किम् आश्चर्यम् अतः परम्

इससे बड़ा इस मनुज शरीर का कोई भी आश्चर्य नहीं है कि,नर तन पाइ विषय मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।

मन मनन करता रहे संसारविषभोगों का।
है सतत न्यौता यही भव भवज रोगों का।

मन जब भगवान् या भगवती के किसी नामरूप में चला जाये।सब मतलब सिद्ध।

नंबर एक, हम क्या हैं, जान जायेंगे।
नंबर दो, सामने प्रत्यक्ष संसार की वास्तविकता समझ में आ जायेगी।
नंबर तीन ,सब रोनाधोना,मिट जायेगा।
नंबर चार, आनन्द ही आनन्द शेष बचेगा।

अतः आनन्द ही आनन्द में रहना है, तब इस अपने पिण्ड शरीर का और प्रत्यक्ष संसार का रहस्य जानना चाहते हो,तो सरल उपाय है-

सरल बनो,साधुस्वभाव के हो जाओ। किसी सुरक्षा उपकरण की जरूरत नहीं।No, need to security.
साधु सन्त के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे।
अतुलितबलधाम,अन्जनी कुमार, रामदूत, श्रीहनुमानजी महाराज कृपा करेंगे।

करना क्या है, केवल भगवन् नाम का जप, राम जपो राम जपो राम जपो भाई।
(श्रीविनयपत्रिका)
शरीर पूरा होने पर,जब दूसरे लोग, अपने कर्तव्य कर्मवश राम-राम , नाम रटें, तो वह सूक्ष्म शरीर, (प्राण) जो लम्बे समय से,उस पार्थिव पिण्ड में था,राम नाम को
सूक्ष्म शरीर से सुनता तो है, लेकिन भारी विपत्ति, रामनाम स्वयं नहीं ले सकता।

अस्तु ” राम राम राम , जीह जौ लौं तू न जपिहै,तौ लौं तू कहूँ जाय ,तिहूँ ताप तपिहै।”(श्रीविनयपत्रिका)

इसीलिये इस मानव देह का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है, कि जिन भगवान् की करुणा से यह नरतन, बर्तन मिला है, उसमें संसार का वैषयिक भोग ही बसा है,क्योंकि “महदाश्रय” नहीं मिला, और महदाश्रय(महापुरुष)इसलिये अनुपलब्ध कि, “रामनाममहाराज” चित्त में नहीं आते। रामनाम सरल सुलभ है। हमने
ऐसे भारत देश में जन्म लिया है, जहाँ की सभ्यतासंस्कृति,अनादि है,सनातन है।

जहाँ गली-गली में हनुमानजी के मन्दिर मिलेंगे ,अनगढ़ पत्थर शिवरूप में पूजे जा रहे हैं।और “शिव” हैं कि अहर्निश रामनाम
सादर जपते हैं।
“तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती” (श्रीराचरितमानस)

हमें राम राम रटना ही तो है,मन में,और
हमारी जीभ हमारे वश में है।
जो हम चाहते हैं, एड़ी चोटी लगा देते हैं, उसे पाने,खाने के लिए।और खाद्याखाद्य खाकर सन्तुष्ट भी हो जाते हैं।फिर खाने की जरूरत बनी रहती है।
अरे! खाओ चबाओ पीओ राम नाम, अनुभव करके देखो। जिह्वा हमारी है, हमारे वश में है।
दुर्भाग्य! है कि, ऐसा मानव शरीर पाकर भी, नापजप हर क्षण,न करके संसार का चिन्तन करते-करते पुनः गिरना, पुनः दूसरे शरीर पाने की यात्रा की ओर हम
इस “रथशरीर” को आगे बढ़ा देते हैं।

रामकृष्णनारायण दुर्गारमा सरस्वती काली नामों को चौबीसों घण्टे जप कर,ही संसार, पर काबू पाओगे।
संसार की संपदा भी मिलेगी।
परलोक भी बनेगा ,लेकिन,कैसी प्रचण्ड माया है।लुभाये,भुलाये बैठी है।
नारायण !भाग जायेगी “माया” लेकिन केवल “नामजप”से।
इसके बिना हम दुर्दशाग्रस्त होकर नरकों और नारकीय शरीरों की प्राप्ति बार-बार करते जा रहे हैं।


राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई।।

सुलभं भगवन् नाम ,जिह्वा च वशवर्तिनी।तथापि नरकं यान्ति किम् आश्चर्यम् अतः परम्।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

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जीवन-पाथेय-महदाज्ञा

तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्
ईशावास्यं इदं सर्वम्

भगवच्चेतना,यत्र-यत्र-सर्वत्र व्याप्त है।
उसके सिवाय कुछ है ही नहीं।
आवश्यकता है, अनुभूति की।

वह परमात्मा इस,ब्रह्माण्ड को रचकर,
इसमें प्रवेश कर गया।और यह समस्त जीवजगत् “उसीका” आवास है।

अतः जड़-चेतन-प्राणि-मात्र की हिंसा अथवा उनके प्रति हिंसा का भाव रखना ईश्वर के प्रति हिंसा है।

मनुष्य शरीर मनुष्य बनने के लिए मिला है।”मनुर्भव”।

किसी भी अच्छे-बुरे भोग भोगने ओर किसी भी अन्य शरीर में जाने के लिये नहीं मिला है।

अतः हरि गुर सन्त वाणियों का महदाश्रय ग्रहण करें।
नारद-शुक-सनकादि-व्यास
अपनी-अपनी वाणियों में आज भी अपने “ग्रन्थरूप”
में विराजे हैं।
“बिना महत्पादरजोभिषकम्”

तुलसी-कबीर-सूरमीरा-रैदास
आज भी” जीवन्त”हैं।भगवत् स्वरूप होकर सार्वकालिक हैं। अपने-अपने “आत्मानुभूति” परक भगवत् कथा-लीला-गुण-रूप ग्रन्थों में प्रत्यक्ष होकर दीख रहे हैं।

हाँ,इन सबका, किसी एकं का सहारा तो लेना ही होगा।

दुर्लभ हैं,तीन चीजें इस भवाटवी में, असारसंसार के “मायाजाल”में।
1-मनुष्यता।मानवीय(भगवान् के ) गुणों -करूणाक्षमादया की अभिव्यक्ति,स्वीकार्यता,
ग्राह्यता, अभिज्ञान(पहचान)
और तदनुरूप नैत्यिक व्यवहार।
2-मोक्षेच्छा।जन्म-मृत्यु के बन्धन से छूटने की इच्छा।
3- सन्तसद्गुरु का चरणाश्रय

यह सभी दुर्लभतम चीजें भगवान् की कृपानुग्रह के विना मिलेंगी भी नहीं।
मनुष्य का शरीर ही –
“हरिः ओ३म् तत् सत्” की करुणा से प्राप्त है।हम जैसे मलिनचित्तजीव की ऐसी योग्यता कहाँ?
कबहुँक करि करुना नर देही,देत ईस बिनु सनेही।

आद्याचार्य भगवत् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में ऐसी विवेकवाणी व्यक्त की-

दुर्लभं त्रयम् एव इदं, देवानुग्रह-हेतुकम्।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः।

अतः मनुष्य जीवन निरर्थक न होने पाये,इसके लिये “हिंसात्याग” कर हरि गुरु सन्तों की बात मान कर, तत्क्षण “शुभ” हेतु प्रयास करें।
मातु-पिता हरि गुरु की बानी।
बिनहिं बिचार करै शुभ जानी।।
महद् आज्ञा का उल्लंघन, पतनोन्मुख करेगा।
अतः कालिदास कहें -” गुरूपदेश आज्ञा, विचार किये विना,पालनयोग्य है।
आज्ञागुरूणां हि अविचारणीया”अथवा
तुलसी,-“अनुचित उचित बिचार तजि जे पालहिं पितु बैन,ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन”
इसे जीवन का पाथेय बनायें।

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

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“सकुचि दीन्ह रघुनाथ”

ध्यान रखें यह ऋषियों की,वेदपुराणों और अजन्मा भगवान् के द्वारा जन्म लेने वाले रामकृष्ण की धरती है।
यहाँ किसी का “भोगवाद” नहीं चला, चल भी नहीं सकता।

हमारे सनातन धर्म में दान का अर्थ हमारे पूर्वजन्म के शरीर के प्रारब्धकर्म से मिली धरतीधनादि को देने से है। जब हम अत्यंत श्रद्धा पूर्वक, किसी भी वस्तु,पदपदार्थ,जमीन ,मकान दुकान, रूपयापैसा,जो हमारे अधिकार में है, उस पर अपना अधिकार स्वयं समाप्त कर, किसी दूसरे को, इन सबका अधिकार सौंपते हैं।
तब वह ” दान” कहा जाता है।यह हमारा धर्म शास्त्र है।

भगवान् ने बिना श्रद्धा के,किये दान को “असत्” कहा और ऐसा दान इस लोक और परलोक दोनों में कोई फल देने वाला नहीं होगा,ऐसा बताया है।
“अश्रद्वया हुतं दत्तं तपः तप्तं
कृतं च यत्।असद् इति उच्यते पार्थ! न तत् प्रेत्य नेह च।।”

अतः दान की सनातन धर्मनिष्ठ विधि व्यवस्था जानकर ही दान में प्रवृत होना
चाहिए।

किसी “विधर्मी” की मीठी-मीठी बातों से सावधान रहना चाहिए ।हमारी आत्मा रामकृष्णनारायण हैं।हमें उनकी वाणी का अक्षरशः पालन करना चाहिए।और
भगवान् की कथा नित्य ही सुननी चाहिए,क्योंकि केवल वही हमारे अन्तः इन्द्रिय मनबुद्धिचित्ताहङ्कार के मालिन्य
की सफाई करती है।
हम अपने शरीर घर द्वार की सफाई जैसेकि रोज-रोज करते हैं।उसी तरह उक्त “अहमादि” की मलिनता (गन्दगी)को जैसी हरिकथा शुद्ध कर देती है, वैसी और कोई नहीं।
“हरिकथा” और कुछ नहीं रोज-रोज का “सत्संग” ही है।
हरिकथा सुनने से श्रीहरि चित्त में आ विराजते हैं।”हरिः चित्तं समाश्रयेत्”और

“बिनु सत्संग न हरि कथा ,तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गये बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग।”
संसार के त्रिविध गुणों ,सद् रजःतमः से
मलिन बनता रहता मन और चित्त कभी भी भस्मसात् हो चुके समस्त शुद्धसाधन
वाले कलियुग में विशुद्ध नहीं हो सकता।
केवल और सन्तसंगहरिकथा ही मलिन जीव के अन्तःकरण को परिमार्जित करती है।
इसलिये नित्य भगवत्कथा से मन को नहलाना धुलाना होगा। तब विवेक जागेगा।बस समझिये हो गया काम।

और दान तो श्रद्धा से, किसी जोर दबाववश नहीं हो,ऐसा वेद भी कहते हैं।

“भय मानते हुए, कि यह सब मेरा नहीं प्रभु का है, दान करो। सम्पति,सामर्थ्य के अनुसार दान करो । लजाते सकुचाते हुए दान करो ।”

“भिया देयं,श्रिया देयं,ह्रिया देयम्”

“तैत्तिरीय” उपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली

विभीषण को जब श्रीमान् रावण,लात मारकर राज्य से भगा देते हैं, तब वह श्रीभरत जी सेवित श्रीराम के चरणों में जाकर गिर पड़ता है।
भगवान् उसे उठाकर गले लगाते हैं, बगल में सादर बैठाते हैं।और तत्क्षण “लंकेश” ही कह देते हैं।
” कहु लंकेस सहित परिवारा
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।
खल मंडली बसहु दिन राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
अब देखिये, भगवान् तो सबके अन्तर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। भगवत्ता, जिसे छिपा कर वह मर्यादा में रहते हैं,एकाएक प्रकट हो जाती है।
बिना लंका का राज्य मिले ही लंकेश कह डालते हैं।

अपना दर्शन संसार में अमोघ (कभी व्यर्थ न होने वाला ) कहते हैं।और लंका के सिंहासन के अनिच्छुक विभीषण का “राजतिलक” ही कर डालते हैं। आकाश
से देवता फूल बरसाते हैं। इसलिये कि “रावण का काम तमाम” होना सिद्ध हो गया।
“जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।मोर दरस अमोघ जग माहीं।।अस कहि राम तिलक तेहिं सारा।सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।”

और नारायण! दान के विषय में स्वयं परमात्मा “वेद” की मर्यादा रखते हुए, सकुचाते लजाते हुए लंका का राज्य सौंप देते हैं।
अतः अपना कुछ भी नहीं है ।प्रारब्धवश जो कुछ कहने के लिए मेरे हिस्से का स्वतः उत्तराधिकार वश या स्वयं श्रम करके हमने पाया है,उसे ईश्वर का माने।

“दानम् एकं कलौ युगे” इस व्यास वचन को विचार करके,श्रद्धा से दान दें।

क्योंकि सतयुग, त्रेता,द्वापर में क्रमशः तप,ज्ञान,यज्ञ(तपः परं कृतयुगे,त्रेतायां ज्ञानम् उच्यते।द्वापरे यज्ञम् एव आहुः दानम् एकं कलौ युगे) “धर्म”की धुरी रहा है।और कलियुग में दान ही धर्म की धुरी है।
इसीलिये भगवान् भी स्वयं की श्वास से प्रकट ” जाकी सहज स्वास स्रुति चारी”यस्य निःश्वसिता वेदाः” वेद की मर्यादा की रक्षा करते हुए संकुचित होते हुए, विभीषण को दान करते हैं।
“यह दान वैदिक मर्यादा का दान है।”
“अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड की अनन्त सम्पदायें सब भगवान् की हैं।”
तब भी नरलीला में भगवान् नागरिक मर्यादा सिखाने के लिए लजाते शर्माते लंका का राज्य विभीषण को देते हैं –

जो संपति सिव रावनहिं दीन्हि दिएँ दस माथ।सोइ संपदा बिभीनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।


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नामवाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट

बिना नाम जपे संसार में गुजारा नहीं।
जिन्होंने इस संसार को गुजर जाने को बाध्य किया,वे बड़े-बड़े नामजापक अनुकरणीय हैं, जिन्होंने माया को ठेंगा दिखा दिया। व्याख्येय विषय की मीमांसा
रामकृष्णनारायण नामोच्चारण से प्रारंभ की जा रही है।
नारायण! यह शरीर पाँच तत्वों -” क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।” है।
यह जड़ तत्व हैं। इनमें कोई स्पन्दन नहीं। निर्लेप, निर्गुण, निराकार, आत्मा जो परमात्मा का अंश है, उसके शरीर में स्थित रहने से यह क्रियाशील रहता है।
“गगन समीर अनल जल धरनी।इनकै नाथ! सहज जड़ करनी।”ये शब्द समुद्र ने सुन्दरकाण्ड में रघुनाथ जी से कहे थे।

वस्तुतः शास्त्र और सन्त सारे ब्रह्माण्ड को भगवान् की “माया” द्वारा रचित मानते हैं,जो कि परमसत्य है। इस माया का वर्णन श्रीकागभुशुण्डि जी ने गरुड जी के समक्ष,उन्ही के उत्तर के रूट में “उत्तर काण्ड” में किया है-
“सुनहु तात यह अकथ कहानी।समुझत बनइ न जात बखानी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखराशी । सो मायाबसभयउ गोसाई ।बन्ध्यौ कीरमर्कट की नाईं ।जड़ चेतनहिं ग्रन्थि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।तब ते जीव भयउ संसारी।छूट न ग्रन्थि न होइ सुखारी।”
यह जीवात्मा जो पंचतत्व के “पिण्ड” में बैठा है, निश्चित रूप से अविनाशी, चेतना पूर्ण निर्मल,स्वाभाविक सुखपूर्ण, रहनेवाले “ईश्वर” का “अंश” है। वह “ईश्वर” हमारा “अंशी” है।और हम उसके “अंश” मात्र। सत् रज और तम यही कुल तीन गुण हैं। लेकिन यह यह गुण – अविद्यामाया ( प्रकृति) के हैं।
सत् रज और तम गुणों का क्रमशः तीन – सुख-दुःख-मोह, यह कार्य है।
इस जड़ ” पिण्ड” शरीर में उक्त सुख दुःखादि , इन्हीं के कारण, अनुभव में आता है।
यह माया भगवान् की है।
इस माया के दो रूप हैं।
1-अविद्या माया (इसीसे संसार में चेतना है)
2-विद्यामाया(भगवान् की चिर संगिनी, कभी भी क्षण मात्र के लिए भी वियुक्त न होनेवाली सरस्वती,लक्ष्मी और उमा)
मूलरूप में “विन्ध्यवासिनी” जो, दुर्गा-सीता-राधा रूप में कार्यविशेष से “अवतरित” हुई, भगवान् की चिरसंगिनी
“विद्या माया” है।
अतः माया के विषय में यह दो रूप अवश्य जानना चाहिए।

अब देखिये, गोस्वामी जी की पंक्तियों की यह अर्धाली – सो माया बस भयउ गोसाईं।बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।
मतलब कि ऐसे निर्विकार चेतन,परमात्मा का अंशभूत यह जीव सुख में रहना चाहिए, किन्तु उक्त प्रकृति यानी कि ” अविद्या माया” के सद् रज तम आदि गुणों में जकड़ कर बँध जाता है।
जैसेकी कीर(तोता) और मर्कट(बन्दर) पिंजर-डोर में बँध जाते हैं।वैसे ही यह मनुष्य भी माया के मायिक गुणों से बने संसार की भूलभुलैया में अपना ईश्वरीय आत्मस्वरूप भूल कर बँधा है।

नारायण!त्रिविध गुणों(मायिक गुणों)के कारण इस संसार में बन्धन और बार-बार जन्म होता है।
सृष्टि चलाने के लिए ही यह माया (अविद्या माया) और उसके गुणों की आवश्यकता भी है,लेकिन बस उतने मात्र के लिए ही।और सबसे बड़ी बात कि, यह ज्ञान , कि यह माया के गुण हैं, इसे बताते हैं ‘सन्तसद्गुरु’। ये सद्गुरु हैं –
सूर ,कबीर, तुलसी,नानक, मीरा, रैदास, जो अपने “आत्मानुभूत” वाणियों के माध्यम से”ग्रन्थाकाररूप”में जीवित हैं।

इनके पहलेभी- नारदव्यास,शुक,सनकादि, के रूप में अपने स्वानुभूत परमात्मचिन्तन ग्रन्थों( कृतियों ) भक्तिसूत्र ,भागवत आदि पुराणों के रुप में वे आज भी जीवन्त अनुभव किये जा रहे हैं।
बिना इन सन्तसद्गुरुओं का आश्रय लिये
भगवान् की दुस्तर माया और त्रिविध गुणों के झंझावात रूप शरीरसंसार से विरति सम्भव नहीं।
“हरि माया अति दुस्तर,तरि न जाइ बिहगेस।” उत्तरकाण्ड।
मायाधीश भगवान् कृष्ण ने मायाधीन
इस जीवात्मा को इससे बचने और माया की गाँठ(फाँस) से बचने के लिए अर्जुन के माध्यम से जीवजगत् को सन्देश दिया

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ति मायामेतां तरन्ति ते।
और कहा कि-
मद् भक्तानां तु ये भक्ताः ते मे भक्ततमाः मताः। गोस्वामीजी ने भी उत्तर काण्ड में कहा- “मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।राम तें अधिक राम कर दासा।”

भगवान् की त्रिवधगुणमयी माया से पार पाना अत्यंत कठिन है। जो नामरूप लीलाधाम के द्वारा मेरे भक्तपरायण हो जाते हैं, वे ही इससे मुक्त हो पाते हैं। नारदशुकसनकादि हनुमानजी जैसे भक्तों के जो भक्त बन जायें, तो ही सब समस्या का समाधान है।क्योंकि “भक्तभक्त” मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। और इस भक्त का भक्त बनकर अविद्यामाया के पार जाकर मानवजन्म सफल होगा।

और रह गई ईश्वरीय माधुर्य गुणों की तो, यह करुणा दया, क्षमा, सहजता सरलता,वात्सल्य आदि रूपों में निरन्तर वर्षाधारा की तरह , उन्ही ईश्वर की अभिन्न (शक्ति) विन्ध्यवासिनी-दुर्गा-सीता और उमा-राधा रूपों के माध्यम से बरबस कृपा बरसा रही है।
इसीलिये बरसाने में यही “शक्ति” बरसाने वारी कही जा रही है।किन्तु केवल भक्तों का भक्त बनकर,उनके माध्यम से ही अनुभूति का विषय बन जाती है। भक्त
नारद ने ध्रुव प्रह्लादादि के लिये माध्यम बनना स्वीकारा,क्योंकि इन भक्तों की किंचित् प्रवृत्ति भगवान् के प्रति थी। सब जानते हैं,कि –
जगदम्बा के परमनिष्कामी भक्त पूज्य
परमहंस रामकृष्णदेव ,जब युवा सन्यासी विवेकानन्द को माँ काली का अनुभव कराते हैं, तब यह उदाहरण रूप में बहुश्रुत और सार्वजनिक हो जाता है ।

और यदि कोई भी अवगुण यदि मुझमें है, तो संसार के ,शब्द ,स्पर्श,रूप,रस,गन्ध आदि पाँच विषयों में आकृष्ट होने से है।
इस आकर्षण से बचना, भक्तचरणाश्रय से ही हो पाता है।
ये विषय, क्रमशः उन्ही -आकाश, वायु, अग्नि, जल,पृथ्वी के हैं।
अब रह गई ईश्वरीय करुणा आदि गुणों के पाने की, तो यह सब उस” अंशी ” ईश्वर का “अंश” होने से हम सभी मनुष्य शरीरों में स्वतः है।अनुभव में नहीं आता बिना माध्यम के।
“अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी।।”

कलिकाल में केवल नारायण हरि राम कृष्ण लक्ष्मी सीता राधा उमा दुर्गा नामों का सतत जप अभ्यास करके जन्म-मृत्यु का बन्धन कटेगा, माया की गाँठ छूटेगी।
गोस्वामीजी अन्त में कह डालते हैं,देववाणी में –
“हरिं नरा भजन्ति येतिदुस्तरं तरन्ति ते”
अति दुस्तर ” अविद्या माया ” का स्तर बड़ा ऊँचा है, विकट है। और विकट है तो इस मानव जीव के जीवन का बहुत बड़ा संकट है।

किन्तु इसके लिए शुकसनकादि नानकमलूकमीरा तथा तुलसीकबीरादि की वाणियों का अवलम्ब लेना होगा, जिनमें भगवन् नाम को ही मानव जीवन के चरमलक्ष्य मायामुक्ति और भगवद्दर्शन
का एकमेवोपाय कहा गया।
इसीलिये व्रज के सिद्धरसिक गा-गाकर धन्यातिधन्य कृतकृत्य हैं-

“सत्य है यह विकट संसार जायेगा कट
नाम वाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट”
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तरूपा
नारायणि नमोस्तुते


गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

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राम जपो

देखो बड़ी बातें कह देना लिख देना और कुछ है ।
किन्तु रामकृष्णनारायण नामों का सतत मनवचनकर्म में अनुभव करना दूसरी बात।
रामकृष्णनारायण नामों का चौबीसों घंटे जब सतत स्मरण करोगे तब आदमी बनोगे। मैं तो आदमी बनने की तलाश इन्हीं नामों में कर रहा हूँ। आज से अभी से इनके लीला कथा चरित अमृत में डूब जाना पड़ेगा।
तब आत्मस्मृति होगी।
आत्मस्मृति होते ही जगद् में जगत् के कण-कण में आमने सामने इधर उधर छोटे बड़े सभी में तत् तत्व आत्मतत्व का इन्हीं चर्मचक्षुओं से दर्शन होने लगेगा। सब काम बन जायेगा।
और नहीं तो रोज चौबीसों घंटे सतत नाम स्मरण नहीं होगा।कुछ उखड़ने वाला नहीं। यह त्रिगुणात्मक माया सब उखाड़ देगी।
राम राम राम जीह जौ लौं तू न जपिहै।
तौ लौं तू कहूँ जाय त्रिविध ताप तपिहै।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।

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विनयप्रेम से परमसत्ता-बोध

नारायण!इस संसार में,सबको धरनेवाली इस धरती पर कामनाओं का अन्त नहीं। सारी धरती का सारा साम्राज्य भी किसी एक को दे दिया जाय तब भी कमी बनी रहेगी। भगवान् के ध्रुव प्रह्लाद आदि भक्त, तो भगवान् से भगवान् को ही माँगते हैं।
नचिकेता यमराज से परमात्मसत्ता की जिज्ञासा करता है।
नारद शुकसनकादि की वाणियों का सार भी यही है।हमें इन्हीं का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ नारदजी “भक्ति”की सर्वोच्चता निष्कामता को स्वीकारते हैं। क्योंकि एक कामना पूरी होते ही दूसरी कामना मुँह बाये खड़ी रहेगी।और हम भगवान् “दास”नहीं, बल्कि “कामनादास” बने रहेंगे।
अतः भगवान् की कृपाकरुणा से मिले मानव शरीर के जन्म को सार्थक करना है तो, कामनाओं का दास नहीं भगवान् दास बनकर ही पुनः जन्म का बन्धन कटेगा।

भगवद् विग्रह या भगवान् के अर्चावतार का अर्चन इसलिये कि, “भोग” के लिये न जन्मना पड़े,बल्कि भगवदाज्ञा से भगवान् के परिकर बन कर भगवान् के ही साथ उनकी उद्घोषणा ” धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे” में योग के लिये और
भगवद् रसलीलाविलासार्थ “रसो वै सः” की रसानुभूति हेतु जन्म हो।इसके लिए वेदादिशास्त्र और उनके आचारक साधु-सन्त या उनकी वाणियों का आश्रय और कहिये कि उन्ही चरण रज लेनी होगी -“विना महत्पादरजोभिषकम्”
इसकी सिद्धि दीखती नहीं।
जब नारद जी अपने “भक्तिसूत्र” में “भक्ति”की सार्थकता बताते हैं। तब इसे कामनारहित ही कहते हैं।
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्” वे तो
कामना त्याग को भक्ति का मूलाधार बताते हैं। इसका संकल्प लेते ही-
भक्तवत्सल भगवान् लौकिक अलौकिक सभी सुख दे देते हैं। निष्कामता में कहीं भी सन्तोष ढूँढना नहीं है।सिद्धरूप में वह
सन्तोष स्वतः प्राप्त है। इसके लिए कमर कस करके,संसार में-
प्रभु प्रदत्त कार्य को विनय और प्रेम पूर्वक करना होगा। जिसमें अहं भूमिका
समय और अनुशासन की भी है।
सभी में मनुष्यों में प्रभु सत्ता देखकर दण्डवत् प्रणाम करना होगा।कम से कम
लीलापुरुषोत्तम ने आज से 52सौ साल पहले यही उपदेश किया था-
दण्डवत् प्रणमेद् भूमौ
आश्वचाण्डालगोखरान्।
भागवत महापुराण

अ+अश्व=आश्व चाण्डाल गो खर
अश्व,चाण्डाल, गो और खर(गदहा)”आ”
(तक) को देखकर भगवद् भाव से दण्डवत् प्रणाम करे। नारायण! सीखना होगा।
इसीलिये तीन-तीन बार रघुनाथ जी का दर्शन करने वाले-
“रामचरित मानस” जैसे अद्वितीय ग्रन्थ की रचना करनेवाले परम पूजनीय प्रातः स्मरणीय “गोस्वामीजी” जी ने
कहा-
जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राममय जानि।
बन्दौं तिनके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।
सियाराममय सब जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।

यही तो मनुष्य जीवन की मर्यादा है।मानवीय जीवन का संविधान है।
इसके बिना किसी को कुछ नहीं मिला है और न ही मिलेगा।
“विनय” और”प्रेम” मानव के सर्वोच्च अस्त्र-शस्त्र हैं।
विनय प्रेमबस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।

इसलिये रामकृष्णनारायण नाम जपना जिससे”अतिविनयी” और “अतिप्रेमी” प्रभु की “प्रेमाभक्ति” पाकर जीवन सार्थक हो जाय।अपने और प्रभु के नित्य सम्बन्ध की “स्मृति” होकर मानव-जन्म सफल हो।
विनय और प्रेम के बिना जगत् की वास्तविकता और ” परमसत्ता” का बोध
नहीं होगा,नहीं होगा।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

“मानव शरीर प्राप्ति, घर वापसी”


यह मनुष्य जीवन घर वापसी है। घर कौन? परमात्मा।
जीवात्मा का अपना घर परमात्मैव।
लेकिन जब तक छोटा/बड़ा ऊँचा/नीचा इस चमड़े के नेत्र से दीखता रहेगा।
तब तक भोगने वाला कर्म होता रहेगा।
और पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् चलता रहेगा, नाना शरीरों की यात्रा जारी रहेगी।
हे हरि कवन जतन भ्रम भागै।

यह जाति विद्या पद पदार्थ जमीन मकान दुकान का महत्व और रूपयौवनादि का अभिमान बना रहेगा।
कोई भक्ति, पूजा-पाठ जप तप आराधना तीर्थ समाधि योग ध्यान गंगास्नान काम नहीं आयेगा।
भक्ति केवल शरणागतिभाव है,जिसे अपने नेत्रों से दीख रहे भेददर्शन को मिटाने से मिलेगा।
सिया राम मय सब जग जानी
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
को अपनाये बिना सब आराधना अभिमान मात्र है।
स्कन्द -पुराणे –
जातिः विद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
पञ्चैते यत्नतः त्याज्याः
एते वै भक्तिकङ्टकाः।।

अपने को अपने में देखो
सभी में वही एकः देवः सर्वभूतेषु गूढः।

जब अपनी पहचान होगी तब भेदबुद्धि भ्रम मिटेगा।
अपनी पहचान गीता, रामायण जैसे शास्त्र सतत सेवन करने और रोज भागवत -रामकथा सुनने से ही होगी।
दुनिया के तीर्थों में जाकर भी मनुष्य भी नहीं बन पाओगे यदि निष्कामी साधु सज्जन सन्त का संग नहीं मिला।
भगवान्/भगवती से प्रार्थना मात्र इतनी की जैसे विभीषण को हनुमान् जी मिले,क्योंकि इसमें कारण केवल सीताराम जी का अनुग्रह ही था।
” अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता,बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा।”

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बन्दौं सबके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।

पहले अपने को पहचानो
तब समझ में आयेगा कि,जो मैं हूँ वही सामने दीख रहा सब कुछ है।
नारायण नारायण नारायण
सीताराम सीताराम सीताराम
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण

दुर्गा सीता राधा उमा रटते रहो
चैबीसों घण्टें।सब दृष्टिदोष मिटेगा। सब में भगवान्/भगवती दीखेंगे।
मनुष्य जीवन सफल होगा।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।।

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भरतहिं जानि राम परिछाहीं


भरत तो राम की परछाईं हैं। जिस प्रकार करुणा,दया,शरणागतवात्सल्य और प्रेम
श्रीराम में है,वह केवल भरत में सम्भव है।
क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं,और
कोई भी परछाईं अपने “मूल”से भिन्न हो ही नहीं सकती।
नारायण! जो रूप-स्वरूप धारण करके व्यक्ति चलता है, परछाईं ठीक उसके पीछे-पीछे अनुगमन करती चलती है।
“मूल” की मौलिकता,”प्रतिच्छाया” से एकदम अभिन्न होती है।
श्रीभरत की रामप्रतिच्छायिता होने से वे अपने मूल श्रीराम जी से पूर्णतः एक हैं। तात्पर्यतः उनका भी निश्चयेन छायात्वेन “गोद्विजधेनुदेवहितकारित्व” सिद्ध है।
मतलब कि मर्यादा और लोकमंगल की प्रतिस्थापना करने के लिए “रामावतार”
हुआ है, तो भरत इससे विपरीत कैसे हो सकते हैं? इसलिये –
कोई भी भय देवताओं को अपने मन में कदापि नहीं रखना चाहिए,”गुरुबृहस्पति” का “गुरुमत”यही मूल्य स्थापित करता है।

राक्षसों के अनाचार से पीड़ित शिव और ब्रह्मादि देवताओं सहित गोरूपिणी धरती जब व्याकुल होकर भगवान् की शरण ग्रहण करती है, तब शरणागतवात्सल्य में अभिससिंचित श्रीहरि की गो-गिरा तो निर्भयता का”कवच” ही बन जाती है-
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहिं लागि धरिहहुँ नरबेसा।।

इधर “रामलीला “के भरत-राम संवाद में भगवान् श्रीराम, भरत की विह्वल दशा देख कर अत्यंत संकुचित हो जाते हैं-
“अंतरजामी प्रभुहिं सँकोचू”

जब प्रभु संकोच में तब उनकी परछाईं जैसे भरत भी अभिन्न होने से भगवान् के अत्यान्तात्यन्त अनुग्रह आशीष का स्मरण करते हुए दोनों हाथ जोड़कर विनयावनत
हो जाते हैं-
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।
यदि गुरु वशिष्ठ प्रसन्न हैं और प्रभु भी हमारे ही अनुकूल तब मेरा अब कोई भी आग्रह नहीं।
मेरा दुर्भाग्य माता कैकेयी की मोहासक्त “कुटिलता” विधाता की “विषमता” और काल की “कठिनता”है।
मेरा पैर ही खींचकर इन सभी ने मुझे कष्ट दिया है और हे मेरे प्रभु!आपने तो अपने और रघुकुल की मर्यादा “रघुकुल रीति सदा चलि आई।प्रान जाहिं पर बचन न जाई” का मार्ग छोड़ा ही नहीं।संसार तो भला,भला कहाँ?(दुःखालयमशाश्वतम्)है।

आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है, क्योंकि,उसमें सन्मुख-विमुख होने का कोई मतलब नहीं है,वृक्ष की परिधि तो वृत्ताकार है।जो भी उसकी छाया अथवा शरण ग्रहण करता है , उसकी इच्छा भला अपूर्ण कहाँ?
“कहौं कहावौं का अब स्वामी ।कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला।मिटी मलिन मन कलपित सूला
मोर अभागु मातु कुटिलाई बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।पाउ रोपि सब मिलि मोहिं घाला।प्रनतपाल पन आपन पाला।।जगु अनभल भल एक गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।।
“देउ देवतरु सरिस सुभाऊ।
सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

गुरु और आप जैसे स्वामी को पाकर अब कोई सन्देह और क्षोभ मन में नहीं रहा।
जो जनहित हो,आप वही करें ।सेवक भरत का आपकी सब प्रकार से सेवा ही सर्वोच्च है।सेव्य को यदि सेवक संकोच में डाल दे,तो उसकी बुद्धि बिगड़ी हुई है।
सेवक अपने सेव्य की सेवा पर अडिग रहे।अपने सुख-लाभ का लोभ छोड़े।
” लखि सब बिधि गुरु स्वामि सनेहू।
मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ।।
अब करुनाकर कीजिअ सोई ।
जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।
जो सेवकु साहिबहिं सँकोची।
निज हित चहइ तासु मति पोची।।
सेवक हित साहिब सेवकाई।
करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
भरत सेवक और भगवान् सेव्य हैं।सेवक तो सेव्य का अनुगामी होता है,इसीलिये वह सेव्य की छाया की तरह चलता है।

इसी सूर्यवंश परम्परा में महाराज दिलीप,जब गोसेवाराधना धर्म में थे ,तब उनकी सेवा इसी तरह थी।महाराज दिलीप नन्दिनी के पीछे-पीछे उसकी छाया(परछाईं)की तरह चलते हैं।महाकवि कालिदास ने गुरु वशिष्ठ प्रदत्त “नन्दिनी”
की सेवा करते हुए दिलीप का वर्णन किया है-” जब जहाँ वह बैढती तब,तहाँ राजा बैठते और जब उठ कर चलती तब वह उसके पीछे-पीछे चलने लगते थे।”
” स्थितः स्थिताम् उच्चलितः प्रयाताम्।
निषेदुषीम् आसनबन्धधीरः”
इस प्रकार “छायासेवा”की सरणि भरत की अपनी मान्य पूर्व परम्परा है।इसलिये ” भरतहिं जानि राम परिछाहीं”
भरत ने आगे गुरुसम्मत अनेक प्रस्ताव प्रभु राम के समक्ष रखे हैं-
1- यदि भगवान् अयोध्या लोटें तो सभी अवधवासियों,विधवा माताओं,पुरजन,
परिजन,मेरा स्वयं का स्वार्थ सिद्ध होगा।
अनाथ अयोध्या प्रभु राम से सनाथ होगी।

“स्वारथु नाथ फिरें सबही का”

2- यदि आप द्वारा प्रदत्त “आदेश का पालन” किया जाये तो वह करोडों तरह से नीक(सुन्दर)ही होगा।यही स्वार्थ और परमार्थ रूप(दानव-वध से धरती का भार रहित होने रूप) सम्पूर्ण पुण्यफल और सारी शुभ गतियों का सार-सर्वस्व है।
और यही सभी विकल्पों का सुन्दर शृंगार भी –
“किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।
यह स्वारथ परमारथ सारू।
सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू।।”

3- प्रभु! के समक्ष सेवक भरत की विनती
यदि “उचित” समझी जाय तो यह कि “राज्याभिषेक” की समस्त सामग्री सजी सजाई है, आप “राजतिलक” करायें।
आप इस “सामग्री” को कृतार्थ करें, यदि आपका “मन” माने।
” देव एक बिनती सुनि मोरी।
उचित होइ तस करब बहोरी।।
तिलक समाज साजि सब आना।
करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

4- अनुज शत्रुघ्नलाल जी सहित मुझे वन भेज कर सभी को सनाथ कर दें।
” सानुज पठइअ मोहि बन,
कीजिअ सबहिं सनाथ।”
5- शत्रुघ्नलाल जी और भैय्या लक्ष्मण को अयोध्या भेज दें,मैं आपके साथ वन चलूँ।
” नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ,
नाथ चलौं मैं साथ।।”
6- आप श्रीजानकी सहित अयोध्या प्रस्थान करें,और हम तीनों भाई वन चले जायँ।
” नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई।
बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।”

हे प्रभु!जिन विकल्पों ,विधियों में से जिसमें भी आपकी प्रसन्नता हो, आप वही करें,क्योंकि-
आप तो सकलार्तिहर, करुणासागर हैं।
“जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई।”

मेरे ऊपर ऐसा विचित्र भार पड़ा है,कि मुझे न तो धर्म का और न ही नीति का
ज्ञान रह गया है।मैनें सेवक होकर आपसे जितनी तरह की बातें की हैं, उन सभी में नीति और धर्म विचार का लेशमात्र भी नहीं है।
स्वार्थ से सनी मेरी बातें हैं, आर्त का चित्त विचित्त होता है। मैं सेवक होकर आपको उत्तर दूँ ,यह ठीक नहीं। आपका आदेश सर्वोपरि है। किसी भी सेवक के लिये स्वामी का “आदेश” होऔर वह यदि “उत्तर” दे दे तो लज्जा भी लजा जाय।
“देव दीन्ह सबु मोहि अभारू।
मोरे नीति न धरम बिचारू।।
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।
रहत न आरत के चित चेतू।।
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई।
सो सेवक लखि लाज लजाई।।”
भरत सब प्रकार से अपार अवगुणसागर
है।स्वामी का यह परम प्रेम है कि लोग
उसे “साधु पद” से सराह रहे हैं।
अब अच्छा तो यही है कि आप जैसे “संकोची” स्वामी का मन जाने नहीं पाये। अर्थात् आपके “मनोनुकूल” जो हो,वही सभी(अवधवासियों,सभी परिजनपुरजन
माताओं ,गुरुदेवताओं ,दनुजों) के लिये भी श्रेष्ठ होगा।
“अस मैं अवगुन उदधि अगाधू।
स्वामि सनेह सराहत साधू।।
अब कृपाल मोहि सो मत भावा।
सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।”

हे प्रभु! आपके चरणों की सौगन्ध है, भरत सत्यभाव से कहता है कि जगमंगल का हेतु आपकी आज्ञा का पालन ही है।
जिसे जो-जो आदेश हो, आप कहें,वही सबको शिरोधार्य है। सभी झूँठ,अनाचार समाप्त हो जायेंगे।
” प्रभु पद सपथ कहउँ सतिभाऊ।
जग मंगल हित एक उपाऊ।।”
” प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि,
जो जेहि आयसु देब।
सो सिर धरि धरि करहिं सबु,
मिटिहिं अनट अवरेब।।”
अनन्तर प्रभु राम शान्त रहते हैं।भरत के वचनों से देवमण्डली और तपस्वी वनवासी हर्षित हैं।अवधवासी असमंजस
में हैं, इसलिये कि जाने क्या निर्णय हो।
” भरत बचन सुनि सुनि सुर हरषे।
साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
असमंजस बस अवध नेवासी।
प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
चुपहिं रहे प्रभु राम सँकोची।
प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

नारायण! ज्ञानी-विज्ञानी वन-तापस मण्डली तो यह जानती थी कि प्रभु, धरती का भार, उतारने और भक्तों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए मानुष तन धर कर आए हैं –
“विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह,
मनुज अवतार।निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार।”
अतः सभी का भला होगा,इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है,क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं- और परछाईं अनुसरण करती है “जिमि पुरुषहिं अनुसर परिछाहीं” भरत तद्वत्” “श्रीरामवत्” हैं। किसी का भी अनभल नहीं होने वाला।
इसलिये देवगुरु वृहस्पति ने देवराज को सान्त्वना दे दी थी कि, हे देवताओं मन को स्थिर करो,भरत जब रामपरछाईं हैं तब रामवत् ” भरत” से भय करना ठीक नहीं है-

” मन थिर करहु देव डरु नाहीं।
भरतहिं जानि राम परिछाहीं।।”

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम् ।