जब नाम चले


सारे सनातन धर्म में बात कही एक सार।
जपो जपो रामनाम और सबही है असार।

कही आदि शंकर ने रामानुज ने भी कही।
मध्व आचार्य आचार्य निम्बार्क भी यही।
वल्लभ भी विशुद्ध नाम रटनकी बातकही
जनमि प्रयागराज रामानन्दाचार्य कही।
रामकृष्णहरीनामरती मति विशुद्ध सही।

पन्द्रह सौ ईसवी में धन्य बंगाल धरती।
जो है महाप्रभू चैतन्य को धरती।
हुआ कलिकाल धन्यधन्य हुए लोग सभी।
माधव युगल भाव लेकर आए वे जभी।

कहा कृष्णनामसंकीर्तन है आत्मास्नान।
हर एक नाम अमृत पूर्ण आस्वादन।
आनँद समुद्र ओर छोर नहीं पारावार।
रामनाम कृष्णनाम जीवन का आरपार।
विद्या रूप भामिनी का पती यही नाम है।
श्रेयस्चक्रवाक की है चन्द्रिका को कामहै।
चित्त रूपी दर्पण को शुद्ध करे नाम है।
भवमहादावानल बुझाए कृष्ण नाम है।

श्रीमच्चैतन्य की नामरससिक्त वाणी,
जो “शिक्षाष्टक” में यही भाव लेकर बही-

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।श्रेयःकैरव –
चन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वा –
दनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।।1।।

नाम्नाम् अकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतावती तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इह अजनि नानुरागः।।2।।

हे राम मेरे कृष्ण तुमने नाम में शक्ती भरी।
स्मरण में भी काल तुमने है नहीं नीयत करी। बस करो इतनी लघु कृपा मिट जाय
दुर्दिन-बन्ध का।तव नाम रटते मिले ज्योति, हटे भवाभव अन्ध का।

नारायण! चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के पद्यद्वय। करते सदैव ये दृढानुराग वैसा न करै कोई अद्वय।
देखिये,
मन्त्रजप में विधि अनिवार्य है।नामजप विधि से परे कार्य है।

जिह्वा पर स्वादानुभव हो चाहे मत हो जपते-जपते नामी प्रकट-प्रत्यक्ष हो जाता है।
तब इन्द्रियातीत स्वाद आता है,मायातीत जगद् अनुभूत होता है, यह पार्थिव शरीर
अपार्थिव, सच्चिदानन्दरूप ही शेष रहता है। इसलिये
श्रीमन्नारायण गुरु कृपया हो नाम राग अनुराग पले।भौतिकशरीर के धर्म भोग सब नष्ट भ्रष्ट जब नाम चले।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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