ध्यान रखें यह ऋषियों की,वेदपुराणों और अजन्मा भगवान् के द्वारा जन्म लेने वाले रामकृष्ण की धरती है।
यहाँ किसी का “भोगवाद” नहीं चला, चल भी नहीं सकता।
हमारे सनातन धर्म में दान का अर्थ हमारे पूर्वजन्म के शरीर के प्रारब्धकर्म से मिली धरतीधनादि को देने से है। जब हम अत्यंत श्रद्धा पूर्वक, किसी भी वस्तु,पदपदार्थ,जमीन ,मकान दुकान, रूपयापैसा,जो हमारे अधिकार में है, उस पर अपना अधिकार स्वयं समाप्त कर, किसी दूसरे को, इन सबका अधिकार सौंपते हैं।
तब वह ” दान” कहा जाता है।यह हमारा धर्म शास्त्र है।
भगवान् ने बिना श्रद्धा के,किये दान को “असत्” कहा और ऐसा दान इस लोक और परलोक दोनों में कोई फल देने वाला नहीं होगा,ऐसा बताया है।
“अश्रद्वया हुतं दत्तं तपः तप्तं
कृतं च यत्।असद् इति उच्यते पार्थ! न तत् प्रेत्य नेह च।।”
अतः दान की सनातन धर्मनिष्ठ विधि व्यवस्था जानकर ही दान में प्रवृत होना
चाहिए।
किसी “विधर्मी” की मीठी-मीठी बातों से सावधान रहना चाहिए ।हमारी आत्मा रामकृष्णनारायण हैं।हमें उनकी वाणी का अक्षरशः पालन करना चाहिए।और
भगवान् की कथा नित्य ही सुननी चाहिए,क्योंकि केवल वही हमारे अन्तः इन्द्रिय मनबुद्धिचित्ताहङ्कार के मालिन्य
की सफाई करती है।
हम अपने शरीर घर द्वार की सफाई जैसेकि रोज-रोज करते हैं।उसी तरह उक्त “अहमादि” की मलिनता (गन्दगी)को जैसी हरिकथा शुद्ध कर देती है, वैसी और कोई नहीं।
“हरिकथा” और कुछ नहीं रोज-रोज का “सत्संग” ही है।
हरिकथा सुनने से श्रीहरि चित्त में आ विराजते हैं।”हरिः चित्तं समाश्रयेत्”और
“बिनु सत्संग न हरि कथा ,तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गये बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग।”
संसार के त्रिविध गुणों ,सद् रजःतमः से
मलिन बनता रहता मन और चित्त कभी भी भस्मसात् हो चुके समस्त शुद्धसाधन
वाले कलियुग में विशुद्ध नहीं हो सकता।
केवल और सन्तसंगहरिकथा ही मलिन जीव के अन्तःकरण को परिमार्जित करती है।
इसलिये नित्य भगवत्कथा से मन को नहलाना धुलाना होगा। तब विवेक जागेगा।बस समझिये हो गया काम।
और दान तो श्रद्धा से, किसी जोर दबाववश नहीं हो,ऐसा वेद भी कहते हैं।
“भय मानते हुए, कि यह सब मेरा नहीं प्रभु का है, दान करो। सम्पति,सामर्थ्य के अनुसार दान करो । लजाते सकुचाते हुए दान करो ।”
“भिया देयं,श्रिया देयं,ह्रिया देयम्”
“तैत्तिरीय” उपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली
विभीषण को जब श्रीमान् रावण,लात मारकर राज्य से भगा देते हैं, तब वह श्रीभरत जी सेवित श्रीराम के चरणों में जाकर गिर पड़ता है।
भगवान् उसे उठाकर गले लगाते हैं, बगल में सादर बैठाते हैं।और तत्क्षण “लंकेश” ही कह देते हैं।
” कहु लंकेस सहित परिवारा
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।
खल मंडली बसहु दिन राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
अब देखिये, भगवान् तो सबके अन्तर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। भगवत्ता, जिसे छिपा कर वह मर्यादा में रहते हैं,एकाएक प्रकट हो जाती है।
बिना लंका का राज्य मिले ही लंकेश कह डालते हैं।
अपना दर्शन संसार में अमोघ (कभी व्यर्थ न होने वाला ) कहते हैं।और लंका के सिंहासन के अनिच्छुक विभीषण का “राजतिलक” ही कर डालते हैं। आकाश
से देवता फूल बरसाते हैं। इसलिये कि “रावण का काम तमाम” होना सिद्ध हो गया।
“जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।मोर दरस अमोघ जग माहीं।।अस कहि राम तिलक तेहिं सारा।सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।”
और नारायण! दान के विषय में स्वयं परमात्मा “वेद” की मर्यादा रखते हुए, सकुचाते लजाते हुए लंका का राज्य सौंप देते हैं।
अतः अपना कुछ भी नहीं है ।प्रारब्धवश जो कुछ कहने के लिए मेरे हिस्से का स्वतः उत्तराधिकार वश या स्वयं श्रम करके हमने पाया है,उसे ईश्वर का माने।
“दानम् एकं कलौ युगे” इस व्यास वचन को विचार करके,श्रद्धा से दान दें।
क्योंकि सतयुग, त्रेता,द्वापर में क्रमशः तप,ज्ञान,यज्ञ(तपः परं कृतयुगे,त्रेतायां ज्ञानम् उच्यते।द्वापरे यज्ञम् एव आहुः दानम् एकं कलौ युगे) “धर्म”की धुरी रहा है।और कलियुग में दान ही धर्म की धुरी है।
इसीलिये भगवान् भी स्वयं की श्वास से प्रकट ” जाकी सहज स्वास स्रुति चारी”यस्य निःश्वसिता वेदाः” वेद की मर्यादा की रक्षा करते हुए संकुचित होते हुए, विभीषण को दान करते हैं।
“यह दान वैदिक मर्यादा का दान है।”
“अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड की अनन्त सम्पदायें सब भगवान् की हैं।”
तब भी नरलीला में भगवान् नागरिक मर्यादा सिखाने के लिए लजाते शर्माते लंका का राज्य विभीषण को देते हैं –
जो संपति सिव रावनहिं दीन्हि दिएँ दस माथ।सोइ संपदा बिभीनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।।
गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।
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