खटकने का कोई आनन्द नहीं
अटकने का कोई आनन्द नहीं
भटकने का कोई आनन्द नहीं
भोगार्थ भ्रमण आनन्द नहीं
द्वन्द्वातीतानन्द, आनन्द जाने
जो सब हृदयन में बसा सभी में
बस, बास बसाये वही सही
पुनरावृत्ति, भोग ढिंग मत हो
करे कराये ना कराये भी वही।
हुआ है जो हो रहा है होगा भी
तभी जब सद्गुरू चरणन
की ज्योति, शुद्ध नेत्र होंगें।
कृपापारपारावारपूरपरिपूर्णदिव्य कर्म
जन्म उनकी कृपाकरुणाचितक्षेत्र होंगे।
और ना तरीका है सलीका
एकमेव मात्र रामकृष्ण हरि नारायण
कहता ही रहता। नरता तब पाता नाम राम राम कहै फिरे।राम राम कहे गहे दिव्य काय, बनता। वैकुण्ठ विगत कुण्ठ फल फूल फूला रहै, डूबा आकण्ठ और करता भी न करता।
दिव्यता दिव दिव्य दिव्य
सभी शिव होत भव्य भूमि
परम जब मातृभाव जानि कर्म करता।
रहता ना रहा है ना रहेगा कभी अभाव,
गुरुचरन परता बस एक ही है परता।
होती है अविस्मृत स्मृति गुरू की कृपा करूणा।पाई है शरणागति सदैव भाग्यमन्तों ने। रहता अनन्दभाव,कहते क्या कहते हम, जो भी,मिला मिल रहा है, मिलेगा आगे भी,चाहत देख चाही अनचाही दिया सन्तों ने।
ऐसे ही भावपूर्ण बनना है तो बनिये।
समुझि समुझि बूझि कृपाकातर रहिये।
पाकर कृपा की एक बूँद, बन जाता कुछ और ही,न कहते भी बनता जब आनँद ही
गहता। आनँद मध्य रहता तब कहता
क्या न कहता। हरिगुरुकृपा का लेशमात्र अवलम्ब गहि गहन गँभीर गर्व उसी पर करता।
एकमेव गुरुद्वितीय यही आधार है, उस आनँद को जानि,जो है जानता न कहता।
गुरुहरी शरणम्।