गो गोचर मन जहँ लगि जाई।
सो सब जानहुँ माया भाई।
अभिमान ही अज्ञान है।
वाणी और वर्ण साधन भर हैं।
लेकिन निरभिमान तुलसी जैसों की। परं प्राप्त की परा वाणी,आश्रय लेने पर अपरा अविद्या को तिरोहित करेगी।
इस भयंकर कलिकाल में मायातीत जगत् के सन्तजनों की तदर्थानुभूतिमय वाणी
वाणवत् क्षणमात्र में कर देती है,अनुग्रह। और मिट जाता है,सभी असद् विग्रह। मिटता क्षण भर में ही जगत् का समस्त
अन्तर्द्वन्द्व।ध्वस्त नष्ट होते ही माया के, हो जाता निर्द्वन्द्व। संसार की मायिक सत्ता, काल कर्म नानाजन्म गुण स्वभावविवशीकृत मनुष्य को भी बना देती दास है।अच्छा लगता है जो विषयविष आसपास है। और फिरत दास सदा माया कर फेरा। छोड़ नहीं पाता बना माया का चेरा।एक और पतन की पुष्टि। कहीं जाओ होगी ही नहीं सन्तुष्टि।
इसलिये कि यह शरीर संसार चिरसखा हैं।करते रहते हैं परस्पर की ही पुष्टि।
मैं संसार में सर्वत्र रहता हूँ।
लेकिन दीखता नहीं।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः
इसलिये कि यह चर्मचक्षुग्राम शब्द स्पर्शादि तक ही गति करते हैं।ऐन्द्रिक अनुभूतियोजक आत्मा की आत्म दुर्गति करते हैं। दीखता उसे ही जिसका अन्तःकरण हो शुद्ध।
तुलसी सरीखों जैसी बुद्ध या प्रबुद्ध। और यों कहें कि जैसे केवल उसी के लिये उसी
की चाहत करे माया को आहत। सारी कर्मज्ञान इन्द्रियाँ बस बन जायँ प्रेम की। प्रेम भी प्रेम के लिये ही मात्रचित्र। लेकिन ज्ञानियों का चित्त भी हर लेती वही कैसी है विचित्र।
बरबस डालती व्यामोह में।
अजब गजब क्षणिक ऊहापोह में।
मन भी प्रेम तन भी प्रेम।चित्त भी प्रेम बुद्धि भी प्रेम अभिमान भी प्रेम।
जब सब हो जायं विशुद्ध प्रेम। तब मिटती माया क्षण क्षण रूपान्तरिता। क्योंकि शब्द, रामकृष्णहरि हरे माया।
नहीं तो नारायण, बारम्बार पड़े चक्कर में सब को काल खाया। सब कुछ खोया ही खोया कुछ भी न पाया। अतः करना पड़ेगा अनुग्रह अपने पर स्वतः। यह प्रामाण्य उपनिषद्दर्शन नहीं है परतः।
नव नव कर्म की मिली हमें स्वतन्त्रता।दिव्य मनुजन्म नहीं प्रारब्धतन्त्रता। अतः
त्यागो तुच्छ देहाभिमान अभी। व्यापेगी नाविद्या माया बनोगे धन्यातिधन्य तभी।
वाणी का प्रसाद तुलसी या कबीर का।
करेगा लक्ष्य पूर्ण और होगा महाबीर का।
गुरुहरी शरणम्।