भरत हंस रबिबंस तड़ागा

सूर्यवंश में जनमे भरत जी “हंस” के
समान हैं।
यह सूर्यवंश मानो सुन्दर तालाब है
जिसमें विचरणशील भरत एक हंस
के समान हैं।हंस पर तो वाग्देवी सरस्वती विराजती है, जो बुद्धि की अधिष्ठात्री है। अतः भरत का राज्य पद ठुकराना और श्रीराम को लौटाने चलना सुविचारित बुद्धि-विवेकमय निर्णय है।

तीन बजे दिन में तीर्थराज प्रयाग में
प्रवेश करते हैं, जब भरत, तब प्रभु
सेवित स्थान पर सेवक की दशा
गम्भीर हो जाती है।

सीतारामप्रेम-पीयूष रूपाकार होकर
शब्दरूप में आकाश में विकीर्ण हो
जाता है ” शब्दगुणकम् आकाशम्”

भरत तीसरे पहर कहँ
कीन्ह प्रबेसु प्रयाग
कहत राम सिय राम सिय
उमगि उमगि अनुराग

सारा समाज दुखी है पैदल भरत
के चलने से उत्पन्न पैरों में पड़े छाले
को देखकर।
कमलवत् इन चरणों में पड़ चुका
“झलका” ऐसा लगता है मानों
कमल पंखुड़ी पर पड़ा ओस-कण

झलका झलकत पायन्ह कैसे
पंकज कोस ओस कन जैसे

त्रिवेणी स्नान कर भरद्वाज को सादर
दण्डवत् प्रणाम किया है। और मुनि
को ऐसा लगा कि यह भरत तो मेरा

मूर्तिमान् सौभाग्य है-

दंड प्रनामु करत मुनि देखे।
मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।

ऋषि ने कहा कि यह विधि का विधान
था, जिस पर किसी का वश नहीं होता

सुनहु भरत हम सब सुधि पाई।
बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

देखिय यही भाव गुरु वशिष्ठ जी का है।

जब श्रीरामराज्याभिषेक शुभ लग्न
विचार पूर्वक आयोजित था, तब
राजा राम का वनगमन क्यों उपस्थित
हुआ?
भरत के प्रश्न पर “विधि” को ही वन
“प्राप्तिरूप हानि” का कारण कहा गया

सुनहु भरत भावी प्रबल
बिलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभ जीवन मरण
जस अपजस बिधि हाथ

इसीलिये भरद्वाज जी ने रानी के
द्वारा कुचाल रचकर और विधि वश
हुआ समझ में आने पर पछताने
का उल्लेख किया –

सो भावी बस रानि अयानी।
करि कुचालि अन्तहुँ पछितानी।।

और ऐसे में तुम्हारा स्वल्प भी अपराध
समझने वाला व्यक्ति बड़ा अधम
और दुर्जन है-

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू।
कहै सो अधम अयान असाधू।।

भरत ने उचित और ठीक रास्ता चुना
है , राम को लौटा लाने का, क्योंकि
श्रीरघुनाथ जी के चरणों में प्रीति ही
समस्त मंगल की जड़ है –

अब अति कीन्हेउ भरत भल
तुम्हहि उचित मत एहु
सकल सुमंगल मूल जग
रघुबर चरन सनेहु

और सभी ऋषियों का यह भी मत है
कि भरत की दृष्टि में जो कलंक
उनपर लगा है वह कलंक नहीं,बल्कि

“भरत जी की भक्ति-रस की सिद्धि
के लिए यह श्रीगणेशाय नमः है”तुम्ह कहँ भरत कलंक यह सम सब कहँ उपदेसु राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु

इन्द्र को सोच हुआ कि प्रभु वन से
लौट आयेंगे तो हमारी दशा शोचनीय
हो जायेगी
देवगुरु से कोई उपाय करने
की प्रार्थना हुई है। देवगुरु ने ऐसी सोच
रखने से मना किया है।

वैश्विक कर्म-फल प्राप्ति का अटल
सिद्धान्त समझाया गया है

करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा

और श्रीराम-भरत के प्रति कपट
व्यवहार को निषिद्ध किया है, क्योंकि
उसका परिणाम दुःखद बताया है

राम -भरत से डरने की आवश्यकता
नहीं, क्योंकि भगवान्भक्त से अधिक
परहित करनेवाला दूसरा नहीं।

भगवान्भक्त अभिन्न हैं। इनका धरती
पर आना ही परमार्थ के लिए है।
इनका अपना कोई स्वार्थ नहीं।
ये सभी से निष्कारण प्रेम करनेवाले हैं

हेतुरहित जग जुग उपकारी
तुम तुम्हार सेवक असुरारी

और इसलिए निष्केवल प्रेमी
सेव्य-सेवक भगवान्-भक्त अनन्य
हैं, वह सभी पर कृपा ही करेंगे

राम भगत परहित निरत
पर दुख दुखी दयाल
भगत सिरोमनि भरत तें
जनि डरपहु सुरपाल

और इसीलिये श्रीभरत जी के विषय
में, उचित अवधारणा यही है कि
जैसे जल और दुग्ध रूप दोष-गुण को
अलग करनेवाला हंस होता है , वैसे ही

श्रीभरत जी भी सूर्यवंश रूपी तालाब
के हंस हैं जो गुन-दोष विभाग में

सिद्धहस्त होता है-

जनमि कीन्ह गुन दोस बिभागा

” भरत हंस रबिबंस तड़ागा “

हरिः शरणम्
गुरुः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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