बिना नाम जपे संसार में गुजारा नहीं।
जिन्होंने इस संसार को गुजर जाने को बाध्य किया,वे बड़े-बड़े नामजापक अनुकरणीय हैं, जिन्होंने माया को ठेंगा दिखा दिया। व्याख्येय विषय की मीमांसा
रामकृष्णनारायण नामोच्चारण से प्रारंभ की जा रही है।
नारायण! यह शरीर पाँच तत्वों -” क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।” है।
यह जड़ तत्व हैं। इनमें कोई स्पन्दन नहीं। निर्लेप, निर्गुण, निराकार, आत्मा जो परमात्मा का अंश है, उसके शरीर में स्थित रहने से यह क्रियाशील रहता है।
“गगन समीर अनल जल धरनी।इनकै नाथ! सहज जड़ करनी।”ये शब्द समुद्र ने सुन्दरकाण्ड में रघुनाथ जी से कहे थे।
वस्तुतः शास्त्र और सन्त सारे ब्रह्माण्ड को भगवान् की “माया” द्वारा रचित मानते हैं,जो कि परमसत्य है। इस माया का वर्णन श्रीकागभुशुण्डि जी ने गरुड जी के समक्ष,उन्ही के उत्तर के रूट में “उत्तर काण्ड” में किया है-
“सुनहु तात यह अकथ कहानी।समुझत बनइ न जात बखानी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखराशी । सो मायाबसभयउ गोसाई ।बन्ध्यौ कीरमर्कट की नाईं ।जड़ चेतनहिं ग्रन्थि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।तब ते जीव भयउ संसारी।छूट न ग्रन्थि न होइ सुखारी।”
यह जीवात्मा जो पंचतत्व के “पिण्ड” में बैठा है, निश्चित रूप से अविनाशी, चेतना पूर्ण निर्मल,स्वाभाविक सुखपूर्ण, रहनेवाले “ईश्वर” का “अंश” है। वह “ईश्वर” हमारा “अंशी” है।और हम उसके “अंश” मात्र। सत् रज और तम यही कुल तीन गुण हैं। लेकिन यह यह गुण – अविद्यामाया ( प्रकृति) के हैं।
सत् रज और तम गुणों का क्रमशः तीन – सुख-दुःख-मोह, यह कार्य है।
इस जड़ ” पिण्ड” शरीर में उक्त सुख दुःखादि , इन्हीं के कारण, अनुभव में आता है।
यह माया भगवान् की है।
इस माया के दो रूप हैं।
1-अविद्या माया (इसीसे संसार में चेतना है)
2-विद्यामाया(भगवान् की चिर संगिनी, कभी भी क्षण मात्र के लिए भी वियुक्त न होनेवाली सरस्वती,लक्ष्मी और उमा)
मूलरूप में “विन्ध्यवासिनी” जो, दुर्गा-सीता-राधा रूप में कार्यविशेष से “अवतरित” हुई, भगवान् की चिरसंगिनी
“विद्या माया” है।
अतः माया के विषय में यह दो रूप अवश्य जानना चाहिए।
अब देखिये, गोस्वामी जी की पंक्तियों की यह अर्धाली – सो माया बस भयउ गोसाईं।बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।
मतलब कि ऐसे निर्विकार चेतन,परमात्मा का अंशभूत यह जीव सुख में रहना चाहिए, किन्तु उक्त प्रकृति यानी कि ” अविद्या माया” के सद् रज तम आदि गुणों में जकड़ कर बँध जाता है।
जैसेकी कीर(तोता) और मर्कट(बन्दर) पिंजर-डोर में बँध जाते हैं।वैसे ही यह मनुष्य भी माया के मायिक गुणों से बने संसार की भूलभुलैया में अपना ईश्वरीय आत्मस्वरूप भूल कर बँधा है।
नारायण!त्रिविध गुणों(मायिक गुणों)के कारण इस संसार में बन्धन और बार-बार जन्म होता है।
सृष्टि चलाने के लिए ही यह माया (अविद्या माया) और उसके गुणों की आवश्यकता भी है,लेकिन बस उतने मात्र के लिए ही।और सबसे बड़ी बात कि, यह ज्ञान , कि यह माया के गुण हैं, इसे बताते हैं ‘सन्तसद्गुरु’। ये सद्गुरु हैं –
सूर ,कबीर, तुलसी,नानक, मीरा, रैदास, जो अपने “आत्मानुभूत” वाणियों के माध्यम से”ग्रन्थाकाररूप”में जीवित हैं।
इनके पहलेभी- नारदव्यास,शुक,सनकादि, के रूप में अपने स्वानुभूत परमात्मचिन्तन ग्रन्थों( कृतियों ) भक्तिसूत्र ,भागवत आदि पुराणों के रुप में वे आज भी जीवन्त अनुभव किये जा रहे हैं।
बिना इन सन्तसद्गुरुओं का आश्रय लिये
भगवान् की दुस्तर माया और त्रिविध गुणों के झंझावात रूप शरीरसंसार से विरति सम्भव नहीं।
“हरि माया अति दुस्तर,तरि न जाइ बिहगेस।” उत्तरकाण्ड।
मायाधीश भगवान् कृष्ण ने मायाधीन
इस जीवात्मा को इससे बचने और माया की गाँठ(फाँस) से बचने के लिए अर्जुन के माध्यम से जीवजगत् को सन्देश दिया
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ति मायामेतां तरन्ति ते।
और कहा कि-
मद् भक्तानां तु ये भक्ताः ते मे भक्ततमाः मताः। गोस्वामीजी ने भी उत्तर काण्ड में कहा- “मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।राम तें अधिक राम कर दासा।”
भगवान् की त्रिवधगुणमयी माया से पार पाना अत्यंत कठिन है। जो नामरूप लीलाधाम के द्वारा मेरे भक्तपरायण हो जाते हैं, वे ही इससे मुक्त हो पाते हैं। नारदशुकसनकादि हनुमानजी जैसे भक्तों के जो भक्त बन जायें, तो ही सब समस्या का समाधान है।क्योंकि “भक्तभक्त” मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। और इस भक्त का भक्त बनकर अविद्यामाया के पार जाकर मानवजन्म सफल होगा।
और रह गई ईश्वरीय माधुर्य गुणों की तो, यह करुणा दया, क्षमा, सहजता सरलता,वात्सल्य आदि रूपों में निरन्तर वर्षाधारा की तरह , उन्ही ईश्वर की अभिन्न (शक्ति) विन्ध्यवासिनी-दुर्गा-सीता और उमा-राधा रूपों के माध्यम से बरबस कृपा बरसा रही है।
इसीलिये बरसाने में यही “शक्ति” बरसाने वारी कही जा रही है।किन्तु केवल भक्तों का भक्त बनकर,उनके माध्यम से ही अनुभूति का विषय बन जाती है। भक्त
नारद ने ध्रुव प्रह्लादादि के लिये माध्यम बनना स्वीकारा,क्योंकि इन भक्तों की किंचित् प्रवृत्ति भगवान् के प्रति थी। सब जानते हैं,कि –
जगदम्बा के परमनिष्कामी भक्त पूज्य
परमहंस रामकृष्णदेव ,जब युवा सन्यासी विवेकानन्द को माँ काली का अनुभव कराते हैं, तब यह उदाहरण रूप में बहुश्रुत और सार्वजनिक हो जाता है ।
और यदि कोई भी अवगुण यदि मुझमें है, तो संसार के ,शब्द ,स्पर्श,रूप,रस,गन्ध आदि पाँच विषयों में आकृष्ट होने से है।
इस आकर्षण से बचना, भक्तचरणाश्रय से ही हो पाता है।
ये विषय, क्रमशः उन्ही -आकाश, वायु, अग्नि, जल,पृथ्वी के हैं।
अब रह गई ईश्वरीय करुणा आदि गुणों के पाने की, तो यह सब उस” अंशी ” ईश्वर का “अंश” होने से हम सभी मनुष्य शरीरों में स्वतः है।अनुभव में नहीं आता बिना माध्यम के।
“अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी।।”
कलिकाल में केवल नारायण हरि राम कृष्ण लक्ष्मी सीता राधा उमा दुर्गा नामों का सतत जप अभ्यास करके जन्म-मृत्यु का बन्धन कटेगा, माया की गाँठ छूटेगी।
गोस्वामीजी अन्त में कह डालते हैं,देववाणी में –
“हरिं नरा भजन्ति येतिदुस्तरं तरन्ति ते”
अति दुस्तर ” अविद्या माया ” का स्तर बड़ा ऊँचा है, विकट है। और विकट है तो इस मानव जीव के जीवन का बहुत बड़ा संकट है।
किन्तु इसके लिए शुकसनकादि नानकमलूकमीरा तथा तुलसीकबीरादि की वाणियों का अवलम्ब लेना होगा, जिनमें भगवन् नाम को ही मानव जीवन के चरमलक्ष्य मायामुक्ति और भगवद्दर्शन
का एकमेवोपाय कहा गया।
इसीलिये व्रज के सिद्धरसिक गा-गाकर धन्यातिधन्य कृतकृत्य हैं-
“सत्य है यह विकट संसार जायेगा कट
नाम वाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट”
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तरूपा
नारायणि नमोस्तुते
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।
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