भरत बिकल सुचि सोच


भरत को रामपद पाने की व्याकुलता है।
अतः राजपद मिलने की पीड़ा। क्योंकि
राजपद अनित्य भोगमय और रामपद
नित्य योगमय। नित्ययोगमय भगवान्
और केवल इन्हे छोड़कर और कुछ न
चाहने वाले हरिः ओ३म् तत्सत् भक्त
भक्तभरत अपूर्व प्रेम के विग्रह इसीलिये
हैं।

चित्रकूट की धरती पर रामभरतमिलन
अन्वर्थ सुयोग का सार्थक उदाहरण है।
चित्रकूट विचित्र और कूट (रहस्यमय)है।
भगवान्-भक्त के विचित्र चित्र का साक्षी
बना है।यह मिलन प्रेम-प्रेमी का है,जहाँ
प्रेमी प्रेम(भगवान्) को पाने का हठी एवं
आकांक्षी है।वह प्रेम के लिये ही प्रेम
करता है, वियोग की ज्वाला में जलकर
हृदय को परिशुद्ध बना डालता है
” देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ”
भक्त-भगवान् का प्रेम रहस्यमय(कूट) है
इसीलिये चित्र विचित्र चित्र है।
चित्रकूट का और भाव है।
इस भाव में”चित्तकूट “संज्ञा मान लें
तब कूट(रहस्यपूर्ण) चित्त वाला होने से
यह “चित्तकूट”अन्यार्थ वाची हो जाता है।
भगवान्-भक्त की चित्तदशा का रहस्य
उन दोनों के अतिरिक्त और किसी के भी
अत्यंत गूढ हो जाता है,जो इसी कोटि के
भक्त के द्वारा गम्य है।
अब सोचने वाली बात है कि ऐसे स्थल
का ऐसा महत्व,रहस्य और वैचित्र्य है कि
देवत्रितयी के मनबुद्धि के पहुँच के बाहर
कह दिया गोस्वामी जी ने।

“जहँ न जाइ मन बिधि हरि हर को”

और विनय की पराकाष्ठा देखिये उन्होंने
कहा कि मलिनचित्त मैं कैसे परिशुद्ध
चित्तवृत्ति वाले भगवान्-भक्त का वर्णन
कर सकता हूँ। सद्रजः तमस् का मायिक
शरीरवाला मैं नित्य , अनित्य का ही
चिन्तन करनेवाला हूँ। मैं कुबुद्धि हूँ।
भगवान्-भक्त त्रिगुणात्मक भी और
त्रिगुणातीत भी। यही तो रहस्य(कूट) है।

दुर्बुद्धि व्यक्ति गुणातीत दशा का बखान
कर नहीं सकता जैसे कि तन्त्री(तारवाद्य)
को बजाने के लिये गाँडर(तालाब की
कोमल घास) को ताँती (तार ) के रूप में
प्रयोग करने पर,वह टूट हि जायेगा,
सुन्दर रागध्वनि तो दूर की बात है।

” सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती
बाज सुराग कि गाँडर ताँती”
अब ऐसी चित्र विचित्र चित्रकूट की भूमि
पर शोचनीय सोच विचार शोक और
परम प्रेम भरतभगवान् का है तो उसे
जानना उन्हीं के जनाने से सम्भव है।
कथा प्रवाह आगे बढने बढ़ता जाता है।

सभी आपस में गुरजन,माताओं समेत
एक दूसरे से प्रेमपूर्वक सादर मिलते हैं।
भरतजी अनुज सहित प्रेमोत्कर्ष में सीता
जी के चरणकमलरज को सिर पर धरते
हुए प्रेमविह्वल हैं
” सानुज भरत उमगि अनुरागा
धरि सिर सिय पद पदुम परागा “
सीता जी आशीष देती हैं और प्रेममग्नता
में देह की सुध बुध समाप्त हो जाती है
” सीय असीस दीन्हि मन माहीं
मगन सनेह देह सुधि नाहीं “
भगवान् ने गुरु को दण्डवत् प्रणाम किया
है।मुनि ने हृदय से लगाया है।देवों ने पुष्प
वर्षा की है।भगवान् की आर्त दशा लोगों
ने देखी है।सीता जी ने सासुओं की सेवा
की है।एक भगवान् ही समझ रहे हैं कि
सभी माताएं साक्षात् माया सीता की
माया से ग्रस्त हैं
” लखा न मरमु राम बिनु काहूँ
माया सब सिय माया माहूँ “
सीता जी के साथ रामलक्ष्मण का सरल
स्वभाव देख कर कुटिल कैकेयी रानी को
पछतावा हो रहा है
“लखि सिय सहित सरल दोउ भाई
कुटिल रानि पछितानि अघाई “
धरती और यमराज से याचना करती हैं।
धरती फटती नहीं है कि उसमें समा जायँ
और विधाता मृत्यु भी नहीं दे रहा है।
कितना कठिन काल है।
“अवनि जमहि जाचति कैकेई
महि न बीचु बिधि मीचु न देई “
लोक और वेदविदित बात कविगण
कहते हैं कि राम से विमुख को धरती
क्या, नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा।
” लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं
राम बिमुख थलु नरक न लहहीं “
भरत जी को प्रेमविह्वल दशा में न नींद
आती है और न ही भूख लगती है।
कीचड़ के नीचे फँसी मछली अगाध जल
में विहार करने की लोभी होकर भी जैसे
संकुचित है।
वैसे ही भरत जी भी मायिक कीच में
फँसे लोगों बीच का संग त्याग कर पवित्र
रामप्रेमसलिल के संकोची हैं

नीच कीच बिच मगन जस
मीनहिं सलिल सँकोच
निसि न नींद नहिं भूख दिन

“भरतु बिकल सुचि सोच “


गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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