कबि-कुल अगम भरत-गुन-गाथा

श्रीरामलीला के अद्वितीय पात्र और
त्रपा(लज्जा) की मूर्ति श्रीभरत के
गुणों का वर्णन अनेकानेक सहृदय
धुरीणों काव्य-कला-शिल्प-प्रवीणों
रस-सिद्ध-कवि-वृद्धों के लिए अत्यंत
कठिन है।

भरत अयोध्या का राजपद मिलने
की बात से व्यथित हैं।अत्यंत-अत्यंत
लज्जालु हैं ,क्योंकि कि यह राजपद
तो श्रीराम का है।
जो वस्तु-पद-पदार्थ अपने नहीं वे
निश्चित रूप से सपने भी नहीं।
भरत तो श्रीराम-पद के अधिकारी हैं।
उन्हे मद है तो श्रीरामपदों (चरणों)का।
वह अपने को श्रीराम का सेवक मानते
हैं।अभिमानशून्य उन्हें अभिमान भी है
तो राम के सेवक होने का –
यह अभिमान जाय जनि भोरे
मैं सेवक रघुपति पति मोरे
अब एक विशेष बात यह है कि
जब राजपद श्रीराम का तब त्याग कैसा
लेकिन यह रहा सूक्ष्म विचार।

यदि लौकिक रीति से सोचें तो राम और
लक्ष्मण के वन जाने पर भरत जी को
राजपदसँभालना चाहिए।
लेकिन भरत तो रामपद के अनुरागी हैं
रामचरणों के लिये मतवाले भरत को
श्रीराम के एक नहीं दो-दो पद(चरण)
मिलने हैं, तब एक पद अच्छा कि दो
पद? कहते हैं भरत –
समुझि मोरि करतूति कुलु
प्रभु महिमा जिय जोइ।
जो न भजइ रघुबीर पद
जग बिधि बंचित होइ।
और भी कहते हैं कि ऐसी संपत्ति
सुखपूर्ण भवन मित्र पिता-माता सब
आग में जल कर भस्मसात् हो जाय
जो “रामपद”के सामने राजपद की इच्छा
करै –
जरउ सो संपति सदन सुख
सुहृद मातु पितु भाइ
सनमुख होत जो रामपद
करै न सहस सहाइ
और इसलिये कहा गया कि भरत जी के
गुणों को जानना और वर्णन करने का
सामर्थ्य केवल रामजी में है। कोई भी
कवि-कुल-निकर कर नहीं सकता भरत
के गुणों का वर्णन –

को जानइ तुम बिनु रघुनाथा
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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