इन्द्रियों से इन्द्रियातीत

लम्बेलम्बे श्वास प्रश्वास में चलते प्राणवायु स्वरूप परमात्मा का अनुभव करो जो
सारी चेतना का मूल है।पंचवायु, पंचभूत पंचविषयप्रपंच,पंचदेवों की उपासना
ज्ञान और भक्ति है।
श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा नासिका इन्ही
प्राण अपान उदान समान व्यान से ही चलितचालित है । वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ आदि पंच कर्मेन्द्रियसंघात भी इन्ही पंचवायु द्वारा संचरित हैं।

मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्भुज भगवान् हैं जिनके कारण दशेन्द्रियाँ अपने शब्दादि विषयों में समुचितचेष्टाशील हैं।

और सारी चेष्टा के अनन्त मूल
श्वासप्रश्वासप्राण को मत भूल।
इसी में चराचरजगत् स्पन्दित है
इन्द्रियातीतवृत्ति भी आक्रन्दित है।

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।

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जब नाम चले


सारे सनातन धर्म में बात कही एक सार।
जपो जपो रामनाम और सबही है असार।

कही आदि शंकर ने रामानुज ने भी कही।
मध्व आचार्य आचार्य निम्बार्क भी यही।
वल्लभ भी विशुद्ध नाम रटनकी बातकही
जनमि प्रयागराज रामानन्दाचार्य कही।
रामकृष्णहरीनामरती मति विशुद्ध सही।

पन्द्रह सौ ईसवी में धन्य बंगाल धरती।
जो है महाप्रभू चैतन्य को धरती।
हुआ कलिकाल धन्यधन्य हुए लोग सभी।
माधव युगल भाव लेकर आए वे जभी।

कहा कृष्णनामसंकीर्तन है आत्मास्नान।
हर एक नाम अमृत पूर्ण आस्वादन।
आनँद समुद्र ओर छोर नहीं पारावार।
रामनाम कृष्णनाम जीवन का आरपार।
विद्या रूप भामिनी का पती यही नाम है।
श्रेयस्चक्रवाक की है चन्द्रिका को कामहै।
चित्त रूपी दर्पण को शुद्ध करे नाम है।
भवमहादावानल बुझाए कृष्ण नाम है।

श्रीमच्चैतन्य की नामरससिक्त वाणी,
जो “शिक्षाष्टक” में यही भाव लेकर बही-

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।श्रेयःकैरव –
चन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वा –
दनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।।1।।

नाम्नाम् अकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतावती तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इह अजनि नानुरागः।।2।।

हे राम मेरे कृष्ण तुमने नाम में शक्ती भरी।
स्मरण में भी काल तुमने है नहीं नीयत करी। बस करो इतनी लघु कृपा मिट जाय
दुर्दिन-बन्ध का।तव नाम रटते मिले ज्योति, हटे भवाभव अन्ध का।

नारायण! चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के पद्यद्वय। करते सदैव ये दृढानुराग वैसा न करै कोई अद्वय।
देखिये,
मन्त्रजप में विधि अनिवार्य है।नामजप विधि से परे कार्य है।

जिह्वा पर स्वादानुभव हो चाहे मत हो जपते-जपते नामी प्रकट-प्रत्यक्ष हो जाता है।
तब इन्द्रियातीत स्वाद आता है,मायातीत जगद् अनुभूत होता है, यह पार्थिव शरीर
अपार्थिव, सच्चिदानन्दरूप ही शेष रहता है। इसलिये
श्रीमन्नारायण गुरु कृपया हो नाम राग अनुराग पले।भौतिकशरीर के धर्म भोग सब नष्ट भ्रष्ट जब नाम चले।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

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विरत मति दो


नारायण ! मैं अपनी अपनी कोई बात नहीं थोप रहा । मेरा मनगढ़न्त विचार नहीं।
श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने व्रजभू में एक महत्वपूर्ण बात कही थी।विचारणीय है विषय।विवेच्य है आशय।

विचरती मेरी मति ने कही।
मेरा विचार तो है प्रभु यही।
क्या सही क्या न सही।
हमें क्या बार बार किसी
भोग के लिए मिलेगी मही।
नहीं नहीं नहीं नहीं।
राधामाधव युगल भाव को लेकर इसी कलिकाल में बंगाल की धरती पर पन्द्रह सौ ईसवी में अवतीर्ण हुए चैतन्य महाप्रभु जी ने आठ पद्य मुमुक्षुओं के मंगल हेतु रचे थे।
किसी भी स्वतन्त्र ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया था। महाप्रभु जी के आठ श्लोक सभी प्रणयी भक्तों में “शिक्षाष्टक” नाम से
प्रसिद्ध हैं।उन्होंने भगवन्नाम संकीर्तन से नाना प्रकार के हमारे सदृश अनेक विमुख
विषयी जीवों का उद्धार किया।नारायण !
यह समस्त संसार भगवद् विमुख प्राणियों
के लिए बार-बार आवागमन का कारण बनता है। महाप्रभु जी इस संसार में किसी वस्तुव्यक्तिपदपदार्थ में कोई राग स्वीकारते नहीं।
राग का कारक और कारण कौन है? कौन है जो नाना इन्द्रियों में चेतनासंचरण करते हुए अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों का अनुभव कराता है?
वह तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् परमात्म सत्ता भगवन्नामधारिणी ही तो है, जिससे यह पिण्ड शरीर सबको ज्ञान का विषय बनाता है। वही प्रज्ञानं ब्रह्म है।
सगुण साकार व्यावहारिकी और नित्य लीलाललाम दृश्यमान भगवान् अवध और व्रज में भक्तों हेतु उतर कर अजस्र आनन्दरस में उन्हें सरस कर दे रहे हैं।
यही रसधार बहाई महाप्रभु ने और अनुभूति भी कराई।और भगवद्विरह में व्याकुल होकर नाम ही रटने की शिक्षा आचरित करके मानव में आनन्द ही मानो रचित कर दिया।अपने शिक्षाष्टक में प्रभु ने कहा- भगवद् विरह मे एक पल भी युगों जैसा हो गया है । नेत्र वर्षा ऋतु की अवतारणा करते हैं। इस गोविन्दविरह में मुझे सारा संसार सूना-सूना दीखता है।

“शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे”

इन्हीं महाप्रभु जी के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में एक बड़ी बात कही थी।
जो आज भी व्रजरज के कण-अण में भक्तों द्वारा अनुभूयमान है।इसी तरह की
ऐसी ही दृष्टि दी थी कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में अनित्यसम्बन्धों के चक्कर में चकराने वाले अर्जुन को भगवान् ने।उन्होंने मान और अपमान को तिरोहित करने का आदेश किया था-“मानापमानयोस्तुल्यः
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः” कहकर।
यही भक्त की दृष्टि विचारधारा, संसार से मुक्ति का सूत्रवत् सूत्रपात करती है-अब मूल बातयह कि श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में क्या कहा –
“सम्मानं कलयातिघोरगरलं
नीचापमानं सुधा।”

सम्मान को घोर विष और अपमान को विषवत् समझो।
पूज्य गोस्वामी जी ने भी सूत्र दिये थे-

सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।

लोकेषणा सम्मान का प्रतिस्फुटन है।ये सब बाध्यकारी भोग के लिए स्वस्वरूप
से विच्युत करके जीव को नाना प्रकार के नरकस्वर्गादि लोकों में ढकेलने वाले हैं।

मानापमान माना कि द्वन्द्व हैं।
लेकिन दोनों ही अन्तर्द्वन्द्व हैं।
मन की “मथनी” रूपिका है।
नाना शरीरों की भूमिका है।

दोहावली में बाबा ने कहा।

एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह। उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।

यह दशा ब्रह्मर्षि की देखी।
तब अपनी क्या कहें लेखी।

अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।सकल जीव जग दीन दुखारी।

वही स्मरण करायें कृपा मनुहार यहीं। अपने साधन का कोई अहंकार नहीं।

ऐसे प्रभु का अपने में गुरुकृपया जब होगा दर्शन।
तब कटे हमारे जैसे विषयी जीवों का विषयस्पर्शन।

अतः सर्वत्र दीखे वही।
चाहिए न और कुछ सही।
हे अचाह मुझे बनाओ अचाही।
कराओ अपने में रमण सदा ही।

पाकर तुम्हें शान्त अक्षय होंगे हम सदा ही
हम तुम्हारे रहें त्रिकाल सत्य सदा ही।
अपनी स्मृति में अक्षुण्ण अविरत रति दो।
आपात रमणीय संसार से विरत मति दो।

हरिः गुरुः शरणम्।

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