बुद्ध श्रीरामकृष्ण की बातें करने वाले,बुद्ध और राम कृष्ण न हो जायें, यह उनका दुर्भाग्य है।
” मैं अपनी योगमाया से आच्छन्न होने के कारण सबके लिए प्रकाशित नहीं होता।”
नाहं प्रकाशः सर्वस्य,
योगमायासमावृतः।
डूब मरो बार बार नाचो नाना शरीरों और योनियों में,देहवादियों।
यह दुर्लभ मानव देह,उन्ही का सार्थक है,जिन्हे बुद्ध ईशा और राम कृष्ण चिन्मय और अमायिक दिखाई दिये।
शरीर एक ही है।उसी में मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय,उदर वैश्य और चरण शूद्र हैं।
शरीर मानव शरीर, किसी जाति कुल वर्ण में जन्मे,जबतक तुलसी रैदास कबीर जैसे तदाकाराकारित चित्तवृत्तिमहात्माओं में उसका मन नहीं जायेगा,ऐसे ही “माया”
की फाँस में फँसे रहना पड़ेगा।
वर्णाश्रमव्यवस्था पूर्ण विज्ञान सम्मत है। ऋषियों और उनकी इन्द्रियों के पार दर्शनक्षमत्व का परिणाम है।पागलों!
पल-पल दैहिक/ऐन्द्रिक सुख के लिए बेचैन मानवतन धारियों।पागल हो जाओ और पागलपन की पराकाष्ठा पार कर जाओ,उस “आत्मिक”आनन्द के लिए।
करो करो जल्दी करो,कूपहिं में यहाँ भाँग परी है, एक ही मानव शरीर में चारों वर्णों की अनुभूति करो।
आदर करो “सनातन”का जिसने वेदादिशास्त्र दिये,जिन्होंने,एक विशुद्ध
पूर्ण वैज्ञानिक वर्णाश्रमव्यवस्था निर्दिष्ट की। यही एकमात्र वह सर्वकारणकारण
आत्मा ही आत्मा की अनुभूति कर सकती है। “आत्मनि एवात्मना तुष्टः” हो जाओ।
अन्तः में विराजित उस निराकार निर्गुण को जान लो,जो ब्राह्मण क्षत्रियादि नहीं।
किसी का भी मानव देह इस ईश्वर का साक्षात् कर सकता है।लेकिन मैं देह नहीं, मैं इन्द्रिय नहीं।ऐसे परानुभूत रैदासजी तुलसीदास जी कबीर दास जी की परावाणी का आश्रय लो।
धन्य धन्य कर लो, देख लो इन्हीं आँखों से,जिस नित्य लीलाललाम राम को सन्तों ने देखा था।
यह परमहंस रामकृष्णदेव की वह धरती है, जिसे ऋषियों ने “माता” कहा था।
सभी जड़ चेतन मात्र इसी धरती माँ से जन्मे और इसी में मिल जाने वाले हैं।
बुद्ध ईशा वही।रामकृष्ण वही। तुलसीसूरकबीररैदास और मीरा भी वही।
जाओ इनके आत्म अनुभूत अक्षरों में खो जाओ अपना मायिक स्वरूप नष्ट कर दो।
वर्ना चक्कर में पड़े रहो “जातियों”के चक्कर में।गँवाते रहो अमूल्य मानव-जीवन।
राम ते अधिक राम कर दासा।
मोरे मन प्रभु अस विश्वासा।।
इसलिये राम और उनके दासों की भक्ति करो,तर जाओ।उतर जाओ, जहाँ तक वे उतरे थे। उतरो और तरो।
गुरुहरी शरणम्।
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