लम्बेलम्बे श्वास प्रश्वास में चलते प्राणवायु स्वरूप परमात्मा का अनुभव करो जो
सारी चेतना का मूल है।पंचवायु, पंचभूत पंचविषयप्रपंच,पंचदेवों की उपासना
ज्ञान और भक्ति है।
श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा नासिका इन्ही
प्राण अपान उदान समान व्यान से ही चलितचालित है । वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ आदि पंच कर्मेन्द्रियसंघात भी इन्ही पंचवायु द्वारा संचरित हैं।
मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्भुज भगवान् हैं जिनके कारण दशेन्द्रियाँ अपने शब्दादि विषयों में समुचितचेष्टाशील हैं।
और सारी चेष्टा के अनन्त मूल
श्वासप्रश्वासप्राण को मत भूल।
इसी में चराचरजगत् स्पन्दित है
इन्द्रियातीतवृत्ति भी आक्रन्दित है।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।