अक्षय तृतीया

न क्षीयते शुभं कर्म यस्मिन् दिव्यदिने सदा।सा सिद्धाक् षयतृतीया कथिता स्वैः मुनिभिः मता। अतः साधो विचार्यैव कुरु कर्म विचारितम्। विचारिते वेदविहिते कर्तव्ये कर्मणि जनैः।प्राप्यते हि तल्लक्ष्यं पुनर्जन्म न जायते।
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अनेकजन्मसंसिद्धः ततो याति परां गतिम्।

यह जीवात्मा अक्षय है।
शरीरक्षय है। शरीर से जुड़े संसार और सभी पद पदार्थ अनित्य क्षय हैं।अतः अक्षय तृतीया तो अध्यात्म की सन्देशदात्री ऋषिप्रणीत ऐसी शुभ घड़ी है,जिसमें इस शरीर और संसार से जुड़े, समस्त वस्तुओं से वैराग्य का ज्ञान होना ही चाहिए।

अक्षय तृतीया, वस्तुतः वह दिन है जिससे इस शरीर के नित्य क्षरण का बोध होना चाहिए।
यह ऐसा काल है जो कालकवलित होते संसार का ध्यान कराने वाला है।
नाशवान् शरीर और उससे जुड़े संसार की वस्तुओं सम्बन्धों की अनित्यता का सन्देशदायक है।
और कहें तो, हमारे अद्वैत वेदान्त के चरम विचारदर्शन “नित्यानित्यवस्तुविवेक” का ज्ञान करा कर पुनर्जन्ममृत्युचक्र का ही आत्यन्तिक नाश करा देने वाला दिन है।

क्या नित्य(अक्षय) है और क्या अनित्य (क् षय)है, यही जानकर,संसार के राग मोहमाया में प्रवृत्ति से निवृत्ति मानव जीव की सार्थता है। इसीलिए आज अक्षय तृतीया इस लक्ष्य को लक् षित करने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्योंकि संसारप्रवृत्ति से निवृत्ति ही जीव के चिरप्रतीक्षित निर्वृति(आनन्द) का सूत्रधार है।

अक्षय्या या तृतीया सा परमनिर्वृतिदायिनी। अतः विवेकं लब्ध्वैव
नित्यानित्यं सुखी भवेत्।

गुरुहरी शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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