सेव्य भगवान्
सेवक यह पंचभूत पिण्ड शरीर
और तद् गत “जीवात्मा”।
शरीर भगवान् द्वारा निर्मित है
और मिला है कर्म शेष यानी कि
प्रारब्ध( पूर्व शरीर कृतकर्म) के कारण
“प्रारब्ध कारण और शरीर कार्य”
प्रारब्धवश मिले शरीर को
सुखदुःखादि भोगना ही पड़ता है
मतलब कि भोग भोगने के लिए परतन्त्र
है यह शरीर और शरीर को मिली
संसार की सारी सामग्री
भोगने के लिये मिला शरीर
शरीर से जुड़े पद पदार्थ
वस्तु व्यक्ति । तब सोचिये
स्वयं में स्वतन्त्र नहीं है यह
शरीर और इससे जुड़ा संसार
क्योंकि
जब शरीर भगवान् का है तब
नाना वस्तु पद पदार्थ भी “उनका”
अब यह सेवा के लिये मिला है
किसकी सेवा के लिए ?
तो “जिसका” है “उसी” की सेवा हेतु
यही यथार्थ सत्य है
श्रीरामकथा के असाधारण पात्र
श्री भरत जी उपर्युक्त
वास्तविकता से अवगत हैं ।
वे अपने स्वयं के शरीर को
श्रीराम जी के सेवार्थ मिला जान कर
जब ननिहाल से लौट कर अयोध्या
आने पर नहीं पाते हैं पिता और भ्राता
दशरथ-राम को तब
हो जाते हैं व्यथित।
व्याकुलता और बढ़ती है जब
पिता का शरीर पूर्ण होने का वृत्त
जानते हैं।
श्री राम का वन गमन सुनकर तो
व्यथा तीव्र हो जाती है।
और निश्चेष्ट जड़वत् हो जाते हैं
जब अयोध्या का सिंहासन देने
की पुरजोर चेष्टा की जाती है
एक ओर पिता के न रहने पर
पितृतुल्य अतुल्य भाई राम की सेवा
से वंचित हैं
और दूसरे सिंहासन पर बैठ
शासन और प्रशासन का गुरुतर
सेवा का कार्य पुनः पतन की ओर
ले जा सकता है , इसलिये भयग्रस्त
जिस-जिस मार्ग से प्रभु राम
वन की ओर प्रस्थान किये
उसी-उसी मार्ग से “उन्हे” लौटा
लाने के लिये सपरिकर चल पड़ते हैं।
निषाद द्वारा उन रास्तों और
सीतारामलक्ष्मण द्वारा सेवित स्थानों
को दिखाये जाने पर दुखी हैं।
पूछत सखहिं सो ठाउँ देखाऊ
नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊँ
जहँ सिय राम लखन निसि सोए
कहत भरे जल लोचन कोए
जिस सिंसुपा वृक्ष के नीचे प्रभु ने
विश्राम किया था, उसे भी सादर
सस्नेह दण्डवत् प्रणाम करते हैं जहँ सिंसुपा पुनीत तरु रघुबर किय विश्रामु अति सनेह सादर भरत कीन्हेउ दण्ड प्रनामु
“अब देखिये “सेवक” का
कर्तव्य कि वह अपने
“सेव्य” की सेवा करने वाले वृक्ष
को भूमि पर लेट कर लोट कर
दण्डवत् प्रणाम करता है “
“नहीं मिलता कोई ऐसा समर्पित
सेवक भरत जैसा जो अपने सेव्य
की सेवा करने वाले के प्रति भी
अतिशय अनुराग व्यक्त करे”
“और नारायण ! वह भी जड़ वृक्ष”
भगवान् के सेवित चरण-रज को
अत्यंत सुकोमल अपने आँखों में
लगाते हैं
कुश का बिछौना बना कर प्रभु
जिस पर सोए थे उसकी प्रेमपूर्वक
परिक्रमा करते हैं
“रज भी जड़ और कुश आसन भी”
कुस साँथरी निहारि सुहाई
कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई
बनै न कहत प्रीति अधिकाई "लेकिन भरत ऐसा प्रेमी कि जड़ रज और कुश में भी चेतना का संचार मानता है" "नारायण ! वृक्ष कुश और धूलि में भी चेतना संचरित है, क्यों कि श्रीमन्नारायण के चरण जो वहाँ संचरित हैं " "ऐसा भरत का आचरित चरित है"
माताओं गुरुजनों को पालकी में
बैठा देते हैं –कियउ निषादनाथु अगुआई मातु पालकी सकल चलाई लघुभ्राता श्रीशत्रुघ्नलाल को बुलाकर सपरिकर गंगा को प्रणाम करते हैं श्रीसीताराम लक्ष्मण के पैदल जाने का स्मरण करके पैदल ही चलते जाते हैं।
“गवने भरत पयादेहिं पाएँ”
अयोध्या से साथ-साथ चलने वाले
सेवक बार-बार घोड़े पर बैठ जाने
आग्रह करते हैं-
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा
होइअ नाथ अस्व असवारा
लेकिन और लेकिन
“अखिल विश्व कारन करन” का
“निरभिमान भक्त सेवक” घोड़े पर
नहीं बैठता।
कहता है सेवक का धर्म तो यह है कि
मेरे “सेव्य प्रभु राम” पैरों से चलकर
इन्हीं रास्तों से चले हैं।
इसलिये मेरे जैसे किसी भी सेवक
का सेव्य के प्रति यह आचरण होना
चाहिए कि
“जहाँ सेव्य का चरण पड़ा हो
वहाँ सेवक का सिर ही पड़े”
इसीलिये सेवक का धर्म अत्यंत
कठोर है कुलिशवत्
और बोल पड़ता है –
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा
“सब तें सेवक धरमु कठोरा”
गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्