जो शक्ति के अनन्त स्रोत मेरे मन आदि अन्तःकरण में प्रवेश करके, मेरे पिण्ड शरीर को अपना निवास(धाम)बनाकर मेरी प्रसुप्त वाणी को जीवन देते हैं।और अन्य,हाथ पैर कान त्वचा आदि इन्द्रियों में भी प्राण के रूप में रहते हुए, क्रियाशील रखते हैं, ऐसे समस्त जड-चेतन के आधार परमपुरुष परात्पर परमात्मा को ,प्रणाम करता हूँ।
योन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयति अखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यान् च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् , प्राणान् नमः भगवते पुरुषाय तुभ्यम्।।
(भगवद् दर्शनकाले भक्तध्रुवः)
सब कुछ जो दीख निरन्तर,
बाहर भीतर सर्वाभ्यन्तर।
क्या है वह कौतूहल आया,
पहले मातृ अंक हरषाया।
भूख तृषा निद्रातुर रहकर,
उसे मिटाते माँ को पाया।
हुई प्रथम पहचान जननि से,
पिता यही पहचान कराया।
पुनः हुआ साक्षर गुरु माँ से,
तब,भाषाज्ञान सरस्वतिमन्दिर।
पूर्वशिष्ट अनुशासन पाया,
गुरु शिक् षक आचरण सिखाया।
मातृपितृ गुरुभक्ति बढ़ी तब,
कारणकार्य जगत दीखा।
जो अनुकूल मिला सुख पाया,
जो प्रतिकूल न दुख भाया।
हुई कृपा परमेश परम जब,
सद्गुरु करुणामूर्ति मिले।
जगी मनुजता उनकी दाया,
हुई सफल मानव काया।
वाह्य दृष्टि अन्तर में फेरी,
वही गुरू परमेश दिखे।
वही बोलता प्रेरक पाया,
सुनता “वही” गई माया।
श्रीगुरुहरी शरणम्।
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