अध्यात्म नदी का जल बन कर
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।
यह हृदयदेश सुन्दर प्रदेश।
जहँ राजमान श्रीशक्तिमान।
जिनकी है चार भुजा शोभित।
है चार पुरुष का अर्थ कथित।
मनसा वचसा नारायण भज।
कर्मणा कुसंस्कार अब तज।
अज्ञान तमस तब दूर भगे।
जब ज्योतित आत्मप्रकाश जगे।
वह आत्मप्रकाश स्वयं ज्योतित।
अनुभवकारयिता कर्तासित।
हम वही दिव्यचेतनायुक्त।
गुणयुक्त भवार्णव सदामुक्त।
सद्गुरु नारायण करुणाकर।
कर कृपादृष्टि अब अपना कर।
यह कामक्लेश ना रहें शेष।
शरणागति दो हे भाववेश।
अब मुझे और ना कहना है।
तव अविरल स्मृति में रहना है।
अध्यात्म नदी का जल बन कर।
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।
गुरुहरी शरणम्।