धर्म से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर में “एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतं” के अनन्य “गीतकार” महाभारतोक्त श्रीमद्भगवद्गीता की अत्यन्त प्रसिद्ध पंक्तियों का आश्रय लेकर चलना होगा।
ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
धर्म नहीं धर्म का निचोड़
“सारतत्व” क्या है, सुनो।
सुनकर धारण करो क्योंकि
” धारणात् धर्मः”जो धारण करके विवेक पूर्वक आचरण किया जाय,वही धर्म है।
“आचारः परमो धर्मः श्रुति उक्तः स्मार्त एव च” भगवद्वाणी भी इसी आचरण मूलक धर्म का प्रकाश करती है।
” आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
यही धर्म का तत्व है।
हम मनुष्य का कर्तव्य कर्म
(धर्म)पालन करें यही धर्म है।
जो हमारे(मनुष्य) लिये आचरण योग्य (रागद्वेष,हिंसा क्रूरता) नहीं है, उसे हम कदापि धारण न करे।
” हमारे वास्तविक मनुष्य स्वरूप के लिए उदारता करुणा दया क्षमा त्याग धैर्य आदि गुण आवश्यक हैं, इन्हें हम अवश्य धारण करें।”
यही ईश्वरीय गुण चेतना है।
हम निश्चित रूप से अविनाशी ईश्वर के अंश हैं।तो हम अपने विस्मृत ईशस्वरुप को स्मृत करके,अपनी स्मृति को जागृत रखने के लिए, समस्त जड़ चेतन जीव जगत्,यानी कि पशुपक्षीकीटपतंग और नदीपर्वतवृक्षादि सभी के प्रति भगवद् भाव से कर्तव्यकर्म करते हैं, तभी धर्म है, अन्यथा,अधर्म।
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।” की अतुलसी तुलसी सरस्वती इसी भाव का विस्तार और प्रकाश करती है।
इसलिये हम सभी ईश्वर की सन्तान, ईश्वरीय और दैवी गुणों के अनुकूल ही व्यवहार करें,यही धर्म है।
” हम अन्यों के साथ इन्ही मानवीय अनुकूल व्यवहार करने के कारण मनुष्य कहलाने के पात्र हैं”
“यदि कोई इन मानवधारणीय पालनीय कर्मो का आचरण नहीं करे,तो वह मनुष्य नहीं।”
“यदि कोई मेरे साथ उक्त मानवधारणीय करणीय कर्मों के विपरीत व्यवहार करे,तो वह मुझे स्वयं अच्छा नहीं लगेगा।”
यही “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
का श्रीकृष्ण परिभाषित धर्म है।
यह धर्म का सारत्व तत्व है।
गुरुहरी शरणम्
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