संसार में सबकी दवा है किन्तु मूर्खता की कोई भी दवा नहीं।
श्रद्धा और विश्वास को कभी भी पृथक् नहीं किया जा सकता।
किसी मूढ़ की वाणी से कोई भी सनातन मतावलंबी कदापि
सहमत हो नहीं सकता, तो मैं कैसे?
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ
मैं ऐसे भवानीशंकर को प्रणाम करता हूँ, जो श्रद्धा और विश्वास स्वरुप हैं।
इन्हे उसी प्रकार अलग नहीं कर सकते,
जैसे कि “बल”और “बलवान्” को।
कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के अन्दर निहित बल(शक्ति) को अलग करके अपने शरीर पिण्ड से बाहर नहीं दिखा सकता,जब तक कि वह चरम परम योगी न हो। और कोई योगी,ऐसा करे भी तो भी वह अपनी स्वयं की निःसारित शक्ति को अपने में स्थापित किये बिना पिण्ड(शरीर) में कोई स्पन्दन नहीं ला सकता।
यही मामला विश्वासश्रद्धा का है।
कोई सिरफिरा विषयवासनाविष से अमरत्व और मुक्ति की बेवकूफी भरी बात
इस भारत की सहिष्णु धरती पर कर सकता है, तो करे। भोगप्रवण व्यक्ति की नाना शूकरकूकर योनियों में भटक कर आने के कारण इसमें प्रवृत्ति होनी स्वाभाविक है। किन्तु वृत्ति, भोगसंस्कारी होगी तो कौन योग जगेगा? भोग को प्रारम्भिक क्षणों में आपातरमणीय मानने वाला “पश्चिम” इस अन्धविश्वास को सही मान कर एक अनर्थकारी “सिरफिरे” के पीछे चल सकता है। यह वही सिरफिरा है जिसने वेद,गीता,रामायण,उपनिषदादि
शास्त्रों को सद्गुरु परम्परया नहीं पढ़ा।
और विश्वास तथा श्रद्धा को अलग मान कर अर्थ का अनर्थ कर देता है। इसका
नाम बड़ा प्रसिद्ध है।यह सहज भोग प्रवृत्ति वाला केवल और केवल मूर्ख है।
सम्भोग से समाधियोग तक ले जाने की कुतार्किक परिणति वाला , भोगी व्यक्ति इस सनातन को क्या दे सकता है?
हम चूँकि नाना शूकर कूकर और यहां तक कि विभिन्न यक्ष किन्नर नाग गन्धर्व राक्षस लोकपालों की देवविशेष जातियों,
इन्द्रादि की भोग योनियों से भोगसंस्कार ले कर उपजे प्राणी हैं।अतः हम जैसों का किसी मूर्ख के प्रति भोगसंस्कारत्वेन आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं है।
हे भगवान् ऐसे नारकीय प्राणी, जिन्हे श्रद्धा और विश्वास में अलगाव दीखता है, सनातन वेद वेदान्त का अल्प बोध नहीं है, इन्हें भी क्षमा करना।
क्षमा करना इसलिये भी कि कभी न कभी तो भटका हुआ बेचारा भोगबेचैन “वह”
सनातन को सनातनी सद् गुरुओं से समझ कर तर जायेगा।
श्रद्धा-विश्वास शक्तिशक्तिमान् राधाकृष्ण सीताराम उमाशंकर इसे करुणा करके
“गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न, न भिन्न।बन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न”इस श्रद्धाविश्वासैक्य का बोध करा कर इस मूर्ख और इसके भोगमय विचलित अशुद्ध मनबुद्धिचित्ताहंकाररूप अन्तःकरण को शुद्ध कर ही देंगे।
शिवाशिवयोरभेदः का सनातन सम्मत मत
कोई मूर्ख विभाजित नहीं कर सकता।
“वेदान्तसार” में सदानन्द योगीन्द्र का वेद मत “गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्येषु विश्वासः
श्रद्धा ” सदा सर्वदा सर्वथा रूप में अखण्ड है। सद्गुरु द्वारा उपदेश किये गये वेद और वेदान्त वचनों में दृढ़विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
अतः विश्वास और श्रद्धा में भेद दर्शन पूर्ण
अवैदिक है। श्रद्धाविश्वासैक्य वेदसिद्ध है।
गुरुहरी शरणम्