क्या कहें,भगवान् और सन्त से बड़ा शिक्षक कौन हुआ है नारायण! सभी जीव स्वयं की करमकुण्डली के कारण शरीर धरते हैं।किसी भी माता पिता पुत्र सगे सम्बन्धी का किसी से कुछ भी लेना देना नहीं। सभी एक दूसरे तीसरे से स्वतन्त्र हैं
सद्गुरु भगवान् का चरणाश्रय मिलने पर ही भव बन्ध की फाँस कटेगी।
संसार में हमारा किसके साथ क्या क्या व्यवहार होना चाहिए शास्त्रसन्तप्रमाण हैं
“तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ “सामान्यतः और परिस्थिति विशेष में क्या करें,क्या न करें
शास्त्र और सन्त ही प्रमाण हैं।आश्रयेद् सन्तशास्त्राणि।
भगवान् ने अपने रामकृष्णादि मानवलीलावतारों में सभी मातापितागुरुभातृपत्नीकुटुम्बसमाजदेश परिवारीजनों के प्रति आचरणीय आचरण की आचरण द्वारा शिक्षा दे करके ही क्या नहीं सिखाया।
विप्रधेनुसुरसन्तहित लीन्ह मनुज अवतार का मतलब ही यही था। पहली शिक्षा आचरण के द्वारा ही मानी जाती है। अतः सब कुछ भगवान् द्वारा आचरित कर्म करने पर वह कर्म नहीं, बल्कि उपासना साधना बन जाती है।
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं जानि प्रीति रस एतनेहिं माहीं।ऐसा भगवान् का वचन और नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट,भगवती की वाणी से शक्ति शक्तिमान् समर्पित पारस्परिक दाम्पत्य तो “तात्विक वास्तविक प्रेम” का उदाहरण है अतः हम सभी शेषकर्मभोग के कारण शरीर धरने वाले मलिनचित्त के जीवों को विशुद्ध प्रेम के लिए प्रेम करना होगा।
बिना विशुद्ध प्रेम के माया जायेगी नहीं और मनोमालिन्य दूर नहीं होगा। कठिनाई ये है कि संसार त्रिगुणात्मक शरीर भी त्रिगुणात्मक अतः मन इसी में विचरता है।
संसार सदा स्मरण में, भगवान् अविस्मरण में। और –
नाम जपस्मरण से ही यह अविस्मरण का रोग नष्ट होगा होगा।संसार व्याधि ही विनष्ट हो जायेगी। सर्वत्र समदर्शन का दर्शन होने लगेगा। निष्काम काम सिद्ध हो जायेगा,निष्प्रयास ही।तब तो नानाशरीर
सम्बन्धों की क्रिया प्रतिक्रिया से कोई समस्या ही नहीं होगी ।अविचलितभाव से नामपर दृढ रहने पर सही दृष्टि मिल जायेगी। जगत्कारण कार्य एक दीखेंगे।
सुमिरि पवन सुत पावन नामू अपने बस करि राखे रामू ।जगद् ही हरि और हरि ही जगद् दीखने लगेंगे। चंचल मन को तो अचंचल नाम ही स्थिर करेगा।सब सियामय और राममय दिखेगा प्रचुर रूप में। ( प्राचुर्ये मयट्) की पाणिनीय शक्ति समुदित हो जायेगी।और-
हरिरेव जगद् जगदेव हरिः हरितो जगतो नहिं भिन्नतनुः। अन्तः वाह्य सिद्ध दृष्ट।
“जगद् ही हरि, हरि ही जगद्”
गुरुः शरणम् हरिः शरणम्