तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्
ईशावास्यं इदं सर्वम्
भगवच्चेतना,यत्र-यत्र-सर्वत्र व्याप्त है।
उसके सिवाय कुछ है ही नहीं।
आवश्यकता है, अनुभूति की।
वह परमात्मा इस,ब्रह्माण्ड को रचकर,
इसमें प्रवेश कर गया।और यह समस्त जीवजगत् “उसीका” आवास है।
अतः जड़-चेतन-प्राणि-मात्र की हिंसा अथवा उनके प्रति हिंसा का भाव रखना ईश्वर के प्रति हिंसा है।
मनुष्य शरीर मनुष्य बनने के लिए मिला है।”मनुर्भव”।
किसी भी अच्छे-बुरे भोग भोगने ओर किसी भी अन्य शरीर में जाने के लिये नहीं मिला है।
अतः हरि गुर सन्त वाणियों का महदाश्रय ग्रहण करें।
नारद-शुक-सनकादि-व्यास
अपनी-अपनी वाणियों में आज भी अपने “ग्रन्थरूप”
में विराजे हैं।
“बिना महत्पादरजोभिषकम्”
तुलसी-कबीर-सूरमीरा-रैदास
आज भी” जीवन्त”हैं।भगवत् स्वरूप होकर सार्वकालिक हैं। अपने-अपने “आत्मानुभूति” परक भगवत् कथा-लीला-गुण-रूप ग्रन्थों में प्रत्यक्ष होकर दीख रहे हैं।
हाँ,इन सबका, किसी एकं का सहारा तो लेना ही होगा।
दुर्लभ हैं,तीन चीजें इस भवाटवी में, असारसंसार के “मायाजाल”में।
1-मनुष्यता।मानवीय(भगवान् के ) गुणों -करूणाक्षमादया की अभिव्यक्ति,स्वीकार्यता,
ग्राह्यता, अभिज्ञान(पहचान)
और तदनुरूप नैत्यिक व्यवहार।
2-मोक्षेच्छा।जन्म-मृत्यु के बन्धन से छूटने की इच्छा।
3- सन्तसद्गुरु का चरणाश्रय
यह सभी दुर्लभतम चीजें भगवान् की कृपानुग्रह के विना मिलेंगी भी नहीं।
मनुष्य का शरीर ही –
“हरिः ओ३म् तत् सत्” की करुणा से प्राप्त है।हम जैसे मलिनचित्तजीव की ऐसी योग्यता कहाँ?
कबहुँक करि करुना नर देही,देत ईस बिनु सनेही।
आद्याचार्य भगवत् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में ऐसी विवेकवाणी व्यक्त की-
दुर्लभं त्रयम् एव इदं, देवानुग्रह-हेतुकम्।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः।
अतः मनुष्य जीवन निरर्थक न होने पाये,इसके लिये “हिंसात्याग” कर हरि गुरु सन्तों की बात मान कर, तत्क्षण “शुभ” हेतु प्रयास करें।
मातु-पिता हरि गुरु की बानी।
बिनहिं बिचार करै शुभ जानी।।
महद् आज्ञा का उल्लंघन, पतनोन्मुख करेगा।
अतः कालिदास कहें -” गुरूपदेश आज्ञा, विचार किये विना,पालनयोग्य है।
आज्ञागुरूणां हि अविचारणीया”अथवा
तुलसी,-“अनुचित उचित बिचार तजि जे पालहिं पितु बैन,ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन”
इसे जीवन का पाथेय बनायें।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्