अपनी मर्यादा शिक्षण लीला में रघुनाथजी ने वनवास लीला के माध्यम से भरत का ऐसा चारुचारित्र्य चित्र उतार दिया कि स्वयं भरत का नामस्मरण ही भवसागर तारनतार बन गया।
लोक सुजस परलोक सुख सुमिरत नाम तुम्हार।
आगे भगवान् ने कहा कि शिवजी को साक्षी मान मैं सत्य स्वभाव से कहता हूँ कि, हे भरत! यह सारी धरती तुम जैसे त्यागी वीतरागी के निर्दिष्ट मार्ग के अनु- सरण से सुखी और टिकी है,सभी सुख की अनुभूति कर रहे हैं,क्योंकि”कस्य सुखं न करोति विरागः”। इसमें कोई कुतर्क नहीं करो,क्योंकि किसका किससे वैर है और किसका किससे प्रेम है, यह छिपा नहीं रहता-
कहहुँ सुभाउ सत्य सिव साखी,भरत भूमि रह राउरि राखी।तात कुतरक करहुँ जनि जाएँ,बैर प्रेम नहिं दुरइ दुराएँ।
ऋषियों और मुनियों के समीप पशु-पक्षी
निर्भ्रान्त चले जाते हैं, लेकिन उनके प्राणों के ही बाधक,बधिकों को दूर से देखकर वे भाग जाते हैं।कौन मेरा हितकर और कौन अहितकर,पशु-पक्षी भलीभाँति जानते हैं।
और मनुष्य शरीर तो परम विवेक सम्पन्न, गुणों और ज्ञान-विज्ञान, का निधान है-
मुनि गन निकट बिहग बन जाहीं,बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।हित अनहित पसु पच्छिउ जाना,मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।
तात भरत!मैं तुम्हें शैशव से ही अच्छे से जानता हूँ।तुम अपने हृदय में असमंजस क्यों रखते हो।”राजा”ने मुझे त्याग कर अपने संकल्पित “सत्य” की रक्षा कर ली।
शरीर त्याग कर प्रेम-प्रण का रक्षण किया
“तात तुम्हहिं मैं जानउँ नीके ,करौं काह असमंजस जीके।राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी, तनु परिहरेउँ प्रेम पन लागी।”
“रानी कैकेयी के प्रति प्रेम-प्रण की रक्षा सत्यसंकल्प की रक्षा, और प्रेमविग्रह चित्स्वरूप प्राणाधार मेरे(राम के) त्याग से स्वाभाविक प्राणत्याग करके “पिताजी”ने अपने पति-पिता-राज-धर्म सबकी रक्षा कर ली” उनके वचनों के विपरीत जाना मेरे लिये शोचनीय है।और इससे भी अधिक मेरे लिये तुम्हारा संकोची स्वभाव है। और सबसे बड़ी बात यह कि गुरु का मेरे लिए यह आदेश है कि, जो भरत चाहें वही,मुझे करना है-
तासु बचन मेटत मन सोचू,तेहिं ते अधिक तुम्हार सँकोचू।ता पर गुरु मोहि आयसु दीन्हा,अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।
भगवान् का भरत पर ऐसा अनुग्रह देखकर, सारी उपस्थित सभा सानन्द हो गई, क्योंकि भगवान् ने कहा कि हे भरत! तुम अपने मन में प्रसन्नता धारण करो,कोई संकोच मत करो,मैं सत्यसन्ध हूँ, जो कुछ भी तुम कहोगे,अवश्य ही मैं वही करने का वचन देता हूँ –
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि,कहहु करौं सोइ आजु।सत्यसन्ध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाज।
अब इधर इन्द्रादि देव भयभीत हो गए।
सोचा कि राक्षस विनाश का बना बनाया खेल बिगड़ सकता है।परस्पर विचारने लगे कि भगवान् तो भक्त के वशीभूत रहते हैं।अम्बरीश-दुर्वासा की घटना का स्मरण होने लगा,कि भक्त अपने प्रति कृतापराध को तो क्षमा करते हैं, किन्तु भक्तापराध को कदापि नहीं।सभी निराश होने लगे,और मन ही मन श्रीराम जी के शरण में चले गए।किन्तु उन्होने सोचा –
” भक्तापराध तो भक्त शरणागति से ही कटेगा, इतिहास साक्षी है।”
माथा पीटने लगे और परस्पर एक दूसरे के कान में कहने लगे कि अब तो देवकार्य
भरत के हाथों है ।लम्बे समय तक विषाद में देवता रहे।”भक्तदृष्टसत्यरक्षण”और भक्त-रक्षण हेतु भगवान् ने “नृसिंहावतार”
धारण कर सबको बचाया था।
भक्तभरत-स्मरण और भक्तशरणागति ही एकमात्र उपाय है-
सुरगन सहित सभय सुरराजू।
सोचहिं चाहत होन अकाजू ।।
बनत उपाय करत कछु नाहीं।
राम सरन सब गे मन माहीं।
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं।
रघुपति भगत भगति बस अहहीं।।
सुधि करि अंबरीस दुरबासा।
भे सुर सुरपति निपट निरासा।
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा
नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा।
अब सुर काज भरत के हाथा।।
देवताओं को कोई भी अन्योपाय नहीं सूझता,सिवाय भगवान् के भक्त की सेवा। राम जी अपने सेवक की सेवा से ही सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं।
आन उपाय न देखिअ देवा।
मानत रामु सुसेवक सेवा।।
यदि राम जी को वश में करना हो तो सभी
लोग,हृदय से भरत जी का सप्रेम स्मरण करें। श्रीभरत जी ने अपने गुणों और शील स्वभाव से श्रीराम जी को वश में कर लिया है-
हियँ सप्रेम सुमिरहु सब भरतहिं।
निज गुन सील राम बस करतहिं।।
अब तो गुरु बृहस्पति ने देवताओं के विवेक की सराहना की है। क्योंकि देवों ने
विवेकपूर्वक ,भरतभक्ति करने का जो निश्चय कर लिया है।
इन देवताओं का तो सौभाग्य ही जग गया है, क्योंकि सारे “सुमंगल के मूल” भरत के चरणों में अनुराग पर अडिग हो चुके हैं।इन्ही भरत के चरणाश्रय से रामाश्रय मिलेगा और रावणादिक आसुरी शक्तियाँ भी विनष्ट हो जायेंगीं-
सुनि सुरमत सुरगुरु कहेउ,
भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग,
” भरत चरन अनुरागु।।”
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।
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