चले भरत दोउ भाइ

कौन होगा भरत जैसा ?अयोध्या आने पर, पिता का परलोक गमन और सीताराम का वनगमन जान करभरत अत्यंत दुखी हैं।

पितृ-कृत्य परिपूर्ण करते हैं।
सभी माताओं श्रीशत्रुघ्नलाल जी
और कुलगुरु वशिष्ठ जी द्वारा राज्य
भार ग्रहण का अनुरोध होता है कहते हैं भरत जी कि

वह तो गुरु ,सचिव, प्रजा और
समस्त माताओं का आदेश पालना
चाहते हैं। यह मेरे लिये शिरोधार्य है

मोहिं उपदेश दीन्ह गुरु नीका
प्रजा सचिव सम्मत सबहीका
मातु उचित धरु आयसु दीन्हा
अवसि सीस धरि चाहउँ नीका किन्तु मेरा मन असन्तुष्ट है। सभी लोग "साधु-स्वभाव" ही हैं। हमारे लिए साध्य कार्य बता रहे हैं

अब देखिये – सब अपराध मेरा है। मुझे क्षमा करें।

दुखी आदमी के दोष गुण पर आप सभी जैसे "साधुजन" विचार कर बतायें - उत्तरु देउँ छमब अपराधू दुखित दोष गुन गनहिं न साधू हम प्रभु राम के सेवक ठहरे हमारी अनुपस्थिति में माता की कुटिल बुद्धि ने मुझसे यह सेवाकार्य छीन लिया है- हित हमार सियपति सेवकाई सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई

“बिनु हरि भगति जायँ जप जोगा”

हरिभक्ति के बिना किसी जीवमात्र
का कष्ट कभी नहीं जा सकता
चाहे कितना हू जग्य जोग कर ले।

“देखे बिनु रघुनाथ के जिय की
जरनि न जाय”

हृदय में भरत के लगी है भयंकर आग
श्रीरघुनाथ चरण जल से जायगी भाग

कहते हैं कि मेरा हित श्रीरामचरण
आज्ञा दें सब करें मेरा दुख निवारण

यदि आप सभी हठ पूर्वक मुझे राज्य
भार सौंपेंगे तो यह धरती मेरे ही

दुःखभार से पाताल चली जायेगी

मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं
रसा रसातल जाइहि तबहीं

अरे! मेरे समान कौन पापग्रस्त
और अतिशय भार भरा है ?

मोहि समान को पापनिवासू
जेहि लगि सीय राम बनबासू

अन्त में सभी लोगों ने भरत के
राज्य नहीं लेने और वन जाकर
श्रीराम को लौटा लाने के निर्णय
की सराहना की है

अवसि चलिअ बन रामु जहँ
भरत मन्त्र भलि कीन्ह
सोक सिन्धु बूड़त सबहिं
तुम अवलम्बन दीन्ह सभी माताओं गुरु वशिष्ठ जी और अन्यान्य लोगों सहित भरत शत्रुघ्न वन के लिए प्रस्थान करते हैं।

भला कौन होगा भरत जी जैसा
त्यागी
जो यह जानता है कि राज्य त्याग
में भला है श्रीसीताराम के चरण ही अशरण के अनन्य शरण हैं- सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ सुमिरि राम सिय चरन तब चले " भरत दोउ भाइ "

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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