शुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना

“भरत जैसा मन वचन कर्म से पवित्र
कोई अन्य नहीं हो सकता
यह बात लक्ष्मण और पिताश्री
दशरथ की “शपथ” खाकर मैं राम
कह रहा हूँ”

नारायण ! भगवान् श्रीराम सौगन्ध
खाकर भरत की पवित्रता का
प्रमाण-पत्र देते हैं।

अब देखिये, गोपियों ने भगवान् से
कहा था, कि मेरे( जीवों के )प्रिय!
आप सभी के हृदय में राजते हैं।

शरीरान्तर्वर्ती आप हैं इसलिये सारी
इन्द्रियाँ क्रियाशील हैं।

किसी का कैसा भी कोई भी शरीर
हो आप के रहने से ही परस्पर

पति-पत्नी, पिता-माता-पुत्रादि के
संसार के सारे सम्बन्ध रहते हैं।

और आपके शरीर से हटते ही
सारी चेतना लुप्त हो जाती है

शरीर केवल पार्थिव (मिट्टी) रूप में
अवशिष्ट बचता है।

फिर ऐसे शरीरों से किसी को प्रेम
नहीं होता।

वस्तुतः सभी आपसे ही प्रेम करते हैं
प्रेम मानते हैं,बस आपको जानते नहीं

इसलिये आप ही सभी शरीरों के प्रिय
नहीं बल्कि अतिप्रिय(प्रियतम) हैं।

” प्रेष्ठो भवान् तनुभृतां
किल बन्धुरात्मा “

भगवान् के शरीर में विराजते रहते
प्रत्येक का परस्पर सांसारिक
सम्बन्ध अक्षुण्ण है।इसलिए हर एक व्यक्ति आपस में परम प्रभु! प्रियतम! आपसे ही वस्तुतः व्यवहार करता है।

“हाँ यह अवश्य है कि हम आपकी ही
माया से ग्रस्त मलिन अन्तःकरण
के कारण और संसार ही प्रिय
लगने के कारण सभी शरीरों में
अन्दर से व्यवहार करनेवाले आपको
पहचान नहीं पाते”"हमारा अन्तः करण अर्थात् मन बुद्धि चित्त और अहंकार अशुद्ध रहने से आपको नहीं पहचानने का भयंकर संकट है" "लेकिन भक्त ,सेवक और साधु के जीवन का यह संकट कभी नहीं " संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बल बीरा भक्तिमूर्ति सीता , अनन्त बलवन्त हनुमन्त और श्रीभरत जी के जीवन का यह संकट कदापि नहीं है

बल्कि इन सभी का स्मरण इस
मलिन अन्तःकरण को पवित्र
कर देने वाला है।

श्रीभरत तो ऐसे पवित्र अन्तःकरण
के हैं कि राज्य भार धारण का
प्रस्ताव सुनकर व्यथित हो जाते हैं

“सानी सरल रस मातु बानी सुनि
भरत व्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्रवत सींचत
विरह उर अंकुर नए”

श्रीराम का वनगमन जान कर
पिता की मृत्यु विस्मृत हो उठती है

” भरतहिं बिसरेउ पितु मरन
सुनत राम बन गौनु”

और विकलता ऐसी कि तत्क्षण
अविस्मृत अविरल स्मृत श्रीराम
के चरणों लिए दीन-हीन हो जाते हैं

सबको प्रणाम करते हुये बताते हैं कि
बिना श्रीरघुनाथ जी को देखे हृदय
की जलन शान्त नहीं होगी-

आपुनि दारुन दीनता
कहउँ सबहि सिरु नाइ
देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ

“ऐसा है ज्ञान स्वरुप श्रीराम का ज्ञान
श्रीभरत जी को, क्योंकि उनका तो
मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार श्रीराम
रामाकारकाराकारित है”इसलिये भगवान् ने लक्ष्मण से कहा था कि भरत की आँखों में संसार बसा ही नहीं है। उसके रोम-रोम में मैं(राम) बसा हूँ।

और इसीलिए भरत
मन-वचन-कर्म से इतना निर्मल है कि

पिता श्रीदशरथ और
लक्ष्मण का शपथ लेकर भी
यह बात कहने में
मुझे कोई संकोच नहीं –

लखन तुम्हार सपथ पितु आना

“सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना “

हरिः शरणम्
गुरुः शरणम्

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment