और”तत्वमसि” हैं।हम सूक्ष्म से सूक्ष्मतम विशाल से विशालतम हैं तब, जब कि आवागमन से मुक्त हो जायें। यही मुक्तमुक्ति(मोक्ष)है। धर्मार्थकाममोक्ष आदि सभी पुरुषार्थों में अन्तिम पुरुषार्थ “मोक्ष” की प्राप्ति हो जाने पर किसी भी “भोग” के लिये कोई शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा और भोग तो कर्मभोग है,वह भोग चाहे भूः आदिलोकों से लेकर ब्रह्मलोक तक का हो या यमादि नरकलोकों का भोग।
प्रश्न विचारणीय यहाँ यह कि,मोक्ष कैसे?
जिससे सारे भोगों से छुटकारा मिले।
तो ऐसी स्थिति में सद्गुरु कृपातः शरणागताभक्ति,ही एक ऐसी ही, जिससे, मोक्ष हो सकता है।
यह ऐसी भक्ति है, जिसमें भक्त संसार दुःख से दुःखी होकर,सन्तसद्गुरु चरणों में गिर पड़ता है।और जब गुरु भगवान् की कृपा,अकारणकरुणावरुणालय भगवान् से जोड़ देती है, तब संसार बन्धन नष्टभ्रष्ट हो ही जाता है।मुक्ति होती है, केवल और केवल भक्ति से।
भक्ति का नशा चढ़ते ही, सारे शरीर संसार का नशा चूर-चूर हो जाता है- “देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद”, वाली भक्ति। “मामेव ये प्रपद् यन्ते मायामेतां तरन्ति ते”, वाली भक्ति। आत्मीयों! ऐसी ही भक्ति के भाव प्रभाव से निश्चित रूप से इस नश्वर जगत्
और जगत् की वस्तुओं में मनबुद्धि चित्त का राग नहीं रह जाता।वह राग रागात्मक मायात्मक जगत् के कर्ता कारयिता से जुड़कर इच्छित लक्ष्य “मोक्ष” की प्राप्ति करा देता है।
समर्पणभक्ति का प्रभाव पड़ते ही,तत्क्षण सच्चिदानन्दानुभूति होती है। संसार माया की पकड़, अकड़ या “अहमादिवृत्ति” क्षीण होती जाती है।मनुष्य शरीर मिलने का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है।
लेकिन पहले ,सदाचरण,मनुष्योचित आचरण और क्रमशः सद्गुरु प्राप्ति होती है।उसके बाद सद्गुरु कृपा के प्रसाद से सब कुछ मिल जाता है।
श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् की कृपा से तुलसी सूर कबीर रैदास मीरा जैसों को सामीप्य,सायुज्य, सालोक्य,सारूप्य और सार्ष्टि मुक्ति मिली है, और इसी कराल कलिकाल में।
ऐसी मुक्ति ही तत्वतः अणिमा,गरिमा लघिमा प्राकाम्या ईशित्व वशित्व सिद्धियों की प्राप्ति भी करा देती है।
और जीव कृतकृत्य हो जाता है – अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मा परमात्मा की अनुभूति होने लगती है। और, सगुण साकार रामकृष्णनारायण सीताराधालक्ष्मी विन्ध्यवासिनीदुर्गा कामाख्या आदि की करुणा कृपा का अंशाश भी अनुभव होने लगता है।
लेकिन इन सभी के विपरीत, यदि भगवदीय गुणों की अनुभूति इस जीव को इस मानव पिण्ड में नहीं हुई,तो शरीर और आकृति भले ही मानव जैसा दीखे,वह उक्त मानवीय भगवदीय गुणों के बिना दानव ही है।
“जे आचरहिं ते नर, न घनेरे”
वेद सन्त आज्ञा का आचरण होने लगा तभी नर(मनुष्य) और न(नहीं आचरण हुआ) तो घनेरे(राक्षस) क्योंकि-
“आचारः परमो धर्मः” मनुष्यता का आचरण ही श्रेष्ठ धारणीय धर्म है।
और नारायण! “साधन धाम मोक्ष करि द्वारा” यह देवदुर्लभ( सुर दुरलभ सब ग्रन्थन गावा) नर तन (शरीर) है।
“पाइ न जे परलोक सँवारा”।ऐसा शरीर मिलने पर भी जनम जनम की बिगड़ी नहीं बनी तो दोष हमारा ही है। पूज्य
गोस्वामी जी जैसे सन्तो ने वेदतुल्य श्रीराचरितमानस जैसे ग्रन्थों से दृष्टि दे दी है।हम अणु परमाणु की तरह नहीं दीखने वाले जीवात्मा और परमात्मा कीअनुभूति करके ही ” आवागमन मुक्त” लोक ” वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति कर पाते हैं।
अतः सन्त सद्गुरू की वाणी और आज्ञाओं का पालन और दृढ विश्वास पूर्वक होने पर सारी मुक्ति का मार्ग मिलेगा। इसलिये सदाचार वेदाचार सन्त संग ही संसारसागर के “रोग” की असली दवाई है। तुलसीसूरकबीररैदासमीरा बैद्य डाक्टर हैं, और इनके वचन,इस भवरोग की औषधि,विश्वास करना पड़ेगा।बिना विश्वास के कोई दवा काम नहीं करेगी।
” सद्गुरु बैद बचन बिस्वासा”
“गुरुहरी शरणम्”
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