शालग्रामराम



जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।

सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।

गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।


गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।

हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।

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सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।

शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।

अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।

हरिगुरू शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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