भजस्व माम्


अनित्यम् असुखं लोकम् इमं प्राप्य भजस्व माम्।
मलमूत्र का बर्तन, यह पृथ्वी आदि पंच तत्वों का शरीर भगवान् का भजन करने के लिए मिला है। इसे काम क्रोधादि में पड़कर,ऐसे तैसे खाने पीने और ऐन्द्रिक सुखों(सुखाभासों)में गँवाना ठीक नहीं।

जैसे यह शरीर विनाशी है,वैसे ही संसार भी। मानिए शरीर संसार दो,नहीं बल्कि एक ही हैं।अब प्रतिक् षण नष्ट होते हुए इस,शरीर की प्राप्ति, भगवत् प्राप्ति हेतु ही है।भगवत् प्राप्ति नहीं होगी,तो बार बार,नानाजन्म धारने होंगें।
सोचिये,जिस भगवत् तत्व,प्राणरूप,श्वास प्रतिश्वास के रहते सम्पूर्ण शरीर क्रियाशील,है उसकी ओर हमारी (स्वयं की) दृष्टि नहीं जाती,वह कैसा अद्भुत है।
दृष्टि नहीं जाने का कारण, भगवान् की प्रचण्ड माया है,जिससे बड़े बड़े ऋषिमुनि भी नहीं बच पाये थे।
माया,अज् ञान ,अभिमान, ये सभी एकार्थक हैं। अतः –
सद्गुरु बैद बचन विश्वासा।
अर्थात् हरि कृपा से हरिरूप गुरु प्राप्ति हो जाने पर ही भगवान् का भजन बनेगा।
सूर,कबीर,तुलसी आदि की वाणी वह औषधि है,जिसका सेवन करने से ही,यह माया,अज् ञान और अभिमान जाता है।
जा रहा है,जायेगा और गया भी।
अब इसमें बात इतनी सी है कि हम राम कृष्ण नारायण सीता राधा दुर्गा आदि नामों का स्मरण जप करें।सभी पूर्वाचार्यों ने शरीर को संसार मुखी से भगवन् मुखी
बनाने का एकमात्र उपाय यही कहा है।

जननि जननं जातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः।

गोविन्दं भज मूढमते!

राम न सकहिं नाम गुन गाई।

भजन करत बिनु जतन प्रयासा ।संसृति मूल अविद्या नासा।।
संसृति मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोकदायक अभिमाना।।

भजन करत सोइ मुकुति गोसाईं।अनइच्छित आवै बरिआईं।।

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

श्रीराम जय राम जय जय राम।
महामन्त्र जेहि जपत महेसू।कासी मुकुति हेतु उपदेसू।।

इसीलिए भगवान् ने स्वयं की प्राप्ति के लिए,स्वयं(आत्मानम्) को भजने के लिये आदेश किया।
भजस्व माम्।

श्रीराम जय राम जय जय राम।

गुरुहरी शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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