भरत भगति बस भइ मति मोरी

गुरु वशिष्ठ स्वीकारते हैं कि मेरी बुद्धि तो इस समय भरत जैसे लोकपावन भक्त के वशीभूत हो गई है।
भरत की महिमा रूपी समुद्र के तीर पर यह बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ कोमला अबला जैसी चकित थकित श्रमित होकर स्थिर हो गई है।इससे पार भी जाना चाहती है, हृदय खोजता है किन्तु यत्न सूझता नहीं।
अब तो पार जाने के लिए किसी जहाज की जरूरत है।और भरत की बड़ाई का व्यास विस्तार बड़ा ही अगम है।यह तो वर्णनातीत हो चुका है।तलैया की छोटी सी सीपी में समुद्र समायेगा नहीं। और भरत की महिमासमुद्र के पार कोई जायेगा नहीं
गा चह पार जतनु हियँ हेरा।पावति नाव न बोहितु बेरा।।औरु करिहि को भरत बड़ाई ।सरसी सीपि कि सिन्धु समाई।।
यह समस्या गुरु के सामने इसलिये आई कि उन्होंने शत्रुघ्नलाल और भरत जी को वन निवास और सलक्ष्मणसीताराम जी को अयोध्या चलकर राजकाज सँभालने का प्रस्ताव,भरत के सामने रख दिया।भरत ने अविलम्ब इसे यथावत् लागू करने का आग्रह गुरु से कर डाला। समस्या के समाधान का यह पक्ष दानवी शक्ति के विनाश की बाधा बनती प्रतीत होने लगी। गुरु वशिष्ठ यह सोचकर अपने प्रस्तुत प्रस्ताव से पीछे हटने लगे,क्योंकि रामवन गमन का प्रमुख हेतु” राक्षसविनाश” और देवताओं के जीवन में “भवितव्यप्रकाश” बाधित होता सा दीख पड़ा।
आ जाते हैं भरत के साथ श्रीराम के पास गुरु वशिष्ठ जी। भगवान् प्रणाम करके सुन्दर आसन पर गुरु को बैठाते हैं।वशिष्ठ जी देशकाल अवसर का विचार कर भगवान् की भगवत्ता के अनुरूप उन्हें धर्मनीतिनिपुण,सर्वान्तर्यामी,सर्वज्ञ और असंख्येयकल्याणगुणगणनिलय बताते हैं।
अयोध्यावासियों, समस्त माताओं,भरत सहित,जिसमें “सहित” हो ऐसा साहित्य रचने हेतु आग्रह करते हैं-
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए।सहित समाज राम पहिं आए।।प्रभु प्रनाम करि दीन्ह सुआसनु।बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।बोले मुनिबरु बचन बिचारी।देस काल अवसर अनुहारी।।सुनहु राम सरबग्य सुजाना।धर नीति गुन ग्यान निधाना।।
सब के उर अन्तर बसहु,जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।। और अब देखिये जैसे
आर्त जनों की वैचारिक दृष्टि मानो कि विलुप्त ही हो जाती है,जुआरी को अपना दाँव ही याद रहता है।
“आरत कहहिं बिचारि न काऊ।सूझि जुआरिहिं आपन दाऊ।। नारायण
क्या वाक्चातुर्य है प्रभु का वह तो ऐसी परिस्थिति में गुरु-निर्णय का नय-भार गुरु पर गिरा देते हैं।
“गुरोराज्ञा गरीयसी”आज्ञा गुरूणां हि अविचारणीया”
सभी का हित तो गुरु आज्ञा के अधीन है।
गुरु वशिष्ठ जी का आदेश ही सभी के लिए श्रेयस्कर है।गुरु आदेश ही गुरु है।

“सेवक राम”सहित सभी का हित जिसमें हो जाये , वही आदेश मिलने में सभी को आनन्द होगा।
“सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ।नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।सब कर हित रुख राउरि राखें।आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई।माथे मानि करौं सिख सोई।।पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं।सो सब भाँति घटिहि सेवकाई।।”
वशिष्ठ जी अब अपनी बुद्धि के शक्तिहीन
हो जाने का रहस्य समझ जाते हैं।
” मुनि मति तीर ठाढ़ि अबला सी ” क्यों हो जाती है।वह इसलिये कि भरत तो तपोनिष्ठा ,त्याग, शील,संयम,और प्रेम में श्रीराम की (ट्रू कापी)छायाप्रति हैं।
और इसीलिये लगता है भरत के इन्हीं स्नेहादि गुणों ने गुरु के गुरुविचार को ठहरने ही नहीं दिया –
कह मुनि राम सत्य तुम भाषा।भरत सनेह बिचारु न राखा।।
और बारम्बार गुरु ने इन्ही अलक्षित गुणों की सराहना की और कहा कि इन्ही गुणों का कारण उनकी बुद्धि भरत की दिव्य “प्रेमा-भक्ति” के वशीभूत अबला सी हो गई थी-

“तेहि ते कहउँ बहोरि बहोरी।
भरत भगति बस भइ मति मोरी।।”

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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