भू से ऊपर

हमारे ऋषियों ने एक अनावृत तथ्य यह रखा है कि पृथ्वी आदि पंच तत्वों से ऊपर उठे बिना जीव को लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा।
भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्य आदि सात लोकों में भी क्रमशः गति होती है।
सत्य लोकावाप्ति हो जाने पर गुरु भगवत् कृपातः फिर नीचे गिरने की कथंचित् ही स्थिति नहीं बनती।
इसी तरह शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा पंच विषय वाली धरती है।हम मानव पिण्ड में इसका सूक्ष्म अनुभव कर सकते हैं।यह धरती इन्ही अपने शब्दादि गुणों/विषयों के कारण अत्यंत गुरु है। हम इन्ही विषयों में पड़कर बार-बार इस धरती पर नाना शरीरों में चंक्रमण करते रहते हैं।यही इसके गुरुत्वाकर्षण का रहस्य सूझता है।

शब्द आकाश का मूल गुण, स्पर्श वायु का मूल गुण,रूप अग्नि का मूल गुण,रस जल का मौलिक गुण और गन्ध धरती का मूल गुण है।
शब्दादि पंच में एक उसका मूल गुण तथा
उसके बाद अपने पूर्वज वर्ती का क्रमशः गुण अन्तरित हुआ है।
आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी तक आते आते,इसीलिये क्रमशः एक,दो,तीन,चार और पाँच गुण धरती के होते हैं।
आसान नहीं इन गुणों/विषयों की आसक्ति से बचना।
सभी के अन्तः में एक और विशिष्ट गुण
सत्व,रजः और तम भी शिष्ट अनुस्यूत है।
जिसके कारण क्रमशः, सुख दुःख और
मोह होता है।

इन भोगरूप शब्दादिक की असारता का बोध भी जीवनदुःखों से ऊबने के कारण और किसी भक्तसन्त के चरणाश्रय से पैदा होता है।
शरीर भी त्रिविध- स्थूल,सूक् ष्म और कारण रूप है।
स्थूलशरीर पृथ्वी आदि हैं।

सूक् ष्म शरीर मनोबुद्ध्यहमादि है।

औरकारणशरीर पूर्वप्रारब्ध है।

अब शनैः-शनैः इन स्थूलसूक् ष्मादि में राग ही, मूलतः विराग भी बनता जाता है।
यह विराग स्थूल से सूक् ष्म शरीर की ओर बढ़ता है।क्योंकि-
स्थूलादि पंच और मन आदि सूक् ष्म
भोगों से व्याकुलित व्यथित होते हैं।इसी भोग वैकल्य में,आत्मदेव भगवत् कृपा से अपने ही अंगो से घृणा होती है।और मन आदि की अशुचि,जब शुचिता की ओर बढ़ती है, तब यही हमारी पार्थिव देह भारभारी घृण्य हो गई-

शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा।

इसी में विवेक वैराग्य सम्पुष्ट होता है। तब आत्म गत भाव को परख कर परमात्मा किसी सन्त सद्गुरु का चरण पकड़ाते हैं।और बार बार के नाना देहों में जाकर आने जाने से मुक्ति का भाव उपजता है।
सिद्धों(मुक्तों) की संगति ही मुक्ति का परमोपाय है।और वह भी क्रमशः अनेक जन्मों में शनैः शनैः भोगनिरास होते होते
आत्मोपलब्धि का प्रबल भाव बनता है,तब जाकर परमसाधुता सज्जनता से
जीव, जीवन्मुक्त और मुक्त हो पाता है-

अनेकजन्मसन्सिद्धः ततो याति परां गतिम्।

पंचविषया पृथ्वी से ऊपर जाने पर शब्द स्पर्श रूप रस को धारण करने वाला “जल” तत्व है। इस जल का प्रधान गुण तो”रस” है, जबकि रूपस्पर्शशब्द इस जल को अपने पूर्वजों से प्राप्त है।इस रस का बड़ा आकर्षण होता है।भोजन अन्न पानादि के भोग पर सभी आकृष्ट होकर लक्ष्य से भटक जाते हैं।इससे ऊपर जाना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है।अतः खाने पीने की भोगसामग्री में पड़कर व्यर्थ में जीवन नष्ट नहीं करें।यही ध्यान करके सन्तों ने कहा- जितं सर्वं जिते रसे।मतलब कि यह वह सीढ़ी है जिससे खानपान में विचार करके हम उन्नत हो सकते हैं, अन्यथा नीचे की योनियों में जाना सुनिश्चित है।
जल से ऊपर उठकर त्रिविषय अग्नि तत्व
शब्दस्पर्शरूप मात्र बचता है। और इसके भी ऊपर की स्थिति वायु है।
यह वायु दो विषयों शब्द और स्पर्श मात्र गुण वाला है।यही वायु तत्व है जो हमारी चेतना या प्राण का स्वरूप माना गया है।
इसी प्राणिक/वायु चेतना से ऊपर जाकर एक शब्दगुण वाले आकाश में गति होती है, जिससे धीरे धीरे हम पृथ्वी आदि के गुरुत्वाकर्षण से अलग आत्मसत्ता की अनुभूति कर पाते हैं।
इस सारी प्रक्रिया में सन्तभगवन्त की कृपा करुणा और स्वयं की मुक्ति का भाव दृढ होना ही परम सार है।
धीरे धीरे धैर्य पूर्वक सन्तचरण की सीढ़ी ऊपर उठा ही देती है।
नहीं तो देवता या सारी धरती का राजा बनकर भी संसृतिचक्र टूटने वाला नहीं।

छोट बिबुध दरबार तें भूनृप कै दरबार। जापक पूजक दोउ कौ असह अनादर भार।

बिबुध भूपती दोउ हैं, मलिन चित्त सुन लीजिये। द्वन्द मान अपमान में पड़े जुगल कह लीजिए।

भगवत पूजन बिबुध भी भूनृप करत सँम्हार। भोग बुद्धि दोऊ कहो पहने संसृति हार।
मान और अपमान में जो सम भाव विचार। वही मनुज वैराग्य जुत होता बेड़ा पार।

बिना गुरू कै ग्यान कहँ जो बैराग बिमल मति।मिलै शान्ति उन्ह आर्तजन, रहत अचार विचार गति।
रहत अचार विचार सनातन होत कृपा श्रीराम की। तब मिल सन्तन संग ढिंग कथा लुप्त हो काम की।
देवता हो या भूमिनृप कामाहत दोऊ सुनो। देव श्रेष्ठ हैं जान मान, भू से ऊपर उन जन गुनो।

गुरुहरी शरणम्।
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अक्षय तृतीया

न क्षीयते शुभं कर्म यस्मिन् दिव्यदिने सदा।सा सिद्धाक् षयतृतीया कथिता स्वैः मुनिभिः मता। अतः साधो विचार्यैव कुरु कर्म विचारितम्। विचारिते वेदविहिते कर्तव्ये कर्मणि जनैः।प्राप्यते हि तल्लक्ष्यं पुनर्जन्म न जायते।
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अनेकजन्मसंसिद्धः ततो याति परां गतिम्।

यह जीवात्मा अक्षय है।
शरीरक्षय है। शरीर से जुड़े संसार और सभी पद पदार्थ अनित्य क्षय हैं।अतः अक्षय तृतीया तो अध्यात्म की सन्देशदात्री ऋषिप्रणीत ऐसी शुभ घड़ी है,जिसमें इस शरीर और संसार से जुड़े, समस्त वस्तुओं से वैराग्य का ज्ञान होना ही चाहिए।

अक्षय तृतीया, वस्तुतः वह दिन है जिससे इस शरीर के नित्य क्षरण का बोध होना चाहिए।
यह ऐसा काल है जो कालकवलित होते संसार का ध्यान कराने वाला है।
नाशवान् शरीर और उससे जुड़े संसार की वस्तुओं सम्बन्धों की अनित्यता का सन्देशदायक है।
और कहें तो, हमारे अद्वैत वेदान्त के चरम विचारदर्शन “नित्यानित्यवस्तुविवेक” का ज्ञान करा कर पुनर्जन्ममृत्युचक्र का ही आत्यन्तिक नाश करा देने वाला दिन है।

क्या नित्य(अक्षय) है और क्या अनित्य (क् षय)है, यही जानकर,संसार के राग मोहमाया में प्रवृत्ति से निवृत्ति मानव जीव की सार्थता है। इसीलिए आज अक्षय तृतीया इस लक्ष्य को लक् षित करने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्योंकि संसारप्रवृत्ति से निवृत्ति ही जीव के चिरप्रतीक्षित निर्वृति(आनन्द) का सूत्रधार है।

अक्षय्या या तृतीया सा परमनिर्वृतिदायिनी। अतः विवेकं लब्ध्वैव
नित्यानित्यं सुखी भवेत्।

गुरुहरी शरणम्।
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भजस्व माम्


अनित्यम् असुखं लोकम् इमं प्राप्य भजस्व माम्।
मलमूत्र का बर्तन, यह पृथ्वी आदि पंच तत्वों का शरीर भगवान् का भजन करने के लिए मिला है। इसे काम क्रोधादि में पड़कर,ऐसे तैसे खाने पीने और ऐन्द्रिक सुखों(सुखाभासों)में गँवाना ठीक नहीं।

जैसे यह शरीर विनाशी है,वैसे ही संसार भी। मानिए शरीर संसार दो,नहीं बल्कि एक ही हैं।अब प्रतिक् षण नष्ट होते हुए इस,शरीर की प्राप्ति, भगवत् प्राप्ति हेतु ही है।भगवत् प्राप्ति नहीं होगी,तो बार बार,नानाजन्म धारने होंगें।
सोचिये,जिस भगवत् तत्व,प्राणरूप,श्वास प्रतिश्वास के रहते सम्पूर्ण शरीर क्रियाशील,है उसकी ओर हमारी (स्वयं की) दृष्टि नहीं जाती,वह कैसा अद्भुत है।
दृष्टि नहीं जाने का कारण, भगवान् की प्रचण्ड माया है,जिससे बड़े बड़े ऋषिमुनि भी नहीं बच पाये थे।
माया,अज् ञान ,अभिमान, ये सभी एकार्थक हैं। अतः –
सद्गुरु बैद बचन विश्वासा।
अर्थात् हरि कृपा से हरिरूप गुरु प्राप्ति हो जाने पर ही भगवान् का भजन बनेगा।
सूर,कबीर,तुलसी आदि की वाणी वह औषधि है,जिसका सेवन करने से ही,यह माया,अज् ञान और अभिमान जाता है।
जा रहा है,जायेगा और गया भी।
अब इसमें बात इतनी सी है कि हम राम कृष्ण नारायण सीता राधा दुर्गा आदि नामों का स्मरण जप करें।सभी पूर्वाचार्यों ने शरीर को संसार मुखी से भगवन् मुखी
बनाने का एकमात्र उपाय यही कहा है।

जननि जननं जातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः।

गोविन्दं भज मूढमते!

राम न सकहिं नाम गुन गाई।

भजन करत बिनु जतन प्रयासा ।संसृति मूल अविद्या नासा।।
संसृति मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोकदायक अभिमाना।।

भजन करत सोइ मुकुति गोसाईं।अनइच्छित आवै बरिआईं।।

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

श्रीराम जय राम जय जय राम।
महामन्त्र जेहि जपत महेसू।कासी मुकुति हेतु उपदेसू।।

इसीलिए भगवान् ने स्वयं की प्राप्ति के लिए,स्वयं(आत्मानम्) को भजने के लिये आदेश किया।
भजस्व माम्।

श्रीराम जय राम जय जय राम।

गुरुहरी शरणम्

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जीवन का रण



अनन्त बलवन्त विद्यावन्त गुणवन्त भक्तिमन्त हनुमन्त कृपा करें, इस जीव की श्रीराम चरणारविन्दों में प्रीति हो। संसार के नामरूपलीला की विस्मृति और भगवान् के नामरूपलीला की स्मृति बने।

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन विगत अभिमाना।।

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति,अमान।

बार-बार प्रभु चहहिं उठावा।
प्रेम मगन तेहिं उठब न भावा।।

प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा।सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

निरभिमानी ही निरभिमानिता को दे सके। निष्कामी ही निष्काम कर सके।

मैं खुदी हम हम निकालो।
थक गया हूँ हे!कृपालो।
आरत के चित रहै न चेतू।
फिर फिर कहै आपने हेतू।

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।

सादरं वन्दे भूषणपन्नगम् इन्दुभूषणम्। श्रीराम जय राम जय जय जय राम।

राम काज लगि तव अवतारा।सुनतहिं भयउ पर्वताकारा। काम लगा दो राम से।रहूँ सदा आराम से।बार बार है वान्त जगत।कृपा करो हे अविगत गत। छूटे माया का बन्धन।विनसे विषयवास इन्धन।अहमाकार वृत्ति विनसे।रामाकार चित्त विहसे।लक्ष्य पूर्ण हो इस शरीर का।
अतिरस्कृत हो कृपावीर का।

बदलो दृष्टि विचार आचरण।
जीत सकूँ जीवन का रण।।

गुरुहरी शरणम्।

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गई माया

जो शक्ति के अनन्त स्रोत मेरे मन आदि अन्तःकरण में प्रवेश करके, मेरे पिण्ड शरीर को अपना निवास(धाम)बनाकर मेरी प्रसुप्त वाणी को जीवन देते हैं।और अन्य,हाथ पैर कान त्वचा आदि इन्द्रियों में भी प्राण के रूप में रहते हुए, क्रियाशील रखते हैं, ऐसे समस्त जड-चेतन के आधार परमपुरुष परात्पर परमात्मा को ,प्रणाम करता हूँ।

योन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयति अखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यान् च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् , प्राणान् नमः भगवते पुरुषाय तुभ्यम्।।
(भगवद् दर्शनकाले भक्तध्रुवः)

सब कुछ जो दीख निरन्तर,
बाहर भीतर सर्वाभ्यन्तर।
क्या है वह कौतूहल आया,
पहले मातृ अंक हरषाया।

भूख तृषा निद्रातुर रहकर,
उसे मिटाते माँ को पाया।
हुई प्रथम पहचान जननि से,
पिता यही पहचान कराया।

पुनः हुआ साक्षर गुरु माँ से,
तब,भाषाज्ञान सरस्वतिमन्दिर।
पूर्वशिष्ट अनुशासन पाया,
गुरु शिक् षक आचरण सिखाया।

मातृपितृ गुरुभक्ति बढ़ी तब,
कारणकार्य जगत दीखा।
जो अनुकूल मिला सुख पाया,
जो प्रतिकूल न दुख भाया।

हुई कृपा परमेश परम जब,
सद्गुरु करुणामूर्ति मिले।
जगी मनुजता उनकी दाया,
हुई सफल मानव काया।

वाह्य दृष्टि अन्तर में फेरी,
वही गुरू परमेश दिखे।
वही बोलता प्रेरक पाया,
सुनता “वही” गई माया।

श्रीगुरुहरी शरणम्।

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