सकल धरम धुर धरनि धरत को

भरत तो सम्पूर्ण धर्म रूपी रथ-चक्र की धुरी हैं। मातृ-पितृ  गुरु अतिथि गृह-कुटुम्ब  समाज राज्य तथा स्वयं के मानवीय धर्म का शास्त्र-सन्त-दर्शित मार्ग पर चल कर कौन आचरण-शिक्षक  बनता?

  यदि श्रीरामलीला में “भरत-उद्भव” नहीं होता? अयोध्या से  प्रस्थान  करने वाले भरत को विरोधी मान, भरत पर शर-सन्धान करने वाले, श्रीलक्ष्मण को आकाश में स्थित आकाशवाणी द्वारा ऐसा नहीं सोचने के लिये समझाया गया है ।आकाश में रह कर श्रीरामलीला को पल-पल देख रहे, देवताओं के  अनुरोध को सुनकर श्रीलक्ष्मण जी संकुचित होते हैं । सीता जी एवं राम जी का खूब आदर सम्मान करते हैं-

   “सुनि सुर बचन लखन सकुचाने , सीयँ राम सादर   सनमाने” 

और संकुचित होने पर भी सहसा कोई निर्णय नहीं लेने की “नीति” की सराहना तो की,लेकिन यह भी   स्वीकारा कि राजमद बड़ा कठिन है ।

कही तात तुम्ह नीति सुहाई सबसे कठिन  राज-मदु  भाई

जिन सौभाग्यवन्तों को सन्तों की सभा की सन्निधि और सेवा नहीं मिली वे तो “राजमद” की “मदिरा” का  “आचमन” करके “मद-मत्त” होंगे ही 

जो अचवँत नृप मातहिं तेई नाहिन साधुसभा जेहिं  सेई ”

नारायण ! ब्रह्मा की पांचभौतिक सृष्टि  में “भरत” जैसा भला कोई सुनाई  और  दिखाई   पड़ा ?

सुनहु लखन भल भरत  सरीसा विधि प्रपंच महँ सुना न दीसा”

प्रातः काल का तरुण “अरुण” तो हो सकता है तिमिर (अन्धकार)में मिलकर गल जाये आकाश मन करे मगन होकर मेघों में समा जाये गाय के खुर समान गड्ढे के जल में  ” अगस्त्य ऋषि ” चाहे डूब ही जायें प्राकृतिक क्षमा गुण को धरती माँ छोड़ दे मच्छर  के मुँह से निकली एक फूँक से सोने का पर्वत “सुमेरु” भी हो सकता कि आकाश में उड़ जाये।

    “तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई, गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई

    गोपद जल बूड़हिं घटजोनी, सहज छमा बरु छाँड़ै  छोनी

    मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई, होइ न नृपमदु भरतहिं  भाई  

“भरत को राज सत्ता का मद नहीं हो सकता”  पिता दशरथ और लक्ष्मण दोनों की एक साथ सौगन्ध है कि भरत जैसा पवित्र भ्राता हो नहीं सकता

    “लखन तुम्हार सपथ पितु आना, सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना”

गुण रूपी क्षीर(दूध) और अवगुण रूपी जल एक  साथ जैसै मिले हैं उसी तरह पंच तत्वों को परस्पर  मिला कर ब्रह्मा ने सारे संसार के पद-पदार्थ बना डाले हैं ।   

     ” सगुनु खीरु अवगुन जल ताता, मिलइ रचइ  परपंचु बिधाता”

लेकिन भरत सूर्यवंशतालाब के “हंस” हैं, जिसकी प्रकृति ही दूध-पानी को  पृथक् करने वाली है    

   “भरत हंस रबिबंस तड़ागा, जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा”

    नारायण ! समुद्र के क्षारीय जल को मेघ ग्रहण करके, जब बरसाता है तब धरती पर पड़ा जल गन्दा हो जाता है, जैसे “जीव” से “माया” मिल जाती है। लेकिन साधुसन्त महात्मा की प्रकृति है कि वह जीव की “माया-माटी” को  “जीव” से अलग कर उसे “अमायिक” बना कर निर्मल-जल के समान निर्विकार-मन  वाला बना देते हैं-

    भूमि परत भा ढाबर पानी, जिमि जीवहिं माया लिपटानी  

भगवदीय गुणों वाले साधु भगवदीय प्रकृति वाले हैं । वे जड़ को चैतन्य करनेवाले हैं –

    जड़हिं करइ चैतन्य जो”

फलतः जीवात्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप पा लेता है।भरत भी ऐसे ही हंसवत् सन्त हैं, जो मायिक विकारों  का अपहरण (परिहरण) कर लेते हैं –   सन्त हंस गुन गहहिं, परिहरि बारि बिकार”

भरत का हंसत्व और सन्तत्व सिद्ध है क्योंकि इन्होंने अपने यश से एक अद्भुत प्रकाश बिखेरा है,जिससे सारा जगद् प्रकाशमय है-  गहि  गुन पय तजि अवगुन बारी, निज जस जगत कीन्ह उजियारी”

भरत  के गुण-शील-स्वभाव को कहते नारायण! नारायण प्रेम-पयोधि में डूब ही गये – 

    कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ, प्रेम-पयोधि मगन   रघुराऊ

 भगवान्  की दशा देख कर और उनकी भरत के प्रति प्रीति समझ कर ऋषि-मुनि  देवगणों सहित सभी ने भरत के परहेतु ( जैसे साधु पर कार्य साधन) हित उत्पति को सराहा है । करुणासिन्धु  कृपायतन भगवान् भी सभी भक्तों द्वारा सराहे गये-

   सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु, सकल सराहत राम सो प्रभु को  कृपानिकेत

  इसीलिये भरत को समस्त धर्मों का धुरन्धर कहा गया –

  जौं होत जग जनम भरत को, सकल धरम धुरि धरनि धरत को”

  गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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