भरत और भगवान् राम का एक दूसरे
के प्रति संक्रमित प्रेम किसी के लिए भी
शब्दों में व्यक्त करना सम्भव नहीं।
महाराज जनक इसको समझते हैं और
इसीलिये बरबस उनके मुख से यह
स्वीकारोक्ति हुई है
“भरत महामहिमा सुनु रानी
जानहिं राम न सकहिं बखानी”
यह महामहिमा और कुछ नहीं,वरन्
निष्काम और विशुद्ध स्नेह ही तो है।
बटवृक्ष की छाया में जहाँ पर्णकुटी बनी
है, इसके आसपास सघन झाड़ी है।
लक्ष्मण जी,भरत को निषाद के साथ
नहीं देख पाते ,किन्तु भरत जी मंगलमय
कुटीर देख लेते हैं
सखा समेत मनोहर जोटा
लखेउ न लखन सघन बन ओटा
भरत दीख प्रभु आश्रम पावन
सकल सुमंगल सदन सुहावन
सुखनिधानभगवान्सेवित प्रान्तर में
प्रवेश हुआ कि दुखदावानल शान्त हो
गया।मानो किसी योगी को परम तत्व
ही मिल गया।योगी का परम लक्ष्य प्राप्य
अर्थ सच्चिदानन्द सुखनिवास और
रमानिवासराम ही हैं
“करत प्रवेस मिटे दुख-दावा
जनु जोगी परमारथ पावा”
भरत ने सुरक्षा में आगे खड़े मुनिवेश में
लक्ष्मण को देखा ,जो कमर में बँधे हुए
वल्कल वस्त्र से तरकस कसे हाँथ में
वाण और धनुष को कन्धे पर रखे थे
“सीस जटा कटि मुनिपट बाँधे
तून कसे कर सरु धनु काँधे”
यज्ञवेदी पर नाना मुनिगण,साधुसन्त
और सीतासहित राम जी शोभायमान थे
“बेदी पर मुनि साधु समाजू
सीय सहित राजत रघुराजू”
जटिल वल्कल वस्त्र में सीताराम ऐसे कि
श्याम सुन्दर”रति-काम “ही मुनि वेश में
शोभा पा रहे हों
“बलकल बसन जटिल तनु श्यामा
जनु मुनि बेस कीन्ह रति कामा “
मुनिमण्डली के बीच श्रीसीतारामजी
की शोभा ऐसी थी कि ज्ञानसभा में मानो
भक्ति-सच्चिदानन्द विराजे हों
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु
ग्यान सभा जनुतनु धरे भगति सच्चिदानंदु
इधर भरत जी शत्रुघ्नलाल के साथ सुख
मग्न होकर दुख-शोक द्वन्द्व ही भूल गए
“सानुज सखा समेत मगन मन
बिसरे हरष सोक सुख दुख गन”
अगम प्रेम की विवश अवश अवस्था
ऐसी हो गई है कि वियोगाग्निज्वाला से
जलते हुए भरत जी ने “पाहि पाहि”
का आर्तनाद किया है।प्रभु चरणों में ऐसे
धड़ाम हुए मानो कोई डण्डा गिर पड़ा हो
नारायण!डण्डा अचेचन अचितवत् होता
है,और इसी गति को प्राप्त, भरतजी तो
लगता है,अचेत हो गए हैं
“पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं
भूतल परे लकुट की नाईं”
लक्ष्मण को विश्वास हुआ कि ऐसी प्रेम
विह्वलता में भरत ही हैं, जो दण्डवत्
प्रणाम कर रहे हैं
” बचन सप्रेम लखन पहिचाने
करत प्रनामु भरत जिय जाने “पृष्ठभाग
में भरत जैसे भाई का स्नेहभाव आगे की
ओर सेव्य प्रभु राम की सेवा का भाव
कि पहचानने पर भी न मिल पा रहे न ही
न मिलने का त्याग ही कर पा रहे हैं
” सुकवि लखन मन की गति भनई
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई “
फिर भी सेवा-भार भारी पड़ रहा जैसे
हवा में पतंग उड़ाता खिलाड़ी पतंग को
खींच रहा है, लेकिन वह बड़ी मन्द गति
से नीचे उतर रही हो
“रहे राखि सेवा पर भारू
चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू”
लक्ष्मण से रहा नहीं गया और श्रीरामजी
से कह दिया, यह भरत प्रणाम कर रहे हैं
” कहत सप्रेम नाइ महि माथा
भरत प्रनाम करत रघुनाथा “
अब श्रीराम जी भी प्रेमविह्वल दशा को
प्राप्त होकर उठ खड़े हुए भरत को उठाने
और ऐसी विकलता कि वस्त्र, धनुष, तीर
तूणीर सभी कुछ कोई किधर कोई किधर
गिर रहा, ज्ञान ही नहीं।
“समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव “
राम में प्रेम की अधीरता अद्भुत! आश्चर्य!
“उठे राम सुनि प्रेम अधीरा
कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा”
उपस्थित सभी लोग अपने को ही भुला
बैठे जब भरत को उठाकर भगवान्
ने गले से लगा लिया
“बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि
अपान “यह भक्त-भगवान् प्रेमी-प्रेम का
का मिलन किसी के लिये भी अवर्णनीय
हो गया-मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी
कविकुल अगम करम मन बानी।
ऐसी अकथ प्रेमपरिपूर्णता दोनों में है
कि दोनों मन-बुद्धि-चित्ताहंकार अन्तः
इन्द्रियों को भी भूल गये
“परम प्रेम पूरन दोउ भाई
मन बुधि चित अहमिति बिसराई”
और जब न मन न बुद्धि न चित्त और न
ही अहंकार शेष रहा, तभी विशेष और
“गुणातीत” अवस्था हो गई प्रेम की।
इसीलिए यह “प्रेम वर्णनातीत”
श्रीरामजी और भरत में कौन मूर्ति और
कौन उसकी छाया? निर्णय कर पाना
असम्भव।
कौन मूल-प्रति और नारायण! कौन
छायाप्रति/फोटोस्टेट, किसी भी कवि
विद्वान् की बुद्धि के बाहर
” कहहु सुप्रेम प्रकट को करई
केहि छाया कबि मति अनुसरई “
दोनों ही मूलप्रति।
कवि को अर्थ-शब्द और नट को ताल
लय का आधार होता है। लेकिन यहाँ
तो ऐसी स्थिति है कि राम-भरत जी के
प्रेम में कौन”आधार” और कौन “आधेय”
यह निर्णय करना असम्भव हो गया है।
जब दोनों में आधार का निर्णय न हो
तब निराधार होकर कवि कैसे वर्णन
करने में समर्थ हो बेचारा।
इसीलिये ऐसे भगवान् और भक्त का
प्रेमवर्णन किसी के लिये भी अगम।
यहाँ तक कि ऐसे अगम-अकथ प्रेम तक
ब्रह्मा-विष्णु-महेश का भी मन नहीं जा
सकता, औरों की बात ही और
” जहँ न जाइ मन बिधि हरि हर को
अगम सनेह भरत रघुबर को”
गुरः शरणम् हरिः शरणम् ।