भरत, महामहिमा की अपार जलराशि हैं
नारायण! भगवान् की रामलीला में
जो चारु चारित्र्य का गाम्भीर्य दीखा है
भरत का,वैसी अथाह गहराई किसी में
कहाँ? और गहराई दीख जाय तो कैसी
गहराई, और फिर समुद्र कैसा?
राजाराम के वनगमन और दशरथजी की
लीला पूरी होने पर ननिहाल से अयोध्या
लौट कर इस अयोध्या की विपरीत दशा
” योध्या” दीख पड़ती है,उन्हें।
घर श्मशान जैसा और सभी परिजन
भूत-प्रेत सरीखे,और सगे सम्बन्धी मित्र
जन जमदूत जैसे।
” घर मसान परिजन जनु भूता
सुत हित मीत मनहुँ जमदूता”
पिता के परलोक गमन से अधिक भारी
है, सीतारामलक्ष्मण का वनगमन।
भगवान् जिस मार्ग से जाते हैं, उसी
मार्ग की रज,शिर धरते, गिरते-पड़ते
अनुगमन करते आये हैं चित्रकूट,जहाँ
प्रभु ने पर्णकुटी बनाई है। और राम के
प्रत्यक्ष होते ही-
“भूतल परेउ लकुट की नाईं”
अचेतन “दण्ड”स्वामी के साथ जैसे रचा
बसा,स्वामी के साथ ,समर्पित भाव से
जहाँ स्वामी चलते हैं,साथ चलते जाना
उसका आत्मभाव है, वैसे ही भरत जी
अचेतन दण्डवत् स्वामीराम के समक्ष गिर
पड़ते हैं।नारायण! बात बड़ी गम्भीर है।
शङ्कराचार्य की बड़ी पंक्ति भगवती से
क्षमा याचना काल में कही गई है।
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति
का अपवाद साक्ष्य ही जैसे उपस्थित है
कि मानो ब्रह्मा ने पति-द्रोही और वंश की
कलंक भूता माता ” कुमाता” रच दी है।
“कुल कलंक करि सृजेउ बिधाता
साइँदोह मोहि कीन्ह “कुमाता”
तब आचार्य शङ्कर की पंक्ति जो सभी
जगह सामान्यतया ठीक है ,लेकिन
यहाँ असाधारण घटना विशेष में
विपरीत गढ़ी पढ़ी जा सकती है।
” सुपुत्रो जायेत क्वचिदपि
कुमातापि भवति” ऐसा अपवाद भरत है।
इस प्रकार भरत अत्यंत विरह और राम
प्रेम में आकुलित दशा को प्राप्त हैं।अब
भगवान् और यथायोग्य सभी से सादर
मिलने के अनन्तर पुनः यह विचार
करते हैं,कि काल ने माता के बहाने से
बहुत बड़ा कुचक्र रचा है।जैसे अतिवृष्टि
आदि छः ईतियों के भय से धान जल्दी
परिपक्व होकर निर्भय होना चाहे और
यह काल तो पहले से ही निर्भय है।
” कीन्हि मातु मिस काल कुचाली
ईति भीति जस पाकत साली”
संशय कुतर्क के विचार-सागर में डूबते
उतराते हैं,भरत सोच केवल एक कि
कैसे श्रीराम का राज्याभिषेक हो।उपाय
समझ नहीं पड़ता। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा
से लौट सकते हैं, किन्तु वे भी पहुँचे हुए
गुरु हैं, राम की रुचि भाँपकर ही कहेंगे
“केहि बिधि होइ राम अभिषेकू
मोहि अवकलत उपाउ न एकू
अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी”
मैं प्रभु का अनुचर सेवक और दास हूँ।
समय और विधाता हमारे प्रतिकूल है।
मेरा लौटने का हठ करना सेवक-धर्म
नहीं, प्रत्युत अधर्म/कुकर्म होगा।और
सेवक का धर्म तो शिव-सेवित कैलाश
से भी वजनदार बड़ा और श्रेष्ठ होता है।
” मोहि अनुचर कर केतिक बाता
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू “
कोई भी एक युक्ति निश्चित नहीं हो पाती
सोचते-सोचते रात बीती सुबह हो गई।
“एकउ जुगुति न मन ठहरानी
सोचत भरतहिं रैनि बिहानी “
प्रातः वशिष्ठजी ने सभी को बुलाया।
समयानुकूल बात बताई और श्रीराम को
धर्मधुरीण “स्वतन्त्रः कर्ता “सत्यसन्ध
पालनकर्त्ता,जगमंगल के एककारण
सूर्यवंश के सूर्य और वेदशास्त्र का सेतु भी
बताया।
” धरम धुरीन भानुकुल भानू
राजा राम स्वबस भगवानू
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू
राम जनमु जग मंगल हेतू”
राम,गुरुमातापिता आज्ञापरायण दुष्दमन
कर्ता और देवहितकर्ता हैं।इनके समान
नीति प्रीति परमार्थ स्वार्थ कोई नहीं जान
सकता।
” गुरु पितु मातु बचन अनुसारी
खल दलु दलन देव हितकारी
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ”
वशिष्ठ ने सभी मंगलों का मूल, राम का
अभिषेक बताया, जिसमें नीति,परमार्थ
स्वार्थ सब कुछ है,लेकिन उपस्थित सभी
को कोई उत्तर नहीं सूझा,भावविह्वल
दशा को जो प्राप्त थे।
भरत ने सिर चरणों में रख कर निवेदन
किया है।
” सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू
मंगल मोद मूल मग एकू
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ
कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी
नय परमारथ स्वारथ सानी”
लोगों को कोई उत्तर सूझा।सभी लोग
भावसार में डूब चुके हैं।भरत बद्धांजलि
बोलते हैं-
“उतरु न आव लोग भए भोरे
तब सिरु नाइ भरत कर जोरे”
उन्होंने कहा कि सूर्य वंश में एक से एक
राजा हुए हैं, क्रम से सभी के माता-पिता
हैं, सभी के कर्मों का शुभाशुभ फल तो
विधाता देते हैं,किन्तु सभी के दुःखों का
आत्यंतिक नाश करनेवाले सर्वमंगल के
दाता हे गुरुदेव! आपके आशीष ही हैं।
अतः जिससे विधिगति और तन्निश्चित
व्यवस्था उलट पुलट जाय ऐसे आशीष
पर आप दृढ़ हो जायें तो भला कौन उसे
रोक सकता है।
” भानुबंस भए भूप घनेरे
अधिक एक ते एक बड़ेरे
जनम हेतु सब कहँ पितु माता
करम सुभासुभ देइ बिधाता
दलि दुख सजइ सकल कल्याना
अस असीस राउरि जगु जाना
सो गोसाइँ बिधि गति जेहि छेंकी
सकइ को टारि टेक जो टेकी”
तब गुरु बशिष्ठ ने कहा कि जो कुछ भी
अच्छा होगा, वह राम जी की कृपा से ही
होगा, इनके प्रतिकूल कोई भी सिद्धि तो
सम्भव नहीं।
” तात बात फुरि राम कृपाहीं
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं
लेकिन “इनका” अनुमोदन यदि हो तो हम
समझते हैं कि,शत्रुघ्नलाल जी के साथ
भरत बन चले जायँ और सीतासहित
रामलक्ष्मण यहाँ से वापस अयोध्या चलें,
यद्यपि यह कहते हुए भी संकोच हो रहा।
” सकुचहुँ तात कहत एक बाता
अरध तजहिं बुध सरबस जाता”
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः
” तुम कानन गवनेहु दोउ भाई
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई”
अब भरत शत्रुघ्नलाल जी के हर्ष का
ठिकाना नहीं।सारा शरीर प्रमोद से भर
गया,और ऐसा लगा कि अब तो राजा
राम जी हो ही गए।
” सुनि सुबचन हरष दोउ भ्राता
भे प्रमोद परिपूरन गाता
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा
जनु जिय राउ रामु भए राजा”
रानियाँ रो पड़ी,उनके लिए तो दोनों ही
बातें सुखदुख दोनों की कारक हैं।
” बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी
सम दुख सुख सब रोवहिं रानी”
भरत यह बात सुन आनन्द विभोर हैं।
कहते हैं कि, वे शत्रुघ्नलाल जी के साथ
आजन्म वनवास के लिये तैयार हैं, मानो
सारे जीवन का एकत्रित फल ही मिल
गया है उन्हे।इससे बड़ा सुख क्या होगा?
” कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे
फलु जग जीवन अभिमत दीन्हे
कानन करउँ जनम भरि बासू
एहि तेअधिक न मोर सुपासू”
भरत ने कहा कि सीताराम जी तो सभी
जीवों की आत्मा ही हैं।इनसे अगम्य कुछ
भी नहीं।और गुरुदेव भी सर्वज्ञ साधुजन
हैं, अतः अब शीघ्रता से अपनी बात को
प्रमाणित करें।
“अंतरजामी रामु सिय
तुम सरबग्य सुजान
जौं फुर कहहु त नाथ
निज कीजिअ बचनु प्रमान”
भरतद्वारा सप्रेम आजन्म वनवास का
निश्चय करने पर सारी सभा सहित मुनि
भी अपनी देहदशा मानो भूल गए।
” भरत बचन सुनि देखि सनेहू
सभा सहित मुनि भए बिदेहू”
नारायण! अब श्रीरामलीला में भरत का
का चरित्र एक अरित्र (सुन्दर मार्ग)बन
गया है, जो उनके प्रेम और त्याग की
सर्वोच्च पराकाष्ठा है। देखिये-
गोस्वामी जी की झोली उपमालंकार से
तो भरी है, लेकिन उत्प्रेक्षा भी अद्वितीय,
क्योंकि इसके आलम्बन वशिष्ठभरत
जैसे उत्प्रेक्षणीय चरित्र हैं।दर्शनीय है यह
स्वरूप।
“भरत की महामहिमा अगाधसमुद्रवत् है”
” भरतमहिमा के अपारजलराशि के तट
पर गुरुवशिष्ठ की धीर बुद्धि ऐसी स्थिर
स्थित हो गई,जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ कोई
स्त्री,कि अब क्या करें क्या न करें”
अथवा-
“भरतमहिमा रूपी समुद्रतट पर अबला
स्त्री की बुद्धि भी अबला होकर अधीर
अस्थिर(चंचल) हो गई,कि अब क्या करें
क्या कहें”
इसीलिये गोस्वामी जी ने कहा।
” भरत महा महिमा जल रासी
मुनि मति तीर ठाढ़ि अबला सी”
गुरु शरणम् ।। हरि शरणम् ।।