विनयप्रेम से परमसत्ता-बोध

नारायण!इस संसार में,सबको धरनेवाली इस धरती पर कामनाओं का अन्त नहीं। सारी धरती का सारा साम्राज्य भी किसी एक को दे दिया जाय तब भी कमी बनी रहेगी। भगवान् के ध्रुव प्रह्लाद आदि भक्त, तो भगवान् से भगवान् को ही माँगते हैं।
नचिकेता यमराज से परमात्मसत्ता की जिज्ञासा करता है।
नारद शुकसनकादि की वाणियों का सार भी यही है।हमें इन्हीं का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ नारदजी “भक्ति”की सर्वोच्चता निष्कामता को स्वीकारते हैं। क्योंकि एक कामना पूरी होते ही दूसरी कामना मुँह बाये खड़ी रहेगी।और हम भगवान् “दास”नहीं, बल्कि “कामनादास” बने रहेंगे।
अतः भगवान् की कृपाकरुणा से मिले मानव शरीर के जन्म को सार्थक करना है तो, कामनाओं का दास नहीं भगवान् दास बनकर ही पुनः जन्म का बन्धन कटेगा।

भगवद् विग्रह या भगवान् के अर्चावतार का अर्चन इसलिये कि, “भोग” के लिये न जन्मना पड़े,बल्कि भगवदाज्ञा से भगवान् के परिकर बन कर भगवान् के ही साथ उनकी उद्घोषणा ” धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे” में योग के लिये और
भगवद् रसलीलाविलासार्थ “रसो वै सः” की रसानुभूति हेतु जन्म हो।इसके लिए वेदादिशास्त्र और उनके आचारक साधु-सन्त या उनकी वाणियों का आश्रय और कहिये कि उन्ही चरण रज लेनी होगी -“विना महत्पादरजोभिषकम्”
इसकी सिद्धि दीखती नहीं।
जब नारद जी अपने “भक्तिसूत्र” में “भक्ति”की सार्थकता बताते हैं। तब इसे कामनारहित ही कहते हैं।
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्” वे तो
कामना त्याग को भक्ति का मूलाधार बताते हैं। इसका संकल्प लेते ही-
भक्तवत्सल भगवान् लौकिक अलौकिक सभी सुख दे देते हैं। निष्कामता में कहीं भी सन्तोष ढूँढना नहीं है।सिद्धरूप में वह
सन्तोष स्वतः प्राप्त है। इसके लिए कमर कस करके,संसार में-
प्रभु प्रदत्त कार्य को विनय और प्रेम पूर्वक करना होगा। जिसमें अहं भूमिका
समय और अनुशासन की भी है।
सभी में मनुष्यों में प्रभु सत्ता देखकर दण्डवत् प्रणाम करना होगा।कम से कम
लीलापुरुषोत्तम ने आज से 52सौ साल पहले यही उपदेश किया था-
दण्डवत् प्रणमेद् भूमौ
आश्वचाण्डालगोखरान्।
भागवत महापुराण

अ+अश्व=आश्व चाण्डाल गो खर
अश्व,चाण्डाल, गो और खर(गदहा)”आ”
(तक) को देखकर भगवद् भाव से दण्डवत् प्रणाम करे। नारायण! सीखना होगा।
इसीलिये तीन-तीन बार रघुनाथ जी का दर्शन करने वाले-
“रामचरित मानस” जैसे अद्वितीय ग्रन्थ की रचना करनेवाले परम पूजनीय प्रातः स्मरणीय “गोस्वामीजी” जी ने
कहा-
जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राममय जानि।
बन्दौं तिनके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।
सियाराममय सब जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।

यही तो मनुष्य जीवन की मर्यादा है।मानवीय जीवन का संविधान है।
इसके बिना किसी को कुछ नहीं मिला है और न ही मिलेगा।
“विनय” और”प्रेम” मानव के सर्वोच्च अस्त्र-शस्त्र हैं।
विनय प्रेमबस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।

इसलिये रामकृष्णनारायण नाम जपना जिससे”अतिविनयी” और “अतिप्रेमी” प्रभु की “प्रेमाभक्ति” पाकर जीवन सार्थक हो जाय।अपने और प्रभु के नित्य सम्बन्ध की “स्मृति” होकर मानव-जन्म सफल हो।
विनय और प्रेम के बिना जगत् की वास्तविकता और ” परमसत्ता” का बोध
नहीं होगा,नहीं होगा।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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