सुमिरत नाम तुम्हार

जासु नाम सुमिरत एक बारा,उतरइ नर भवसिंधु अपारा । जिन भगवान् के नाम का एक बार भी आर्त-स्मरण करने पर मनुष्य मात्र इस असारभवसागर से पार हो जाता है, ऐसे रघुनाथ जी भरतजी के नामस्मरण को सारे लोकालोक सुखों का साधन मानते हैं ।
यह त्रिकालाबाधित और त्रिभुवन व्यापक मत श्रीरामजी का है कि, इन सभी में जितने भी पुण्यात्माधर्मात्मा हैं,हुए हैंऔर जो भविष्य में होने वाले हैं, उन सभी में भरत जैसा कोई नहीं है।जो भी किंचित् धर्मात्मापुण्यात्मा का स्वरूप है,वह सभी भरत से निम्नवत् हैं।
तीनि काल तिभुवन मत मोरे,पुन्यसिलोक तात तर तोरे।
इसके पहले की लीला है कि
नारायण! श्रीरामजी भरत की बड़ाई उनके सम्मुख करते हुए संकुचित हो जाते हैं ,क्योंकि भरत लघुभ्राता हैं।
अब चूँकि भरत तो रामजी की परछाईं ही हैं, इसलिये रामेच्छा भरतेच्छा और भरतेच्छा,रामेच्छा है।तब श्रीरामजी ने कहा कि जो भरत कहें ,उसी में सभी का भला है ,ऐसा कह चुप हो जाते हैं-
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई ,करत बदन पर भरत बड़ाई ।भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई ।अस कहि राम रहे अरगाई।अब-

गुरु समाधान का क्षण आ जाता है , और भरत से वशिष्ठ जी ने कहा कि कोई संकोच की बात नहीं, कृपाकरुणासागर अपने भाई से अपने हृदय की बात कह दें तो अच्छाई है-
तब मुनि बोले भरत सन,सब सँकोच तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बन्धु सन कहहु हृदय कै बात।
रामहिं भजहिं ते चतुर नर, जैसे राम के अभिन्न भक्तभरत ,गुरु और प्रभु की ऐसी समग्र अनुकूलता देख कर,स्वयं पर ही सारा निर्णय-भार समझ कर , विचार करने पर भी कुछ कह नहीं पाते।शरीर रोमांचित है।सभामध्य खड़े होते हैं और नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बह चलती है।

कहतेहैं कि मुनिश्रेष्ठ ने हमारे कुछ कहने से पहले ही ,मुझे वन औरआप सभी को अयोध्या लौटने का मत व्यक्त कर दिया है ,जिसका निर्वाह हो जाय तो मेरे लिये यही सर्वस्व है-
सुनि मुनि बचन रामरुख पाई ,गुरु साहिब अनुकूल अघाई।लखि अपनें सिर सबु छरु भारु।कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।नीरज नयन नेह जल बाढ़े।कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।एहिं ते अधिक कहौं मैं काहा।
हमारे नाथ का शीलस्वभाव ऐसा है कि वह तो अपराधियों पर भी क्रोध नहीं करते ।मुझ जैसे छोटे भाई पर स्नेह ऐसा कि खेल-खेल में भी कोई रोष नहीं करते थे।शैशव से हमने आपका संगत्याग नहीं किया(सतां सङ्गो हि भेषजम् )आपने मेरा मन रखने के लिए मेरे हारने पर भी ,मुझे जिता दिया करते थे।आपकी कृपारीति मुझे सर्वथा ज्ञात है-
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ, अपराधिहु पर कोह न काऊ।मो पर कृपा सनेहु बिसेषी ,खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।सिसु पन ते परिहरेउँ न संगू,कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।मैं प्रभुकृपा रीति जिय जोही ,हारेहु खेल जितावहिं मोही।

विधाता मुझे मिलते दुलार को नहीं सह सका और जननी कैकयी को माध्यम बना कर हम दोनों में भेद डाल दिया।
“बिधि न सकेउ सकि मोर दुलारा, नीच बीचु जननी मिस पारा।”
लेकिन यह कहते मेरी शोभा नहीं है।क्या कभी कोई अपने को साधु और पवित्र कहे,तो वह कभी पवित्र माना जा सकता है?जब तक कि दूसरे लोग उसे साधु न कहें। माता कैकेयी ने मन्दता का परिचय दिया और मैं सच्चरित्र हूँ,यह बात हृदय में लाना भी दुराचार है ।क्या कभी मोटे चावल की बाली में सुन्दर सालि (चावल)
फल सकता है? क्या कभी काले घोंघे में मोती उत्पन्न हो सकती है?इसमें किसी का दोष नहीं है ,मेरा दुर्भाग्य ही अथाह सागर बन गया है।
हृदय में बारम्बार विचारने पर मेरा भला तो यही है कि गुरु और सीताराम प्रभु,की जो इच्छा हो, उसी में मेरी भी इच्छा-
” यहउ कहत मोहि आजु न सोभा,अपनी समुझि साधु सुचि को भा।मातु मंदि मैं साधु सुचाली,उर अस आनत कोटि कुचाली।फरइ कि कोदव बालि सुसाली , मुकता प्रसव कि संबुक काली।सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू,मोर अभाग उदधि अवगाहू।हृदय हेरि हारेउँ सब ओरा,एकहिं भाँति भलेहिं भल मोरा।गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू,लागत मोहिं नीक परिनामू।
भरत, व्याकुल होकर सन्तसभा गुरुजनों और भगवान् के निकट सत्यभाव से बोले कि,मेरा कथन सत्यप्रेमकरुणापूर्ण है या जगत् प्रपंचपूर्ण असत्य,इसे गुरु वशिष्ठ और रघुश्रेष्ठ राम जी ही भली भाँति जान सकते हैं।
“अन्तर्यामी सद्गुरु और परमात्मा से छिपा हुआ क्या है?”
ज्यौं जग अन्तर भासता,तो कहि-कहि काहि जनाव।अन्तर्यामी जानता अन्तरगत के भाव।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाये।
कहहु कवन सिधि लोक रिझाए।।
भरत ने कहा -साधु सभा गुरु प्रभु निकट कहहुँ सुथल सतिभाउ।प्रेम प्रपंचु कि झुठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ
जननी की कुबुद्धि सारा संसार जानता है और राजा दशरथ प्रेम(राम)प्रण को स्वयं रखनेवाले सिद्ध हैं, न कि शरीर रखनेवाले
प्रतिक्षण को अपने में समेटे-लपेटे सर्वगत परमात्मा के प्रेमी ने क्षणमात्र में क्षणदा ही त्याग दी।राम राम कहि राम कहि राउ गयेउ सुरधाम।
भूपति मरन प्रेमपन राखी,जननी कुमति जगतु सब साखी।
माताओं का कष्ट देखा नहीं जाता।अवध वासी तो असह्य वेदना में जल रहे।मैं भरत ही सारी अनर्थ की जड़ हूँ और इसे समझ कर सारी वेदना का शूल सहूँगा।इन सारी घटनाओं के साक्षी त्रिशूलधारी हैं
“देखि न जाइ बिकल महतारी,जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।मही सकल अनरथ कर मूला,सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।बिनु पानहिन्ह पयादेहिं पाएँ,संकरु साखि रहेउँ एहिं धाएँ।

मार्ग में मिले निषाद का प्रगाढ़ अपूर्व प्रेम दृष्ट है,यह मेरा ही दुर्दृष्ट है कि मेरे वज्रवत् हृदय में छेद नहीं हो गया।सब अपने नेत्रों से हमने देख लिया है।मैं जीता जी जड़ हो चुका हूँ, रुका हूँ तो केवल प्रेम(राम)की आशा में रुका हूँ। मैं चूक चुका हूँ।आप सद्गुरु भगवान् सभी जड़चेतन के सहायक हैं।आप तो ऐसे हैं कि आप युगल को देखकर तामस शरीर सर्पबिच्छू भी अपनी विषम विषवितरण का वैषम्य छोड़ देते हैं-
बहुरि निहारि निषाद सनेहू,कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई,जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।
जिन्हहिं निरखि मग साँपिन बीछी, तजहिं बिसम बिसु तामस तीछी।
ऐसे रघुनन्दन सीतालक्ष्मण सहित जिसे अहित (शत्रु)लगते हों उनकी क्या गति होगी? ” रामं बिना का गतिः?”
ऐसे राजा दशरथ,जो तृणवत् शरीर छोड़ दें श्रीराम विरह में,उनका पुत्र तो दैवी सहायता से ही असहनीय को सह सका।
“तेइ रघुनंदनु लखनु सिय,अनहित लागे जाहि।तासु तनय तजि दुसह दुख देउ सहावइ काहि।”
ऐसी त्यागतपःमूर्ति भरतजी की व्याकुल और आर्ति,प्रीति,विनय,नय सरस वाणी सुनकर सारी शोकसभा “सारी” बोलने पर उतारी हो गई,मानो कमल समूह पर पाला पड़ गया-
“सुनि अति बिकल भरत बर बानी।
आरति प्रीति बिनय नय सानी।।
सोक मगन सब सभा खभारू।
मनहुँ कमल बन परेउ तुसारु।।”
मुनिवशिष्ठ ने पूर्व सच्चरित कथापुराण के माध्यम से विशिष्ट वचनों से प्रबोधन किया है।और रघुनन्दन राम जो कि दिनकरकुलोत्पन्न कुमुदिनी वन के लिए आह्लादकारी अपनी आह्लादिनी शक्ति से सर्वदा संयुक्त चन्द्रमा हैं, औचित्यपूर्ण वाणी बोलते हैं-
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी।
भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
बोले उचित बचन रघुनंदू।
दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।
भगवान् ने कहा हे भरत! तुम ग्लानि मत करो। इसलिए कि जीवात्मा की समग्र गति अपने अंशी परमात्मा के आधीन है।तीनों लोकों(धरती,स्वर्ग, पाताल)और
वर्तमान-भूत-भविष्यत् कालों में भी मेरी दृष्टि में जितने भी पुण्यात्मा जीव हैं, वे सभी के सब तुम्हारे नीचे हैं। जो भी वासनाव्यसनी तुम्हारे लिए हृदय में भी कुटिलता धारण करेंगे, उन सबकी इस लोक की वैभव-सम्पदा यशादि नष्ट हो जायेंगे, अन्य लोकों में भी सुगति प्राप्ति नहीं होगी-
तात जाय जियँ करहु गलानी,ईस अधीन जीव गति जानी।तीनि काल तिभुवन मत मोरे,पुन्यसिलोक तात तर तोरे।उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई, जाइ लोकु परलोकु नसाई।
माता कैकयी का दोष भी नहीं, क्योंकि सारी व्यवस्था भगवान् की त्रिभुवन मोहिनी माया के अधीन है।जो लोग माँ को दोषी मानते हैं, उन्हें साधुसभा यानी कि सत्संग, सन्तसंग सेवन के लिए प्राप्त नहीं हुआ,ऐसे लोग जड़मति हैं-
दोसु देहिं जननिहिं जड़ तेई,जिन्ह गुरु साधु सभा नहिं सेई।
और इतना ही नहीं भरत!तुम तो विश्व भरण पोषण कर जोई,ताकर नाम भरत अस होई,जैसे नामानुरूप स्वरूप को धारण करने वाले हो।
जो लोग तुम्हारे नाम का स्मरण मात्र कर लेंगे ,उनका अखिल पापभार संभार नष्ट हो जायेगा।लोक में सुन्दर यश फैलेगा और परलोक में भी में सुखप्राप्ति होगी-

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब
अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुख,

” सुमिरत नाम तुम्हार “

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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