किम् आश्चर्यम् अतः परम्

इससे बड़ा इस मनुज शरीर का कोई भी आश्चर्य नहीं है कि,नर तन पाइ विषय मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।

मन मनन करता रहे संसारविषभोगों का।
है सतत न्यौता यही भव भवज रोगों का।

मन जब भगवान् या भगवती के किसी नामरूप में चला जाये।सब मतलब सिद्ध।

नंबर एक, हम क्या हैं, जान जायेंगे।
नंबर दो, सामने प्रत्यक्ष संसार की वास्तविकता समझ में आ जायेगी।
नंबर तीन ,सब रोनाधोना,मिट जायेगा।
नंबर चार, आनन्द ही आनन्द शेष बचेगा।

अतः आनन्द ही आनन्द में रहना है, तब इस अपने पिण्ड शरीर का और प्रत्यक्ष संसार का रहस्य जानना चाहते हो,तो सरल उपाय है-

सरल बनो,साधुस्वभाव के हो जाओ। किसी सुरक्षा उपकरण की जरूरत नहीं।No, need to security.
साधु सन्त के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे।
अतुलितबलधाम,अन्जनी कुमार, रामदूत, श्रीहनुमानजी महाराज कृपा करेंगे।

करना क्या है, केवल भगवन् नाम का जप, राम जपो राम जपो राम जपो भाई।
(श्रीविनयपत्रिका)
शरीर पूरा होने पर,जब दूसरे लोग, अपने कर्तव्य कर्मवश राम-राम , नाम रटें, तो वह सूक्ष्म शरीर, (प्राण) जो लम्बे समय से,उस पार्थिव पिण्ड में था,राम नाम को
सूक्ष्म शरीर से सुनता तो है, लेकिन भारी विपत्ति, रामनाम स्वयं नहीं ले सकता।

अस्तु ” राम राम राम , जीह जौ लौं तू न जपिहै,तौ लौं तू कहूँ जाय ,तिहूँ ताप तपिहै।”(श्रीविनयपत्रिका)

इसीलिये इस मानव देह का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है, कि जिन भगवान् की करुणा से यह नरतन, बर्तन मिला है, उसमें संसार का वैषयिक भोग ही बसा है,क्योंकि “महदाश्रय” नहीं मिला, और महदाश्रय(महापुरुष)इसलिये अनुपलब्ध कि, “रामनाममहाराज” चित्त में नहीं आते। रामनाम सरल सुलभ है। हमने
ऐसे भारत देश में जन्म लिया है, जहाँ की सभ्यतासंस्कृति,अनादि है,सनातन है।

जहाँ गली-गली में हनुमानजी के मन्दिर मिलेंगे ,अनगढ़ पत्थर शिवरूप में पूजे जा रहे हैं।और “शिव” हैं कि अहर्निश रामनाम
सादर जपते हैं।
“तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती” (श्रीराचरितमानस)

हमें राम राम रटना ही तो है,मन में,और
हमारी जीभ हमारे वश में है।
जो हम चाहते हैं, एड़ी चोटी लगा देते हैं, उसे पाने,खाने के लिए।और खाद्याखाद्य खाकर सन्तुष्ट भी हो जाते हैं।फिर खाने की जरूरत बनी रहती है।
अरे! खाओ चबाओ पीओ राम नाम, अनुभव करके देखो। जिह्वा हमारी है, हमारे वश में है।
दुर्भाग्य! है कि, ऐसा मानव शरीर पाकर भी, नापजप हर क्षण,न करके संसार का चिन्तन करते-करते पुनः गिरना, पुनः दूसरे शरीर पाने की यात्रा की ओर हम
इस “रथशरीर” को आगे बढ़ा देते हैं।

रामकृष्णनारायण दुर्गारमा सरस्वती काली नामों को चौबीसों घण्टे जप कर,ही संसार, पर काबू पाओगे।
संसार की संपदा भी मिलेगी।
परलोक भी बनेगा ,लेकिन,कैसी प्रचण्ड माया है।लुभाये,भुलाये बैठी है।
नारायण !भाग जायेगी “माया” लेकिन केवल “नामजप”से।
इसके बिना हम दुर्दशाग्रस्त होकर नरकों और नारकीय शरीरों की प्राप्ति बार-बार करते जा रहे हैं।


राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई।।

सुलभं भगवन् नाम ,जिह्वा च वशवर्तिनी।तथापि नरकं यान्ति किम् आश्चर्यम् अतः परम्।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

http://shishirchandrablog.com

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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