सुन्दरी शूर्पणखा, स्वर्णमृग मारीच और भिक्षुक रावण इन सभी का अपना मूल “असुरत्व” है।ये सभी अपने असुरत्व के विपरीत,क्रमशः सुन्दरता, स्वर्णाकारता और साधुता को धारण करते हैं।
जगदम्बा जानकी ने किसी पर अविश्वास नहीं किया था।वह वास्तविकता भी जानती थी।किन्तु “परात्पर ब्रह्म” की परा “शक्ति” सगुण साकार मानव लीला कर रही थीं। मानवीय स्वभाव के अनुरूप सहज विश्वास और “कबीर की साखी” “कबिरा आप ठगाइए और न ठगिये कोय।आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय” के मानवीय-वैचारिक आदर्श को जो प्रदर्शित कर रही थीं।इसीलिये संकट का नाटक कर रही थीं। अब देखिये
“जीति को सकै अजय रघुराई।माया ते असि रचि नहिं जाई।”कह कर “जननी” अपनी सगुण साकार लीला विलास में पूरा विश्वास दिखाते हुए उसे युक्तिसंगत भी सिद्ध करती हैं।
लेकिन “भगवत्ता” और सृष्टि की “सूत्रधारिता” इसी से खुल जाती है। क्योंकि “माया ते असि रचि नहिं जाई” कहकर “विद्यामाया”और भगवान् की “चिरसंगिनी” “अवियुक्त” माया ने संसारी माया को प्रकट प्रत्यक्ष कर दिया। नि:सन्देह “अजय” “रघुराई” कहते ही “परात्पर ब्रह्म” के अपरस्वरूप “सगुण साकार” दशरथ नन्दन”श्रीराम”की भी “मानवाकारता” पर से पड़ा पर्दा “माँ” ने एक झटके से हटा कर “उन्हे” सर्वकारण कारण जतला दिया।
संसार रचयिनी “अविद्यामाया” को भी
रचने और संचालित करने वाली “यह” “विद्यामाया” जो ठहरीं।
इसलिये मानव लीलावश “माता”ने तो शूर्पणखामारीचरावण की अनभिज्ञता का “नाटक” ही किया।नारायण!यह तो वस्तुतः”रामरामा” सबको नचावनवारी हैं।
सबहिं नाचावत राम गोसाईं। अरे नारायण
जिसकी भृकुटि विलास से सृजन पालन संहार कर्त्री अविद्या माया क्षणार्ध में तत्पर हो जाती है।और सृजनादि कार्यों में लग जाती है,उसे क्या स्वप्न में भी कोई संकट विपत्ति अथवा विपरीत मति हो सकती है?
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई ।
सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।
गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।