जीवन का रण



अनन्त बलवन्त विद्यावन्त गुणवन्त भक्तिमन्त हनुमन्त कृपा करें, इस जीव की श्रीराम चरणारविन्दों में प्रीति हो। संसार के नामरूपलीला की विस्मृति और भगवान् के नामरूपलीला की स्मृति बने।

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन विगत अभिमाना।।

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति,अमान।

बार-बार प्रभु चहहिं उठावा।
प्रेम मगन तेहिं उठब न भावा।।

प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा।सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

निरभिमानी ही निरभिमानिता को दे सके। निष्कामी ही निष्काम कर सके।

मैं खुदी हम हम निकालो।
थक गया हूँ हे!कृपालो।
आरत के चित रहै न चेतू।
फिर फिर कहै आपने हेतू।

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।

सादरं वन्दे भूषणपन्नगम् इन्दुभूषणम्। श्रीराम जय राम जय जय जय राम।

राम काज लगि तव अवतारा।सुनतहिं भयउ पर्वताकारा। काम लगा दो राम से।रहूँ सदा आराम से।बार बार है वान्त जगत।कृपा करो हे अविगत गत। छूटे माया का बन्धन।विनसे विषयवास इन्धन।अहमाकार वृत्ति विनसे।रामाकार चित्त विहसे।लक्ष्य पूर्ण हो इस शरीर का।
अतिरस्कृत हो कृपावीर का।

बदलो दृष्टि विचार आचरण।
जीत सकूँ जीवन का रण।।

गुरुहरी शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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