अचर सचर चर अचर करत को

भगवान् और केवल भगवान् को ही
चाहने वाले भक्त एकाकार एकरस
अनन्तरूप आनन्दैकघन चिन्मय परम
प्रेमास्पद अमृतस्वरूप सर्वसुखकारी
और सीमातीत होते हैं।आत्माराम और
आत्मक्रीड भी हो जाते हैं
” मत्तः भवति स्तब्धः भवति आत्मरामः
भवति”
तात्पर्य यह कि जिन सन्तो भक्तों सेवकों
भगवदनुरागी जनों का अन्तःकरण ही
भगवान् स्वाकृष्ट कर लें अथवा चुरा लें
उनकी जगद् गति अवसित हो जायेगी।
“जगद् गति नष्ट तो भगवद् गति उदित”

नहि स्वात्मरामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति
इसीलिए ऐसे भरतादि सरीखे भक्त तो
नारद जी के मत में ऐसी भक्ति पा जाते
जो “परमप्रेमरूपा अमृतस्वरूपा च”
की सीमातीत श्रेणी है।सोचिये ,भरत
का मन-बुद्धि-चित्ताहंकार भगवान् में
चला गया और भगवद् रसैकघन होकर
ऐसी विस्मय दशा को प्राप्त हैं कि उन्हें
जो देखता है वह जड़वृक्षादि चेतन प्राणी
की तरह आनंद पा रहा और चेतन तो
भरत को जड़वत् निहारता है।

मुनि सिद्ध देवगण तक भरत की दशा
सिहाते हैं। राम नाम लेकर जब भरत
लम्बी साँस लेते हैं,तब वातावरण में प्रेम
ही प्रेम उमड़ पड़ता है।
वज्र और कठोर पत्थर जैसे जड़ का
हृदय चेतन की तरह द्रवित हो जाता है

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं।
दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।
जबहिं राम कहि लेहिं उसासा।
उमगत प्रेमु मनहुँ चहुँ पासा।

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पसाना।
पुरजन प्रेम न जाइ बखाना।।

स्रक् चन्दन बनितादिक भोगा।
देखि सरस विसमय सब लोगा।।

जितने जड़ वृक्षादि और जीव जन्तु रास्ते
में पड़े, वे परमप्रेमी अमृतवत् भरत को
देखकर सद्यः जीवन् मुक्ति पाकर मनुष्य
की तरह ही ” परम पद वैकुण्ठ” के ही
अधिकारी हो गये
जड़ चेतन मग जीव घनेरे ।
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ।
ते सब भए परम पद जोगू ।
भरत दरस मेटा भव रोगू ।।

और यहाँ बड़ी बात ये कि भक्त भरत
राममय तथा श्रीराम जी भरतमय हो
गए हैं । परस्पर भगवान् और भक्त एक
दूसरे का स्मरण कर रहे हैं।
यदि भक्त भगवान् मय हो गया तो उसमें
और भगवान् में अन्तर क्या?
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं।
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं।।
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता।
कस न होइ मगु मंगलदाता।।
सबसे बड़ी बात यह भी कि भक्त और
भगवान् का नाम स्मरण जो एक बार
कर ले तो वह भाग्यशाली जन भी तद्
वत् होकर किसी दूसरे को भी भवसिन्धु
से पार करा देने में समर्थ हो जाय –
बारक राम कहत जग जेऊ।
होत तरन तारन नर तेऊ।।
भरत जैसे भक्त की अवर्णनीय अवस्था
देख कर जड़वृक्षादि पशु-पक्षी भी प्रेम
से सराबोर हो गये।
देखि भरत गति अकथ अतीवा।
प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।

आकाश से फूल बरसने लगते हैं।सिद्धों
साधकों में अनुराग उमड़ आता है।
सभी भरत के अद्वितीय परम प्रेम को
सराहने लगते हैं। क्योंकि यह तो कोई
ऐसा असाधारण अनन्य प्रेम है कि
जड़ जीव चेतन की तरह आनन्द की
अभिव्यक्ति करते हैं। और चेतन सिद्ध
मुनि गन्धर्वादि प्रेममूर्ति भरत को एकटक
देखते हुए वृक्ष की तरह जड़ बन गए।
भगवान् भरतादि सरीखे प्रेमी को अपना
कर ऐसी कृपा कर देते हैं कि कृपाप्राप्त
भक्त भी कृपालु बन जाता है।
राम कृपा नहिं करहिं तसि।
जसि निष्केवल प्रेम।
इसलिये गोस्वामी जी ने कहा कि यदि
भरत जैसा प्रेमी पैदा न होता तो प्रभु
को छोड़ कर कौन जड़ को चेतन एवं
चेतन को जड़ बना सकता था।
भरतदर्शन भी कृपालु प्रभु की तरह बन
गया।भगवान् जैसे ही इन्हे देखकर
चराचरात्मक जगत् उलट-पुलट
जा रहा है।

होत न भूतल भाउ भाउ भरत को
“अचर सचर चर अचर करत को”


गुरुः शरणम् हरिः शरणम् ।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment