भरत के समान सेवक भक्त यदि कोई
नहीं तो भगवान् के समान कोई सेव्य भी
नहीं। और बड़ी बात ये है कि प्रपन्न भक्त
यदि सेव्य भगवान् के अधीन है तो भक्त
सेवक भी उसी तरह।
राम अपने भक्त सेवक साधु सन्त हित
हेतु ही अवतरित हैं
विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निरमित तनु माया
गुन गो पार। देखिए –
गोरूप धरती के उद्धार हेतु वाराह,तो
“सर्वं खलु इदं ब्रह्म” सर्वत्र भगवत् सत्ता
सिद्धि के लिए खम्भे से वरानुकूल और
वधानुकूल नरसिंह रूप धारे ।
द्वापर में शक्ति-शक्तिमान् अभेद और
और “रसो वै सः” तथा अनन्यशरणागति
के गहरे-प्रेम-पीयूष में उतारने के लिये
कृष्णावतार धारा
त्रेता में पुत्र पिता माता भ्राता राजा-प्रजा
की मर्यादा स्थापना हेतु और सतत नाम
स्मरण की महिमा से ऊँच नीच जाति
वर्ग भेद भ्रान्ति मिटते ही सर्वोद्धार के
स्वकीय संकल्प की पूर्णता सिद्ध की।
यदि भक्त पर रीझ कर लौटे
तो इन्द्रादि देवों पर विपत्ति पड़ेगी
अधीर इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति से राम
भरत मिलन में बाधा डालने का आग्रह
होने पर, गुरु ने इन्द्र को समझाया है
बेटा! इन्द्र किसी को भी भक्त-भगवान्
के बीच नहीं पड़ना चाहिए।क्योंकि इससे
तुम्हारी समस्या सुलझेगी नहीं बल्कि
उलझ सकती है।
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भरत
अकाजु।अजसु लोक परलोक दुख दिन
दिन सोक समाज।।
सेवक से बैर का भाव सेव्य के प्रति
विरोध होगा-मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैरु बैरु अधिकाई।
यद्यपि भगवान् तो सदा एकसमान एक
रस सच्चिदानन्द घन हैं, उनका किसी के
प्रति राग-रोष रखने और पाप-पुण्य को
ग्रहण करने का स्वभाव ही नहीं है।
फिर भी संसार अपने भावरुचि के
अनुसार कर्म-स्वातन्त्र्य के अधीन है।
कर्मानुकूल परिणाम भी सिद्ध है-
जद्यपि सम नहिं राग न रोसू
गहहिं न पाप पूनु गुन दोसू
करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फल चाखा
फिर भी लोग रसना नेत्र कर्णादि इन्द्रियों
से शुद्ध-अशुद्ध आहार लेते हैं,क्योंकि
सभी के हृदय , भक्त-अभक्तरूप हैंं।
दो तरह के प्राणी सृष्ट कराये प्रभु ने।
एक देव और असुर –
द्वौ इमौ भूतसर्गौ लोकस्मिन्
दैवः आसुर एवच।।
गोस्वामीजी ने समर्थन किया है
“तदपि करहिं सम बिसम अहारा
भक्त अभक्त हृदय अनुसारा”
ऐसे, भगवान् भक्त के प्रेमबस निर्गुण
होकर सगुण बन जाते हैं। जबकि वे
निर्लेप अमानी और सदैकरस ही हैं –
अगुन अलेप अमान एकरस
राम सगुन भए भगत प्रेमबस
वे तो सेवक अभिलाष पूर्ति के लिये
प्रसिद्ध हैं। “प्रभु का मान भले टल जाये
भक्त का मान न टलते देखा”
अर्जुन के लिये अपना संकल्प तोड़ना
इन्हीं भक्तप्रिय भगवान् का कार्य था।
राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी
प्रतिज्ञा क्या?
नारायण ! ये तो परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम् ,धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे है।
जब जब होइ धरम कै हानी
बाढ़हि अधम असुर अभिमानी
तब तब प्रभु धरि मनुज शरीरा
हरहिं सकल सज्जन भव-पीरा
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।तदा तदावतीर्याहं करिष्यामि
अरिसंक्षयम्। ही इनकी संकल्पलीला।
ऐसा संकल्प और वह भी “उनका”
संकल्प वस्तुतः “उन्ही” का पूर्ण होता है
इसलिये कि नानात्मक जगत् में “वही”
सभी रूपों में भासते हैं।
मायापति के साथ माया मलिन बुद्धि का
संकेत है।इन्द्र जो ठहरा “भोगी”
भक्त इसके ठीक विपरीत “योगी”
परदुःखकातर भक्त-भगवान् सभी के
लिये मंगल ही करनेवाले हैं।
दोनों से डरना ठीक नही –
अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई
राम भगत पर हित निरत
परदुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें
जनि डरपहु सुरपाल।।
अब भरत और राम स्वभाव जानकर कि
ये तो सभी के कल्याण कर्ता प्रसिद्ध हैं
इन्द्र का दुख समाप्त हुआ।फूलों की वर्षा
और भरत की सराहना होने लगी –
सुनि सुरबर सुरगुरु बरबानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ
लगे सराहन भरत सुभाऊ
और देखिये, श्रीराम-भरत मिलन होने
पर लौट चलने का आग्रह अवश्य
भरत द्वारा होता है। किन्तु
भगवान् अपने भक्त की प्रसन्नता चाहते
हैं, तो भक्त भगवान् की।
क्योंकि दोनों परस्पर एक दूसरे के पूरक
हैं। “प्रभु” होने से सर्वत्र व्याप्त-सत्ता
और सार्वत्रिक दृष्टि वाले भगवान् ही
उचित निर्णय ले सकते हैं।अतः वह भक्त
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुणासागर कीजिअ सोई।।
कहकर अयोध्या का “एकपद” राजपद
त्याग कर सर्वसमर्थ श्रीराम के दो-दो
पदों में अनुरक्ति व्यक्त करता है। और
देवगुरु बृहस्पति ने भरत
जैसे विरागी और केवल रामानुरागी के
प्रति अपराध करने पर रामक्रोध में जल
कर नष्ट होने का भी संकेत किया है
जो अपराधु भगत कर करई ।
राम रोष पावक सो जरई ।। अनन्तर
इन्द्र को भरत का रामस्नेह और राम का
भरतस्नेह समझाया गया
जगु जप राम राम जपु जेही
“भरत सरिस को राम सनेही”
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।