यह मनुष्य जीवन घर वापसी है। घर कौन? परमात्मा।
जीवात्मा का अपना घर परमात्मैव।
लेकिन जब तक छोटा/बड़ा ऊँचा/नीचा इस चमड़े के नेत्र से दीखता रहेगा।
तब तक भोगने वाला कर्म होता रहेगा।
और पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् चलता रहेगा, नाना शरीरों की यात्रा जारी रहेगी।
हे हरि कवन जतन भ्रम भागै।
यह जाति विद्या पद पदार्थ जमीन मकान दुकान का महत्व और रूपयौवनादि का अभिमान बना रहेगा।
कोई भक्ति, पूजा-पाठ जप तप आराधना तीर्थ समाधि योग ध्यान गंगास्नान काम नहीं आयेगा।
भक्ति केवल शरणागतिभाव है,जिसे अपने नेत्रों से दीख रहे भेददर्शन को मिटाने से मिलेगा।
सिया राम मय सब जग जानी
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
को अपनाये बिना सब आराधना अभिमान मात्र है।
स्कन्द -पुराणे –
जातिः विद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
पञ्चैते यत्नतः त्याज्याः
एते वै भक्तिकङ्टकाः।।
अपने को अपने में देखो
सभी में वही एकः देवः सर्वभूतेषु गूढः।
जब अपनी पहचान होगी तब भेदबुद्धि भ्रम मिटेगा।
अपनी पहचान गीता, रामायण जैसे शास्त्र सतत सेवन करने और रोज भागवत -रामकथा सुनने से ही होगी।
दुनिया के तीर्थों में जाकर भी मनुष्य भी नहीं बन पाओगे यदि निष्कामी साधु सज्जन सन्त का संग नहीं मिला।
भगवान्/भगवती से प्रार्थना मात्र इतनी की जैसे विभीषण को हनुमान् जी मिले,क्योंकि इसमें कारण केवल सीताराम जी का अनुग्रह ही था।
” अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता,बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा।”
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बन्दौं सबके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।
पहले अपने को पहचानो
तब समझ में आयेगा कि,जो मैं हूँ वही सामने दीख रहा सब कुछ है।
नारायण नारायण नारायण
सीताराम सीताराम सीताराम
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण
दुर्गा सीता राधा उमा रटते रहो
चैबीसों घण्टें।सब दृष्टिदोष मिटेगा। सब में भगवान्/भगवती दीखेंगे।
मनुष्य जीवन सफल होगा।
गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।।
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