रामलीला का प्रकाश फैलाती हनुमान् चालीसा की शीसा से प्रक्षेपित सुन्दर पंक्ति”रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई।” का अर्थ श्रीभरत जी को “प्रमाण” प्रमाणित कर देती है।
“श्रीहनूमान् जी महाराज, रघुनाथ जी को इतने प्रिय हैं, जैसे कि भरत।” वस्तुतः
भरत तो महामहिमा के मानदण्ड हैं प्रमाण हैं और ऐसे मानदण्ड कि वैसी रचना रची ही नहीं रमारमेश राम ने।
भरत-श्रीराम की कथा तो नारायण! अद्भुत ऐसी कि “विस्मय” ही स्थायी भाव बन जाता है।
काव्यशास्त्र में , साहित्यशास्त्र में वर्णित सुन्दरता का सौन्दर्य है “अद्भुतरस”
गुरु वशिष्ठ स्वयं “विस्मयस्थायी” भाव से ओतप्रोत होकर “अबला मति” बन गए।
और विस्मयस्थायी का “अद्भुतरस” जैसे कि बहता हुआ प्रतीत होने लगता है।
यह भरत का महामहिमात्व है,जो गुरु को ही अस्थिर और विस्मयवश करके शत्रुघ्नलाल सहित भरत को वनवास और
वनवासी सीतारामलक्ष्मण को अवध जाकर राजकाज सँभालने का अद्भुत निर्णय सुना देता है।स्वयं गुरु भी चकित।
लेकिन गुरु तो गुरु ही ठहरे, बुद्धिविद्युत्
पुनःसंयत संचरण शील होकर अपना पूर्व निर्णय वापस ले लेती है।और वशिष्ठ जी ने भगवान् से कहा कि मेरी चमत्कृत बुद्धि अब परिवर्तित निर्णय पर अडिग हो चुकी है कि आपको भरत की रुचि के अनुकूल शिव को स्वयं साक्षी मानकर शिवनिर्णय
ही करना होगा,जो कि कल्याणविधान करनेवाला सिद्ध होगा-
मोरे जान भरत रुचि राखी।जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।
और इतना ही नहीं, भरत का विनयनय
ऐसा अद्भुत है कि, वेदशास्त्र-सन्त और राज्य नय, सबका आनयन करके ही सुविचारित सम्मिश्र मिश्रित आश्रित निर्णय देना होगा।
भरत बिनय सादर सुनिअ,करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।
अब गुरु का गुरुअनुराग भरत पर देखकर स्वयं सच्चिदानन्द ही विशेषानन्द से भर जाते हैं।वह भरत को “धर्मधौरेय” तो मानते ही हैं और उससे भी आगे मन वचन और कर्म से अपना सेवक भी।गुरु की आज्ञा को दृष्टिगत करके मंगल के मूल मंजुल वचन बोलते हैं-
“गुरु अनुरागु भरत पर देखी।राम हृदय आनंदु बिसेषी।।भरतहिं धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।बोले गुरु आयसु अनुकूला।बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।
ऐसे लोगों का परम सौभाग्य है,जो कि गुरुचरणकमलों के परमानुरागी होने से लोक और वेदशास्त्र सम्मत आचरण करते हैं।और जिस पर कुलगुरु ही प्रेमासक्त हों,उसका भाग्य वर्णनातीत है-
” जे गुरु पद अंबुज अनुरागी,ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।राउर जा पर अस अनुरागू ,को कहि सकइ भरत कर भागू”
और इसीलिये रघुनाथ जी पिताश्री दशरथ के चरणों की दुहाई(साक्षी) देते हैं।जैसे कि शपथपत्र(affidavit)देते हुए दिखाई पड़ते हैं। कहते हैं कि भरत जैसा भाई तो चौदह भुवनों में कोई हुआ ही नहीं है-
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।
” भयउ न भुअन भरत सम भाई।”
गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।