भले क्षीरसागर अपना मूल स्वभाव
बदल कर विशेष रुप से नष्ट ही क्यों
नहो जाये, भरत की रामभक्ति तो
अविनष्ट ही रहेगी।
भरत को राजसिंहासन का मद नहीं
हो सकता।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश जैसा पद भी मिले
तब भी भरत को अभिमान होना
असम्भव है।
खट्टे दही मट्ठे की एकबूँद से समुद्र
का खारा जल खट्टा हो सके तो हो
जाय, किन्तु भरत को राजमद नहीं
हो सकता।
भरत जी श्रीराम सेवित मार्ग से अत्यंत
व्याकुल होकर चले जा रहे हैं,लेकिन
उनका दर्शन कितना पवित्र है
जैसे इन्हें देखकर सभी का सौभाग्य
खुल गया है, मानो यह भरत नहीं बल्कि
चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग ही
जा रहा है –
भरत दरसु देखत खुलेउ
मग लोगन्ह कर भाग
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ
बिधि बस सुलभ ” प्रयाग”
प्रत्येक गाँव में ऐसा आनंद छा जाता
जेसे मरुस्थल में कल्पवृक्ष ही आगया-
अस अनंदु अचिरजु प्रति ग्रामा।
जनु मरूभूमि कलपतरु जामा।।
भरत की विह्वलता देख कर रास्ते में
माताएं परस्पर कहती हैं कि अति
रागानुरागिणी कैकेयी जैसी माता,
अत्यंत वैराग्यशाली भरत की माता
होने योग्य नहीं हैं-
सुनि गुनि दसा देखि पछिताहीं।
कैकई जननि जोगु सुतु नाहीं।।
मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक तीर्थ
मुनियों के आश्रम,देवस्थानों में
स्नानशुचि होकर, प्रणाम निवेदित
करते हुए प्रभु को सुमिरते,
मन ही मन श्रीसीताराम
पद-प्रेम की याचना करते और
सभीसे श्रीराम-गुण-श्रवण करते
चल रहे हैं –
निज गुन सहित राम गुन गाथा।
सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा।
निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनाम।।
मन ही मन माँहहिं बरु एहू
सीय-राम पद पदुम सनेहू।।
आसपास के ग्रामवासी उमड़ पड़ते हैं
प्रभु राम का समाचार सुनाते हैं।
भरत को देख कर सारे जन्म के
प्राप्तव्य धर्मार्थकाममोक्ष को मानो
एक साथ पा जाते है-
करि प्रनामु पूछहिं जेहि जेहीं।
केहि बन राम लखनु बैदेही।।
ते प्रभु समाचार सब कहहीं।
भरतहिं देख जनम फलु लहहीं।।
और सबसे बड़ी बात इस यात्रा की
नारायण!कि जो लोग यह कहते कि
हम लोगों ने अनुज लक्ष्मण के साथ
श्रीराम को देखा है, वे सभी नर-नारी
श्रीभरत जी को सीता-राम-लक्ष्मण
के समान दिखाई पड़ते हैं-
“जे जन कहहिं कुसल हम देखे
ते सिय राम लखन सम लेखे”
नारायण !भरत जी का रामप्रेम ऐसा है
कि हजार मुखों वाले शेषनाग भी इस
प्रेम का वर्णन करने में असमर्थ हैं।
अहन्ता ममता से मलिन मन वाले
अभागे लोग क्या कहेंगे, ब्रह्मसुख तो
इन्हें सम्भव नहीं, नारायण!
भरत जी का प्रेम क्रान्तदर्शी कविगणों
के लिए भी अप्राप्य-अगम्य है-
भरत प्रेमु तेहि समय जस
तस कहि सकइ न सेषु
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु
अह मम मलिन जनेषु
उधर श्रीसीता जी को स्वप्न हुआ है कि
परिकरों सहित भरत जी हमारे मार्ग
का अनुसरण करते हम सभी के पास
आरहे हैं।
सीता जी के सपने को सोच कर
सभी के सोच-विमोचन राम जी भी
सोचवश हो गयेहैं।
“नरलीलानाटक ” का खेल
जो खेल रहे हैं।
लक्ष्मण से इस स्वप्न को किसी
अनचाही समस्या के रूप में बताते हैं
लखन सपन यह नीक न होई।
कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।
बहुरि सोचबस भे सिय-रवनू।
कारन कवन भरत आगवनू।।
किसी ने उनके साथ चतुरंगिणी सेना
होने की बात कह दी।
एक आइ अस कहा बहोरी।
सेन संग चतुरंग न थोरी।।
राम जी को सोच है तो समाधान भी
हो जाता है।सबके सोचविमोचन हैं। "भरत साधु-शिरोमणि हैं "
“और साधुमात्र तो स्वयं में कोई
समस्या नहीं बल्कि समाधान है “
समाधान तब भा यह जाने
भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।
लक्ष्मण जी ने कहा भैया! आप तो
ऐसे हैं कि, सभी को अपने जैसा
समझ बैठते हैं।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ।
जानिअ आपु समान।।
भरत साधु सज्जन तो हैं, लेकिन
राम-राज्य पाकर धर्म-मर्यादा को
विस्मृत कर बैठे हैं –
भरत नीतिरत साधु सुजाना।
प्रभुपद प्रेम सकल जग जाना।।
तेऊ आजु राम पदु पाई।
चले धरम मरजाद मेटाई।।
लगता है निष्कंटक राज्य पाने हेतु
मन में अनुचित विचार कर
आरहे हैं –
कुटिल कुबंधु कुअवसर ताकी।
जानि राम बन बास एकाकी।।
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू।
आए करै अकंटक राजू।।
लक्ष्मण जी सरोष होकर तीर-धनुष
सँभालते हुए दोनों भाईयों
श्रीभरत जीऔरशत्रुघ्नलाल को
समर-भूमि में एक साथ सुला देने
का आदेश माँगते हैं-
आजु राम सेवक जसु लेऊँ।
भरतहिं समर सिखावनु देऊँ।।
राम निरादर कर फलु पाई।
सोवहुँ समर सिखावनु देऊँ।।
शिव भी उनके साथ सहयोग करें
तो भी श्रीराम की दोहाई है,
रण में उन्हें मार ही डालूँगा –
जौं सहाय कर संकरु आई।
तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
अब इस प्रकार की
लक्ष्मण की भ्रम-लीला के विभ्रम
वश देवताओं ने आकाशवाणी की है।
समझाया है देवों ने
“अनुचित उचित काजु किछु होऊ
समुझि करिअ भल कह सब कोऊ “
वेदों ने ऐसे बोध-वाले लोगों को
प्रबोधवान् नहीं कहा है, जो सहसा
कोई अविचारित काम करके
पाछे पछताते हैं-
” सहसा करि पाछे पछिताहीं
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं”
“सहसा विदधीत न क्रियाम्
अविवेकः परमापदाम् पदम्” इत्यादि महाभारत कथाधारित भारवि रचित
“किरातार्जुनीय” में पाण्डवों को
द्रौपदी नेभी यही समझाया था।
और इसीलिये, लक्ष्मण जी को भी
भरत का शील-स्वभाव बताया जाता है
कि भरत को राजसत्ता का अभिमान
नहीं हो सकता।
चाहे “देवत्रितयी” जैसा पद ही क्योंन
दे दिया जाय।
खारे समुद्र के गाम्भीर्य का परीक्षण
करने के लिए उसमें अति खट्टी दही
मट्ठे की बूँदें(काँजी )डालकर
कभी भी “उसको” खट्टे स्वाद में बदला
नहीं जा सकता।
“भरत भी भक्ति के अथाह गम्भीर
सागर हैं”
अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड के सुख
साम्राज्य वैभव को देकर भी भरत
के मन में क्षण भर के लिए भी कोई
विक्षोभ-हलचल नहीं पैदा की
जा सकती है –
” भरतहिं होइ न राजमदु”
विधि-हरि-हर सन पाइ कबहुँ की काँजी सीकरनि छीर सिन्धु बिनसाइ
गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।