होगा कोई मुनि ज्ञान प्रबल। जो तपःपूत निर्मल अविकल। जिसका अन्तस गंगाजल बन।धो देता मायिक सब अनबन।
जब जलती अग्निशिखा भाषी। जब जलकण बनें अगम राशी।।तब छः मन्वन्तर मार्कण्डे देखते न समझे हरिमाया।यह कैसी अद्भुत है माया। श्रीव्यासपुत्र शुकदेव प्रभू।सब जान योगमाया प्रमान। रह छिपे मातृगर्भान्तर में।बारह बा रह वर्षान्तर में।
अब रही कामना शेष नहीं।
हम शुक मार्कण्डे नहीं सही।
पर उनकी ही सन्तानें हैं।
हम सब हरिमाया जानें हैं।
अब शीघ्र हटा सब तमस दूर।
दो शीतल चरणाश्रय अक्रूर।
अब हो न पतन।
अब हो न पतन।
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।
http://shishirchandrablog.in