भरत हृदय अति प्रेमु

राम-प्रेम-विरह-व्याकुल भरत जैसे-जैसे
चित्रकूट के समीप आते जा रहे हैं, अति
आनन्द उमगि अनुरागा होते जा रहे हैं।

“अति” प्रेम अनुराग आनन्द, केवल
भगवान् और भक्त के लिये ही प्रयोग हो
सकता है । इनके अतिरिक्त किसी दूसरे
के लिए नहीं । इसलिये कि इसमें किसी
अन्य का प्रवेश नहीं।
रावण वध के बाद जब प्रभु अयोध्या आकर विराजते हैं,तब सभी उपस्थित
लोकों से अनेक रामरूप धर कर एक
साथ सबके गले लगे हैं।
सर्वशक्तिमान सर्वकारणकारण जो हैं।
अति शब्द तो भगवान्-भक्त के मध्य ही
संगत है। क्योंकि “अति” अतीन्द्रिय शक्ति
वालों का विपरिणाम है।
लंका में माँ सीता द्वारा हनुमानजी को
रामप्रिय जानने पर, करहुँ बहुत रघुनायक
छोहू काआशीष मिलते ही पवनपुत्रप्रेम में
डूब कर “अति”आनन्दानुभूति करते हैं
” करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना” वानरराज
सुग्रीव भी इसी”अति” प्रेमदशा के शिकार
“मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा”
हनुमानजी महाराज भगवान् के चरणों
में प्रेममग्न ऐसे पड़े हैं, कि प्रभुचरणों को
छोड़ना ही नहीं चाहते। रुद्रावतार हैं जो
उमाशंकर तो इस स्वरूप को देख कर
इसी “अति” प्रेम में डूबे।
“रुद्र देह तजि नेह बस बानर भे हनुमान्”
प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा

इसके पहले की घटना भी “अतिप्रेम”की
साक्षी है, जब
लंका में हनुमान् जी द्वारा रघुनाथ जी का
सन्देश सुनकर जगदम्बा जानकी ऐसी
ही “अति” प्रेम मग्न (प्रेम में डूबी) दशा
को प्राप्त हैं,कि शरीर तक की सुध नहीं
प्रभु सन्देसु सुनत बैदही
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही

नारायण !क्या कहें रावण का भेजा दूत
बेचारा “शुक” कपटकौटिल्य भूल गया।
प्रेममूर्ति श्रीरामलक्ष्मण के दर्शन मात्र से
प्रेमी बन गया।प्रभुगुणों का कायल और
विक्षिप्त होकर प्राकृतिक देव-दुराव ही
विस्मृत कर बैठा-
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ

इधर चित्रकूट में अतिप्रेमी भगवान्,भरत
के शील-गुण-स्वभाव को कहते हुए इसी
तरह प्रेमसमुद्र में मग्न(डूबे)हैं –
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ

देवताओं द्वारा भरत को धर्मधुरीण और
और कविसमूहों द्वारा अवर्णनीय चरित्र
वाला कहा गया।राम ही जान सकते हैं
अतिप्रेमी भरत को।देवताओं की इस
बात पर सीतारामलक्ष्मण “अति” सुखी
अवस्था को प्राप्त हैं-
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी
अति सुख लहेउ न जाइ बखानी

भगवद् भक्त नारद जी फिरत सनेह मगन
सुख अपने नामप्रताप सोच नहिं सपने
होकर भावभक्तिविभोर हो जाते हैं और
अपने “भक्तिसूत्र “मे वे भी इस
“अतिप्रेम” दशाको भगवान् भक्त के
मध्य ही संगत मानते हैं,क्योंकि भक्त
अपने किसी भी कार्य से भगवान् के
सुख में ही सुखानुभूति करता है
तदतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं।
” अंशी-अंश ” तभी तक अलग जब तक
नारद से भेंट न हो।
“तत्-सुख-सुखित्वम् “
संसार-सुख-सुखित्वम् नहीं

चित्रकूट की जिस धरती पर धरतीपुत्री
सहित श्री रामजी बिराजे हैं,वहाँ पर्वत
की शोभा का कहना ही क्या

ऐसा लगता है कि तपस्वीजनों ने अपनी
सारी तपस्याऔर नियम धर्म के पालन
का सम्पूर्ण फल ही पा लिया है।
भरत जी का हृदय “अतिप्रेम ” में डूब
जाता है। गोस्वामी जी बोल पड़ते हैं
तापस तप फलु पाइ जिमि
सुखी सिराने नेमु
राम सैल सोभा निरखि
“भरत हृदय अति प्रेमु”

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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