भरतहिं जानि राम परिछाहीं


भरत तो राम की परछाईं हैं। जिस प्रकार करुणा,दया,शरणागतवात्सल्य और प्रेम
श्रीराम में है,वह केवल भरत में सम्भव है।
क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं,और
कोई भी परछाईं अपने “मूल”से भिन्न हो ही नहीं सकती।
नारायण! जो रूप-स्वरूप धारण करके व्यक्ति चलता है, परछाईं ठीक उसके पीछे-पीछे अनुगमन करती चलती है।
“मूल” की मौलिकता,”प्रतिच्छाया” से एकदम अभिन्न होती है।
श्रीभरत की रामप्रतिच्छायिता होने से वे अपने मूल श्रीराम जी से पूर्णतः एक हैं। तात्पर्यतः उनका भी निश्चयेन छायात्वेन “गोद्विजधेनुदेवहितकारित्व” सिद्ध है।
मतलब कि मर्यादा और लोकमंगल की प्रतिस्थापना करने के लिए “रामावतार”
हुआ है, तो भरत इससे विपरीत कैसे हो सकते हैं? इसलिये –
कोई भी भय देवताओं को अपने मन में कदापि नहीं रखना चाहिए,”गुरुबृहस्पति” का “गुरुमत”यही मूल्य स्थापित करता है।

राक्षसों के अनाचार से पीड़ित शिव और ब्रह्मादि देवताओं सहित गोरूपिणी धरती जब व्याकुल होकर भगवान् की शरण ग्रहण करती है, तब शरणागतवात्सल्य में अभिससिंचित श्रीहरि की गो-गिरा तो निर्भयता का”कवच” ही बन जाती है-
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहिं लागि धरिहहुँ नरबेसा।।

इधर “रामलीला “के भरत-राम संवाद में भगवान् श्रीराम, भरत की विह्वल दशा देख कर अत्यंत संकुचित हो जाते हैं-
“अंतरजामी प्रभुहिं सँकोचू”

जब प्रभु संकोच में तब उनकी परछाईं जैसे भरत भी अभिन्न होने से भगवान् के अत्यान्तात्यन्त अनुग्रह आशीष का स्मरण करते हुए दोनों हाथ जोड़कर विनयावनत
हो जाते हैं-
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।
यदि गुरु वशिष्ठ प्रसन्न हैं और प्रभु भी हमारे ही अनुकूल तब मेरा अब कोई भी आग्रह नहीं।
मेरा दुर्भाग्य माता कैकेयी की मोहासक्त “कुटिलता” विधाता की “विषमता” और काल की “कठिनता”है।
मेरा पैर ही खींचकर इन सभी ने मुझे कष्ट दिया है और हे मेरे प्रभु!आपने तो अपने और रघुकुल की मर्यादा “रघुकुल रीति सदा चलि आई।प्रान जाहिं पर बचन न जाई” का मार्ग छोड़ा ही नहीं।संसार तो भला,भला कहाँ?(दुःखालयमशाश्वतम्)है।

आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है, क्योंकि,उसमें सन्मुख-विमुख होने का कोई मतलब नहीं है,वृक्ष की परिधि तो वृत्ताकार है।जो भी उसकी छाया अथवा शरण ग्रहण करता है , उसकी इच्छा भला अपूर्ण कहाँ?
“कहौं कहावौं का अब स्वामी ।कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला।मिटी मलिन मन कलपित सूला
मोर अभागु मातु कुटिलाई बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।पाउ रोपि सब मिलि मोहिं घाला।प्रनतपाल पन आपन पाला।।जगु अनभल भल एक गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।।
“देउ देवतरु सरिस सुभाऊ।
सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

गुरु और आप जैसे स्वामी को पाकर अब कोई सन्देह और क्षोभ मन में नहीं रहा।
जो जनहित हो,आप वही करें ।सेवक भरत का आपकी सब प्रकार से सेवा ही सर्वोच्च है।सेव्य को यदि सेवक संकोच में डाल दे,तो उसकी बुद्धि बिगड़ी हुई है।
सेवक अपने सेव्य की सेवा पर अडिग रहे।अपने सुख-लाभ का लोभ छोड़े।
” लखि सब बिधि गुरु स्वामि सनेहू।
मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ।।
अब करुनाकर कीजिअ सोई ।
जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।
जो सेवकु साहिबहिं सँकोची।
निज हित चहइ तासु मति पोची।।
सेवक हित साहिब सेवकाई।
करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
भरत सेवक और भगवान् सेव्य हैं।सेवक तो सेव्य का अनुगामी होता है,इसीलिये वह सेव्य की छाया की तरह चलता है।

इसी सूर्यवंश परम्परा में महाराज दिलीप,जब गोसेवाराधना धर्म में थे ,तब उनकी सेवा इसी तरह थी।महाराज दिलीप नन्दिनी के पीछे-पीछे उसकी छाया(परछाईं)की तरह चलते हैं।महाकवि कालिदास ने गुरु वशिष्ठ प्रदत्त “नन्दिनी”
की सेवा करते हुए दिलीप का वर्णन किया है-” जब जहाँ वह बैढती तब,तहाँ राजा बैठते और जब उठ कर चलती तब वह उसके पीछे-पीछे चलने लगते थे।”
” स्थितः स्थिताम् उच्चलितः प्रयाताम्।
निषेदुषीम् आसनबन्धधीरः”
इस प्रकार “छायासेवा”की सरणि भरत की अपनी मान्य पूर्व परम्परा है।इसलिये ” भरतहिं जानि राम परिछाहीं”
भरत ने आगे गुरुसम्मत अनेक प्रस्ताव प्रभु राम के समक्ष रखे हैं-
1- यदि भगवान् अयोध्या लोटें तो सभी अवधवासियों,विधवा माताओं,पुरजन,
परिजन,मेरा स्वयं का स्वार्थ सिद्ध होगा।
अनाथ अयोध्या प्रभु राम से सनाथ होगी।

“स्वारथु नाथ फिरें सबही का”

2- यदि आप द्वारा प्रदत्त “आदेश का पालन” किया जाये तो वह करोडों तरह से नीक(सुन्दर)ही होगा।यही स्वार्थ और परमार्थ रूप(दानव-वध से धरती का भार रहित होने रूप) सम्पूर्ण पुण्यफल और सारी शुभ गतियों का सार-सर्वस्व है।
और यही सभी विकल्पों का सुन्दर शृंगार भी –
“किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।
यह स्वारथ परमारथ सारू।
सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू।।”

3- प्रभु! के समक्ष सेवक भरत की विनती
यदि “उचित” समझी जाय तो यह कि “राज्याभिषेक” की समस्त सामग्री सजी सजाई है, आप “राजतिलक” करायें।
आप इस “सामग्री” को कृतार्थ करें, यदि आपका “मन” माने।
” देव एक बिनती सुनि मोरी।
उचित होइ तस करब बहोरी।।
तिलक समाज साजि सब आना।
करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

4- अनुज शत्रुघ्नलाल जी सहित मुझे वन भेज कर सभी को सनाथ कर दें।
” सानुज पठइअ मोहि बन,
कीजिअ सबहिं सनाथ।”
5- शत्रुघ्नलाल जी और भैय्या लक्ष्मण को अयोध्या भेज दें,मैं आपके साथ वन चलूँ।
” नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ,
नाथ चलौं मैं साथ।।”
6- आप श्रीजानकी सहित अयोध्या प्रस्थान करें,और हम तीनों भाई वन चले जायँ।
” नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई।
बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।”

हे प्रभु!जिन विकल्पों ,विधियों में से जिसमें भी आपकी प्रसन्नता हो, आप वही करें,क्योंकि-
आप तो सकलार्तिहर, करुणासागर हैं।
“जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई।”

मेरे ऊपर ऐसा विचित्र भार पड़ा है,कि मुझे न तो धर्म का और न ही नीति का
ज्ञान रह गया है।मैनें सेवक होकर आपसे जितनी तरह की बातें की हैं, उन सभी में नीति और धर्म विचार का लेशमात्र भी नहीं है।
स्वार्थ से सनी मेरी बातें हैं, आर्त का चित्त विचित्त होता है। मैं सेवक होकर आपको उत्तर दूँ ,यह ठीक नहीं। आपका आदेश सर्वोपरि है। किसी भी सेवक के लिये स्वामी का “आदेश” होऔर वह यदि “उत्तर” दे दे तो लज्जा भी लजा जाय।
“देव दीन्ह सबु मोहि अभारू।
मोरे नीति न धरम बिचारू।।
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।
रहत न आरत के चित चेतू।।
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई।
सो सेवक लखि लाज लजाई।।”
भरत सब प्रकार से अपार अवगुणसागर
है।स्वामी का यह परम प्रेम है कि लोग
उसे “साधु पद” से सराह रहे हैं।
अब अच्छा तो यही है कि आप जैसे “संकोची” स्वामी का मन जाने नहीं पाये। अर्थात् आपके “मनोनुकूल” जो हो,वही सभी(अवधवासियों,सभी परिजनपुरजन
माताओं ,गुरुदेवताओं ,दनुजों) के लिये भी श्रेष्ठ होगा।
“अस मैं अवगुन उदधि अगाधू।
स्वामि सनेह सराहत साधू।।
अब कृपाल मोहि सो मत भावा।
सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।”

हे प्रभु! आपके चरणों की सौगन्ध है, भरत सत्यभाव से कहता है कि जगमंगल का हेतु आपकी आज्ञा का पालन ही है।
जिसे जो-जो आदेश हो, आप कहें,वही सबको शिरोधार्य है। सभी झूँठ,अनाचार समाप्त हो जायेंगे।
” प्रभु पद सपथ कहउँ सतिभाऊ।
जग मंगल हित एक उपाऊ।।”
” प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि,
जो जेहि आयसु देब।
सो सिर धरि धरि करहिं सबु,
मिटिहिं अनट अवरेब।।”
अनन्तर प्रभु राम शान्त रहते हैं।भरत के वचनों से देवमण्डली और तपस्वी वनवासी हर्षित हैं।अवधवासी असमंजस
में हैं, इसलिये कि जाने क्या निर्णय हो।
” भरत बचन सुनि सुनि सुर हरषे।
साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
असमंजस बस अवध नेवासी।
प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
चुपहिं रहे प्रभु राम सँकोची।
प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

नारायण! ज्ञानी-विज्ञानी वन-तापस मण्डली तो यह जानती थी कि प्रभु, धरती का भार, उतारने और भक्तों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए मानुष तन धर कर आए हैं –
“विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह,
मनुज अवतार।निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार।”
अतः सभी का भला होगा,इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है,क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं- और परछाईं अनुसरण करती है “जिमि पुरुषहिं अनुसर परिछाहीं” भरत तद्वत्” “श्रीरामवत्” हैं। किसी का भी अनभल नहीं होने वाला।
इसलिये देवगुरु वृहस्पति ने देवराज को सान्त्वना दे दी थी कि, हे देवताओं मन को स्थिर करो,भरत जब रामपरछाईं हैं तब रामवत् ” भरत” से भय करना ठीक नहीं है-

” मन थिर करहु देव डरु नाहीं।
भरतहिं जानि राम परिछाहीं।।”

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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