नारायण! भरत के नेत्रों से अश्रु जल की
सरिता बह चली जब उन्होंने बहुत दूर
से ही प्रभुसेवित स्थल को देखा
साथ में निषादराज गुह का भाई मार्ग
दर्शन करते आगे चल रहा है।
चले भरत जहँ सिय रघुराई।
साथ निषादनाथु लधु भाई।।
प्रेम ऐसा प्रवहमान है कि माता की करनी
पर संकोच होता है, अनेक कुतर्क संशय
की लहरें प्रेमनदी-प्रवाह में पर्वताकार
होकर अवरोध जैसी हो जाती हैं।
सोचते हैं कि रामलक्ष्मण कहीं मेरे आने
का समाचार जान अन्यत्र तो नहीं चले
जायेंगे।
समुझि मातु करतब सकुचाहीं।
करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
रामलखन सिय सुनि मम नाऊँ।
उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाउँ।।
लेकिन संशय का समाधान भी स्वयं ही
सोचते हैं कि यदि माता के निर्णय पक्ष
में मानकर भगवान् कुछ भला-बुरा ही
कहेंगे तो वह कम ही होगा।प्रभु सर्वज्ञ
अकारण करुणावरुणालय हैं मेरी गति
अपनी ओर देख कर पापों,अवगुणों को
क्षमा कर देंगे।
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं
सो थोर।अघ अवगुन छमि आदरहिं
समुझि आपनी ओर।
करुणासागर के प्रति ऐसा समर्पण है कि
जान जाते हैं कि सेवक जान मेरे दोषों
का परिहार करेंगे प्रभु। दास के दोष मान
सुस्वामी क्षमा करेंगे। उनकी तो बात ही
छोड़िये मैं तो उनके चरणस्पर्शसुख पाने
वाली अचेतन “पनही “के शरणागत हूँ
मोरें सरन रामहि की पनहीं।
राम सुस्वामि दोसु सब जनहीं।
भरत प्रेम का चरम सुख ले रहे हैं
राम का कृपालु स्वभाव जान प्रेम से
ऐसे सराबोर हैं कि जैसे प्रेममदिरा पीकर
प्रेममदमत्त होने से पैर कहीं के कहीं पड़
रहे हैं -प्रेममद छाके पग परत कहाँ के
कहाँ। ” जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ
तब पथ परत उताइल पाऊँ।”
और प्रेम ऐसी पराकाष्ठा पर कि भरत
को एकटक निहारता हुआ निषाद लघु
भ्राता भी प्रेममग्न विस्मृत शरीरसंसार हो
मानो अपनी देहदशा ही भूल गया
देखि भरत कर सोचु सनेहू।
भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।
उधर भगवान् चित्रकूट में जहाँ बिराजे हैं
उस पर्वत को देख कर भरत की दशा
ऐसी कि जैसे भूखे को अन्न मिल गया
” भरत दीख बन सैल समाजू।
मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।
श्रीराम ही जहाँ विराज जायें उस बन
की शोभा गोस्वामीजी की दृष्टि में कुछ
अद्भुत है।
छः प्रकार की ईतियों अतिवृष्टि ,अनावृष्टि
शलभ(टिड्डीदल),मूषक,पक्षी और शत्रु
राजा का नगर घेरना ,इत्यादि संकटों से
वनप्रान्तर मुक्त हो गया।
“अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषकाः खगाः
अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः मताः”
कहीं किसी प्रकार का कोई भी भय नहीं
दैहिक-दैविक-भौतिक ताप और ग्रहों का
प्रतिकूल प्रभाव भी विनष्ट हो गया।
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी।
त्रिविध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
भरत की प्रेमविह्वलता देख वन, सुन्दर
सुराज्य में बदल गया सभी सुखी हो गये
” जाइ सुराज सुदेस सुखारी
होहिं भरत गति तेहिं अनुहारी”
उधर भगवान् द्वारा पर्णकुटी बना कर
रहने का फल है कि सुराज्य पाकर वन्य
जीवरूपी प्रजा भी सुखी है।
राम बास बन संपति भ्राजा।
सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।
सुन्दर सुहावने और अत्यन्त पवित्र
वन-राज्य के राजा “विवेक “और मन्त्री
“वैराग्य “बन बैठे हैं, क्योंकि राजा रूप में
स्वतः अभिषिक्त श्रीराम जो बैठे हैं।
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू।
बिपिन सुहावन पावन देसू।।
अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
आदि पाँच “यम” तथा शौच,सन्तोष,तप
स्वाध्याय,ईश्वर-प्रणिधान आदि पाँच
नियम मिलकर भट(योद्धा) बन गए हैं।
“पर्वत” राजधानी है।शान्ति-सुमति नाम
की दो रानियाँ भी शोभायमान हो गईं हैं
भट जम नियम सैल रजधानी।
सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
मोहरूपी राजा को सदलबल जीत कर
बिबेक रूपी राजा निष्कंटक राज्य कर
रहा है। सुन्दर सम्पदा सुखसंपति पूर्ण
काल आया, क्योंकि कालहुँ कर काला
सर्वकारणकारण भगवान् जो विराजे हैं।
“जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक
भुआलु।करत अकंटक राज पुँर सुख
संपदा सुकालु “
सभी परस्पर प्रतिद्वन्द्वी जीव-जन्तु बैर
भाव छोड़कर भगवान् की चतुरंगिणी
सेना बने हैं-
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा।
जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।
झरनों की आवाज मतवाले हाथियो की
तरह है, मानों अनेक प्रकार के नगाड़े
बज रहे हैं-
झरनि झरहिं मत्त गज गाजहिं।
मनहुँ निसान बिबिध बिधि बाजहिं।
चकई चक चातक शुक कोकिल अपनी
बोली से वन प्रान्तर को गुंजायमान किये
हैं, और मराल मुदित हो गए हैं।
चक चकोर चातक सुक पिक गन।
कूजत मंजु मराल मुदित मन।
भौरों का गुंजार जैसे मधुर गीत गा रहा
मोर नाच रहे हैं, मानो कि सुराज्य पाकर
ये भी सानन्द हैं।
अलिगन गावत नाचत मोरा।
जनु सुराज मंगल चहुँ ओरा।।
वृक्ष लता पता पुष्पित पल्लवित हैं।
क्योंकि सर्वत्र मंगल के मूल श्रीराम
बिराज गये हैं -“बेलि बिटप तृन सफल
सफूला।सब समाजु मुद मंगल मूला”
पाकर जामुन आम और तमाल वृक्षों के
मध्य एक “वटवृक्ष” शोभित है,जैसे कि
तिमिर में सूर्यमय ज्योति है, जिसे
ब्रह्मा ने सारा सौंदर्य जुटाकर बनाया हो
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला।
पाकरि जंबु रसाल तमाला।।
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा।
मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी।
बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी। नीचे
यहीं प्रभुराम ने पर्णकुटी बनाई है , जो
मन्दाकिनी के तट पर है।
ए तरु सरित समीप गोसाईं।
रघुबर परनकुटी जहँ छाई।
तुलसी के पौधे भी लक्ष्मण और सीताजी
ने लगा रखे हैं।
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए।
कहुँ कहुँ सिय कहुँ लखन लगाए।।
बट की छाया में यज्ञवेदी बनी है, जिसे
जगदम्बा जानकी ने अपने करकमल से
सुन्दर रूप दिया है।
बटछाया बेदिका बनाई।
सिय निज पानि सरोज सुहाई।।
सनातन धर्म संस्कृति सदाचार की कैसी
मर्यादा है कि ,जाकी सहज साँस स्रुति
चारी ,वेद अनुगत पुराणों की कथा को
स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम सीता जी और
मुनियों सहित सुन रहे हैं
“जहाँ बैठि मुनिगन सहित
नित सिय राम सुजान।
सुनहिं कथा इतिहास सब
आगम निगम पुरान।”
अब निषाद द्वारा इंगित वह वटवृक्ष देख
कर प्रेममूर्ति भरत अश्रुपात करने लगते
हैं -“सखा बचन सुनि बिटप निहारी
उमगे भरत बिलोचन बारी”
शत्रुघ्नलाल के साथ हाथ जोड़े दौड़ पड़े
हैं , जिनका प्रेम कहने में सरस्वती लजा
गईं। “करत प्रनाम चले दोउ भाई।
कहत प्रीति सारद सकुचाई “रामपद देख
ऐसे प्रसन्न हैं जैसै दरिद्र को पारस मणि
ही मिल गई-
हरषहिं निरखि राम पद अंका।
मानहुँ पारसु पायउ रंका।
प्रेम की ऐसी विस्मयपूर्ण दशा की प्रेमी
भरत सिर को धूलि में रखकर नेत्रों में
लगा लेते हैं जैसे कि वह धूल नहीं बल्कि
रघुनाथ जी ही मिले हों –
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं।
रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।
जड़ हो गए हैं जीवजन्तु भरत कीअकथ
कहानीक्ष देखकर।आकाश से पुष्पवर्षा
हुई है।सभी लोग ऐसे “प्रेमीप्रेम “और
“प्रेमास्पद “को देख प्रेम की सराहने लगे
हैं।भरत का ” विरह” मन्दराचल है।और
भरत जी स्वयं गंभीर समुद्र। मानो कि
कृपासिन्धु रघुनाथ जी ने मंथन करके
प्रेमनीर की अमृत-नदी बहा दी है और
जिसमें देवता और साधु स्नान कर रहे हैं
प्रेम अमिअ मन्दर बिरहु
” भरत पयोधि गँभीर “
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित
कृपासिन्धु रघुबीर।
।।गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।